कोशी के कटाव ने छीना सैकड़ों परिवारों का आशियाना,आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को लोग मजबूर

लोग खुले आसमान के नीचे तंबू डाल कर अपने अनाज को रखने को मजबूर हैं ताकि आने वाले महीनों में उन्हें भोजन मिल सके।

सुपौल: बारिश का महीना शुरू होने के साथ कोशी नदी में हर साल बड़े स्तर पर कटाव होता है। इस कटाव से सुपौल जिले में कोशी की धारा के बीच टापुओं पर रहने वाले ग्रामीण सबसे बुरी तरह प्रभावित होते हैं। सुपौल जिले के किशनपुर ब्लॉक के महज कुछ गांवों की 1500 से 1800 एकड़ भूमि इस साल कोशी के कटाव में नदी में समा गयी है। ये गांव मौजहा और दुबियाही पंचायत के हैं।

इस आपदा ने यहां के सैकड़ों लोगों को बेघर कर दिया है। लोग ऐसे में अपने किसी परिचित के यहां या फिर खुले आसमान के नीचे जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। वर्षाें की मेहनत से बनाया गया घर और आशियाना यूं खत्म होते देखने को लोग विवश हैं। उनके पास कोई चारा नहीं है। सरकार और प्रशासन की नजर उनकी तकलीफों पर नहीं है। ऐसे में विस्थापन झेलना ही उनकी नियति है।

मौजहा पंचायत के पंचगछिया वार्ड संख्या 13 में लगभग 130 परिवार, वार्ड संख्या 14 में 150 से अधिक परिवार तथा वार्ड संख्या 15 बगहा में लगभग 130 परिवार विस्थापित हो चुके हैं।

बाढ व कटाव से सबसे अधिक परेशानी महिलाओं को होती है। एक छोटे से तंबू के सामने खड़ी एक विवश महिला।

वहीं वार्ड संख्या 10 सिसवा में लगभग 75 से 80 परिवार, सुजानपुर-बेला वार्ड संख्या 2 में लगभग 5 परिवार तथा वार्ड संख्या 3 में 30 से अधिक परिवार विस्थापन का दर्द झेल रहे हैं।

इसी तरह दुबियाही पंचायत के बेला गोठ वार्ड संख्या 06 में 155 से अधिक परिवार विस्थापित हो चुके हैं।

न घर बचा, न रास्ता, न बच्चों की पढ़ाई


कटाव से प्रभावित परिवारों की जिंदगी बेहद मुश्किल हो गई है। कई परिवार खुले आसमान के नीचे धूप में रहने को मजबूर हैं। किसी के पास रहने के लिए सुरक्षित घर नहीं है तो किसी के पास अपने बच्चों को खिलाने के लिए पर्याप्त भोजन नहीं।

सबसे बड़ी चिंता छोटे बच्चों और मवेशियों को लेकर है। मवेशियों के लिए चारा नहीं है। बच्चों के लिए पर्याप्त भोजन नहीं है। बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। कई जगह स्कूल तक पहुंचना मुश्किल हो गया है। बिजली की सुविधा का संकट है। आवागमन के लिए सुरक्षित रास्ता नहीं है। परिवार खुले आसमान के नीचे जीवन गुजार रहे हैं।

लोगों को कटाव व बाढ के दौरान अपने जलावन को भी सुरक्षित रखना होता है ताकि आने वाले महीनों में दिक्कत नहीं हो।

जिन घरों में कभी बच्चों की हंसी गूंजती थी, आज वहां कोसी नदी की तेज धारा दिखाई दे रही है। जिन लोगों ने अपनी जिंदगी की पूरी कमाई घर बनाने में लगा दी, आज वही लोग अपने परिवार और सामान को बचाने के लिए दर-दर भटक रहे हैं।

पीड़ित परिवारों की सरकार और प्रशासन से गुहार


कोशी कटाव से पीड़ित परिवारों ने सरकार और जिला प्रशासन से तत्काल राहत और पुनर्वास की मांग की है। कोशी पीड़ित व बेला गोठ गांव के निवासी राजेश कुमार ने कहा है कि हम पीड़ित परिवारों की मांग है कि सभी विस्थापित परिवारों का तत्काल सर्वे कराया जाए। प्रभावित परिवारों को सुरक्षित स्थान पर अस्थायी आवास उपलब्ध कराया जाए। भोजन, पीने का पानी और आवश्यक राहत सामग्री उपलब्ध कराई जाए। मवेशियों के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध कराया जाए। बच्चों की पढ़ाई के लिए वैकल्पिक/अस्थायी विद्यालय की व्यवस्था की जाए। बिजली और आवागमन की व्यवस्था तत्काल बहाल की जाए। कटाव प्रभावित क्षेत्रों में तत्काल कटावरोधी कार्य कराया जाए। जिन परिवारों के घर और जमीन नदी में समा चुके हैं, उन्हें उचित राहत, मुआवजा और स्थायी पुनर्वास दिया जाए। विस्थापित परिवारों को सुरक्षित सरकारी भूमि पर बसाने की व्यवस्था की जाए।

खुले आसमान के नीचे अनाज की बोरियां और बिखरा सामान। सामने नदी का बहाव।

मीडिया और समाज से अपील

यह सिर्फ कुछ घरों के उजड़ने की कहानी नहीं है। यह उन परिवारों की पीड़ा है जिनके सामने आज घर, भोजन, बच्चों की शिक्षा, पशुओं का चारा और सुरक्षित भविष्य के लिए जरूरी हर चीज का संकट खड़ा हो गया है। कोशी नदी की धारा लगातार लोगों की जमीन और घरों को अपने साथ ले जा रही है। पीड़ित परिवारों की आवाज शासन-प्रशासन और समाज के जिम्मेदार लोगों तक पहुंचाना आज बेहद जरूरी है।

कोशी पीड़ितों ने सामाजिक संगठनों और समाजसेवियों से अपील है कि कोशी कटाव से प्रभावित इन परिवारों की पीड़ा को सामने लाएं, ताकि पीड़ितों तक राहत और प्रशासन तक उनकी आवाज पहुंच सके। पीड़ितों का कहना है कि उनकी पीड़ा को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।

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