कैसे होती है परबल की खेती, जानते हैं क्या आप? नहीं तो यहां समझिए

परबल की खेती के लिए उसकी पुरानी लतों का प्रयोग किया जाता है, जिसका प्रमुख बाजार पश्चिम बंगाल व बिहार का गोपालगंज जिला है। महिलाओं व बच्चों को 100 बंडल बांधने के 10 रुपये मिलते हैं, जो बहुत कम पारिश्रमिक है। हालांकि यह एक अतिरिक्त आय का जरिया है।


हाजीपुर (वैशाली): परबल भारत की एक प्रमुख सब्जी है। यह मुख्य रूप गर्मी के दिनों की सब्जी है, हालांकि खेती के आधुनिक तरीकों की वजह से अब अधिकतर चीजें हर मौसम में मिलने लगी हैं तो परबल भी साल के ज्यादातर महीनों में बाजार में उपलब्ध रहता है।


नदियों के बड़े बहाव क्षेत्र और उर्वर भूमि की वजह से बिहार परबल की खेती के लिए प्रसिद्ध है। खासकर बिहार में गंगा के तटीय इलाके और गंगा के दियारा क्षेत्र परबल की खेती के लिए जाने जाते हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश जैसे राज्य परबल के प्रमुख उत्पादक राज्य हैं और ये ऐसे राज्य हैं जहां से होकर गंगा गुजरती है। हालांकि गंगा के अलावा अन्य नदियों में किनारे भी परबल की खेती होती है, लेकिन गंगा का इलाका उसके लिए अधिक अनुकूल होता है और गंगा की विशलता की वजह से इसकी खेती के लिए किसानों को उसके तटों के आसपास व दियारा क्षेत्र में बड़ा क्षेत्रफल मिलता है।
परबल की खेती के लिए उसकी लतों का प्रयोग किया जाता है, जिसे एक छोटे बंडल के रूप में बांधा जाता है और उसकी रोपाई की जाती हैै, जो बाद में एक नई पौधे या लत के रूप में पनपता व बढता है।

परबल की खेती के लिए बंडल बनाने में बड़ी संख्या में महिलाएं एवं बच्चे काम करते हैं। 100 बंडल बांधने का उन्हें 10 रुपये मेहनताना मिलता है।

पिछले दिनों इस संवाददाता की मुलाकात बिहार के वैशाली जिले में गंगा के किनारे ऐसे ही परबल किसानों और परबल की लत का बंडल बनाने वाले श्रमिकों से हुई, जिसमें बच्चे, महिला प्रमुख रूप से शामिल होते हैं।


अक्टूबर मध्य में वैशाली जिले के मनहार प्रखंड की अलीपुर पंचायत के मुख्तारपुर गांव में गंगा के किनारे स्थित एक बगीचे में करीब 250-300 महिला-बच्चे व पुरुष परबल के लतों की बंडल बनाते दिखे, जिसकी वे रोपाई करने वाले थे। गांव के अन्य दूसरे बगीचे में भी यहां से थोड़ी कम संख्या में इसी प्रकार लत का बंडल बनाते लोग दिखे।

बिहार के वैशाली जिले के मुख्तारपुर गांव में गंगा के किनारे स्थित आम के बगीचे का एक दृश्य, जहां बड़ी संख्या में लोग परबल की लतों का बंडल बनाते दिखे।

एक किसान जगत महतो ने इस संवाददाता को बताया कि वे इन लतों को 4000 रुपये क्विंटल के भाव से खरीद कर लाते हैं और इसकी रोपाई करते हैं। अक्टूबर का महीना इसकी रोपाई के लिए उपयुक्त होता है, जब पानी थोड़ा नीचे उतर चुका होता है। उन्होंने बताया कि यह हरे वाले धारीदार परबल की लत है और इसे बंडल बना कर हम जमीन में रोप देता है, थोड़ा हिस्सा ही जमीन से उपर रहता है। किसान सामूहिक रूप से ट्रकों में इसे मंगवाते हैं।
जगत महतो ने बताया कि किसानों को परबल की खेती में नुकसान भी होता है, लेकिन कहीं से इसकी भरपाई नहीं होती। उन्होंने बताया कि इस बगीेचे में करीब 250-300 लोग बंडल बांधने जुटते हैं।

परबल किसान जगत महतो कहते हैं कि 4000 रुपये क्विंटल ये लतें हम मंगवाते हैं और इसका प्रमुख बाजार पश्चिम बंगाल है।


नीलम देवी नाम की बंडल बांधने वाली एक महिला ने बताया कि 100 पीस बंडल बनाने का 10 रुपये मिलता है। एक व्यक्ति 400 से 600 बंडल कुछ घंटों में बांध लेता है। सन्नी कुमार नाम के एक लड़के ने बताया कि उसने आज 600 बंडल बांधा है और उसे इसके लिए 60 रुपये मिलेंगे। यानी अगर एक दिन में कोई 100 बंडल भी बांध ले तो उसकी कमाई मात्र 100 रुपये होगी। पारिश्रमिक के हिसाब से देखें तो यह कम मजदूरी है, लेकिन यह स्थायी प्रकृति की मजदूरी नहीं है, बल्कि महिलाओं व बच्चों के लिए कमाई का एक अतिरिक्त माध्यम है।


तुला पासवान व मुकेश कुमार जैसे किसानों ने बताया कि हम बंडल बांध कर नाव से गंगा के उस ओर दियारा में जाते हैं और वहीं उसकी रोपाई करते हैं। मुकेश ने बताया कि बंडल करीब छह ईंच का होता है और वह चार ईंच नीचे और दो ईंच ऊपर रहता है।

किसान तुला पासवान परबल की खेती के बारे में बताते हुए कहते हैं कि किसानों को इसकी खेती में नुकसान भी झेलना होता है।

अक्टूबर मध्य में ग्राउंड रिपोर्टिंग के लिए इस क्षेत्र भ्रमण के दौरान किसान रामानुज सिंह ने इस संवाददाता को बताया कि यह काम आज से शुरू हुआ और अगले 10-12 दिनों तक चलेगा।

किसान पश्चिम बंगाल के अलावा बिहार के गोपालगंज से भी परबल की लतें मंगवाते हैं।


किसानों ने कहा कि वे पश्चिम बंगाल से परबल की लतें मंगवाते हैं और बिहार में गोपालगंज इसकी लतों का प्रमुख बाजार है और वहां से भी इसे मंगवाया जाता है।

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