जनवरी 2025 से सितंबर 2026 के बीच देशों ने 211 ऐसे व्यापार और आर्थिक सहयोग समझौते किए, जिनमें जलवायु और ग्रीन ट्रांजिशन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इनमें से 139 समझौते महत्वपूर्ण कच्चे खनिजों से संबंधित हैं। यह कुल समझौतों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है।
जनवरी 2025 से सितंबर 2026 के बीच जलवायु और ग्रीन ट्रांजिशन से जुड़े 211 व्यापार समझौते हुए। IISD के नए विश्लेषण के मुताबिक, इनमें से 139 समझौते महत्वपूर्ण कच्चे खनिजों से जुड़े हैं। देश अब केवल खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करने में नहीं, बल्कि उनके उत्पादन और प्रोसेसिंग से अपने यहां आर्थिक मूल्य तैयार करने में भी दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
दुनिया में ऊर्जा का भविष्य अब केवल तेल और गैस के भंडार से तय नहीं हो रहा। सोलर पैनल, बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन और दूसरी स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों के लिए लिथियम, कोबाल्ट, कॉपर और रेयर अर्थ जैसे खनिजों की जरूरत बढ़ रही है। ऐसे में इन खनिजों तक पहुंच और उनकी सप्लाई चेन पर नियंत्रण देशों की आर्थिक और रणनीतिक प्राथमिकताओं का हिस्सा बनता जा रहा है।
इसी बदलाव का असर अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौतों में भी दिखाई दे रहा है। International Institute for Sustainable Development (IISD) के Trade & Climate Tracker के ताजा विश्लेषण के मुताबिक, जनवरी 2025 से सितंबर 2026 के बीच देशों ने 211 ऐसे व्यापार और आर्थिक सहयोग समझौते किए, जिनमें जलवायु और ग्रीन ट्रांजिशन से जुड़े प्रावधान शामिल हैं। इनमें से 139 समझौते महत्वपूर्ण कच्चे खनिजों यानी Critical Raw Materials (CRMs) से संबंधित हैं। यह कुल समझौतों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा है।
विश्लेषण बताता है कि महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर देशों के बीच कूटनीतिक गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं। 2025 की पहली तिमाही में Tracker ने ऐसे 15 समझौतों की पहचान की थी। एक साल बाद, 2026 की पहली तिमाही में यह संख्या बढ़कर 41 हो गई। यानी महज एक साल में लगभग तीन गुना बढ़ोतरी।
अब सिर्फ खनिज हासिल करना मकसद नहीं
महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर देशों की बढ़ती दिलचस्पी का एक बड़ा कारण उनकी सप्लाई चेन को सुरक्षित करना है। लेकिन IISD का विश्लेषण बताता है कि खनिज उत्पादक देश भी इन समझौतों के जरिए अपने यहां ज्यादा आर्थिक लाभ और औद्योगिक क्षमता विकसित करना चाहते हैं।
139 खनिज-संबंधी समझौतों में से 94 में खनिजों की आपूर्ति सुरक्षित करने से जुड़े प्रावधान शामिल थे। वहीं, 84 समझौतों में खनिज उत्पादक देशों के भीतर आर्थिक मूल्य बढ़ाने की बात थी। इसमें खनिजों की खोज, स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और कुशल कामगारों को प्रशिक्षण देने जैसे प्रावधान शामिल हैं। कई समझौतों में आपूर्ति सुरक्षा और स्थानीय मूल्य संवर्धन, दोनों को जगह दी गई है।
इसका मतलब है कि खनिजों की दौड़ केवल कच्चा माल हासिल करने तक सीमित नहीं रहना चाहती। जिन देशों के पास ये संसाधन हैं, वे चाहते हैं कि खनन के बाद प्रोसेसिंग, तकनीक, रोजगार और उद्योग से मिलने वाला लाभ भी उनके यहां बने। इससे उन्हें केवल निर्यातक बने रहने के बजाय अपनी घरेलू औद्योगिक क्षमता विकसित करने का अवसर मिल सकता है।
औपचारिक व्यापार समझौतों से आगे बढ़ रही है कूटनीति
विश्लेषण का एक और अहम निष्कर्ष यह है कि देश अब हर बार व्यापक और औपचारिक मुक्त व्यापार समझौते यानी Free Trade Agreements (FTAs) का इंतजार नहीं कर रहे। ऐसे समझौतों पर बातचीत और उन्हें अंतिम रूप देने में लंबा समय लग सकता है। महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति को लेकर बढ़ती प्रतिस्पर्धा के बीच सरकारें अपेक्षाकृत तेजी से सहयोग के रास्ते तलाश रही हैं।
139 खनिज-संबंधी समझौतों में से 68 फीसदी, यानी 95 समझौते, औपचारिक FTAs के बजाय समझौता ज्ञापन (MoUs), सहयोग ढांचे, संयुक्त घोषणाओं या इसी तरह के अन्य माध्यमों से किए गए हैं।
यह तरीका देशों को किसी खास क्षेत्र, जैसे खनन, प्रोसेसिंग, निवेश या सप्लाई चेन सुरक्षा पर जल्दी सहयोग शुरू करने की सुविधा देता है। हालांकि, ऐसे समझौतों की प्रकृति और उनकी कानूनी बाध्यता औपचारिक व्यापार संधियों से अलग हो सकती है।
COP31 से पहले व्यापार और जलवायु सहयोग का नया मोर्चा
IISD का Trade & Climate Tracker केवल खनिजों से जुड़े समझौतों को ही नहीं देखता। यह ऊर्जा, जलवायु शासन और भारी उद्योगों के डीकार्बोनाइजेशन से जुड़े प्रावधानों को भी ट्रैक करता है।
इसका महत्व इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ताओं में व्यापार एक बार फिर अहम मुद्दा बनने की उम्मीद है। तुर्किये के अंताल्या में होने वाले COP31 सम्मेलन से पहले महत्वपूर्ण खनिजों को लेकर देशों के बीच सहयोग का दायरा बातचीत के कमरों से बाहर भी तेजी से बढ़ रहा है।
वैश्विक स्तर पर व्यापार तनाव और भू-राजनीतिक संघर्ष के बावजूद जलवायु से जुड़े आर्थिक समझौतों की संख्या बढ़ना एक उल्लेखनीय रुझान है। ऊर्जा की कीमतों में अस्थिरता और सप्लाई चेन की सुरक्षा को लेकर चिंताओं ने भी देशों को नए साझेदार तलाशने और आर्थिक सहयोग के रास्ते बनाने के लिए प्रेरित किया है।
महत्वपूर्ण खनिजों की बढ़ती मांग एनर्जी ट्रांजिशन के लिए जरूरी तकनीकों की उपलब्धता से जुड़ी है। लेकिन इस सहयोग का वास्तविक लाभ इस बात पर भी निर्भर करेगा कि खनिज उत्पादक देशों को स्थानीय प्रोसेसिंग, तकनीक और रोजगार के कितने अवसर मिलते हैं। अगर समझौते केवल संसाधनों की आपूर्ति सुरक्षित करने तक सीमित रह गए, तो उत्पादक देशों के लिए आर्थिक मूल्य बढ़ाने का अवसर सीमित रह सकता है।
IISD के विश्लेषण से एक बात साफ होती है। ग्रीन ट्रांजिशन अब केवल जलवायु नीति और ऊर्जा क्षेत्र का विषय नहीं रह गया है। महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता, औद्योगिक विकास और देशों की आर्थिक सुरक्षा भी इसके साथ जुड़ गए हैं। आने वाले वर्षों में इन खनिजों को लेकर होने वाली कूटनीति यह तय करने में अहम भूमिका निभा सकती है कि स्वच्छ ऊर्जा की वैश्विक सप्लाई चेन किस तरह विकसित होगी और उसका आर्थिक लाभ किन देशों तक पहुंचेगा।