मेची नदी भारत के दार्जिलिंग जिले से लगे नेपाल के महाभारत पर्वत श्रृंखला से निकलती है। यह जगह बिल्कुल शांत है। उदगम स्थल के पास ध्वज लगे हैं और चारों आरे घने पेड़ों की हरियाली है। यहां बोर्ड पर नेपाली भाषा में इस स्थल के मेची नदी का उदगम स्थल होने का जिक्र है और इसे स्वच्छ बनाए रखने की अपील की गई है। उदगम स्थल के पास मेची एक पतली धारा में बहती है। इस स्थल पर जाना बेहद सुकूनदायक है।

पश्चिम बंगाल के मिरिक से राहुल सिंह
बीते सालों में एक पत्रकार के रूप में मेरा कई नदियों पर जाना हुआ। कई नदियों के संगम को देखा। कई नदियां ऐसी हैं या उनकी विशिष्ट धाराएं हैं जहां बार-बार जाना हुआ है। वह क्रम अब भी जारी है। नदी की इस यात्रा के क्रम में पिछले साल गर्मियों में मैंने मेची नदी की यात्रा भी की। और, यह यात्रा भी उसके उदगम से। उस जगह भी गया जहां वह भारत-नेपाल की सीमा तय करते हुए आगे बढती है और भारत की एक एक सबसे पुराना हेरिटेज चाय फैक्टरी स्थित है।

उदगम स्थल के पास से मेची इतनी पतली धारा में बहना शुरू होती है। Photo – Rahul Singh
मेची नदी नेपाल के महाभारत पर्वत श्रृंखला से निकलती है और यह जगह भारत के दार्जिलिंग जिले के मिरिक व सुकियापोखरी ब्लॉक क्षेत्र के बहुत करीब है और अपने उदगम के बाद मुख्य रूप से भारत में बहती है और महानंदा नदी की एक सहायक नदी के रूप में उसमें मिलती है। मेची नदी का यह उदगम स्थल के करीब दार्जिलिंग का गोपालधारा चाय बागान है, जिसके आसपास के कुछ झील में हिमालयन सैलामैंडर पाये जाते हैं।
मेची नदी अपनी पांच-छह किमी की यात्रा के बाद जिस जगह से गुजरती है, उस स्थल पर भारत की ओर ओकाई टी गोदाम धुरा नामक गांव है और नेपाल की ओर सूर्योदय नगरपालिका का वार्ड नंबर – 4। नदी पर एक पतली से पुलिया है, जिससे आना जाना होता है।
ओकाईटी गोदाम धुरा की शांत शाम और लोगों से संवाद
ओकाईटी गोदाम धुरा नेपाल की सीमा पर और मेची की तट पर स्थित आखिरी भारतीय गांव है। नाम से ही जाहिर है कि इस गांव की नाम ओकाईटी चाय फैक्टरी के नाम पर ही पड़ा है।इसका यह नाम यहां पर स्थित भारत के एक सबसे पुराने चाय कारखाने ओकाईटी चाय कारखाने की वजह से पड़ा है, जिसे अब एक हेरिटेज चाय कारखाना का दर्जा हासिल है। मेची नदी के उस पार नेपाल का इलाका है, वहां के इलम जिले की सूर्याेदय नगर पालिका का क्षेत्र है। यह जगह मेची नदी के उदगम स्थल से करीब पांच-छह किलोमीटर दूर है जो दार्जिलिंग जिले के मिरिक और सुखियापोखरी ब्लॉक के निकट है।

दोनों देशों के बीच फैले खूबसूरत चाय बागान और उनके बीच से बहती हुई मेची नदी की शुरुआती धारा एक सुखद माहौल बनाती है और यहां आने वाले लोगों को सुकून देती है। यह स्थल मेची नदी का शुरुआती स्थल बहाव क्षेत्र है तो यहां उसकी चौड़ाई कम है जो धीरे-धीरे आगे बढने पर फैलती है।
स्थानीय लोग इस नदी की विशिष्टता और इसमें पायी जाने वाली मछलियों पर खुल कर चर्चा करते हैं और उनकी चिंता मेची को प्रदूषण से बचाना है। साथ ही यहां के लोगों की चिंता इस नदी में पायी जाने वाली दुर्लभ मछलियों का संरक्षण करना भी है। इस नदी में एक दुर्लभ असाला मछली पायी जाती है। स्थानीय लोग इस नदी में कई अन्य खास किस्म की मछली होने का भी जिक्र करते हैं।

मेची नदी के तट पर स्थानीय निवासी दिव्या तमांग के साथ बीच में सपन भंडारी व एक अन्य व्यक्ति।
मेची नदी के तट के बिल्कुल करीब दिव्या तामांग (32 वर्ष) का घर है जो एक पंचायत सदस्य हैं। दिव्या बातचीत के दौरान बताती हैं – “हम नदी के बढते प्रदूषण को लेकर चिंतित हैं, इसके लिए जागरूकता व छोटे प्रयास करने के उद्देश्य से हमने मेची नदी प्रोटेक्शन कमेटी बनायी है। इस कमेटी के जरिए हम नदी को लेकर जागरूकता लाने का प्रयास करते हैं और कभी-कभी स्वच्छता अभियान भी चलाते हैं”।
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वहीं, 36 वर्षीय सुनील राय कहते हैं, “सिर्फ पर्वतीय इलाके में असाला मछली (Trout) मिलती है, जो ठंडे के महीने में दिखती है। हमलोगों को इसे पकड़ने नहीं देते”। वे अफसोस जताते हुए कहते हैं कि पिछले साल किसी ने इस मछली का शिकार कर लिया था।
बढता प्लास्टिक प्रदूषण और असाला मछली के संरक्षण की फिक्र
दिव्या व सुनील दोनों इस बात पर चिंता जताते हैं कि आसपास के क्षेत्र में प्लास्टिक कचरा बढ रहा है जो पूर्वी हिमालय के नाजुक पारिस्थितिकी के लिए अच्छा नहीं है। चाय बागान के इस इलाके में बागान देखने व पहाड़ घूमने के लिए पर्यटकों की आवाजाही बढी है। पर्यटक अक्सर अपने साथ लाए खाने-पीने की चीजों के प्लास्टिक रैपर फेंक देते हैं। सुनील अफसोस जताते हुए कहते हैं, “कचरे के प्रबंधन के लिए यहां उचित व्यवस्था नहीं है। पर्वतीय क्षेत्र में अच्छे ढंग से कचरा प्रबंधन होना चाहिए और सरकार को इसके लिए स्पष्ट योजना बनानी चाहिए”।

मेची नदी का एक दृश्य। मेची नदी का एक दृश्य। अपने शुरुआती बहाव में इसका पानी पारदर्शी और बहुत ही शीतल है। Photo – Rahul Singh
यहीं के निवासी 31 वर्षीय आरोग्य राय कहते हैं, “हमलोग 10 साल से मेची नदी में मिलने वाली दुर्लभ मछलियों के संरक्षण के लिए प्रयास कर रहे हैं। मेची नदी के अलावा असाला मछली रांगाभांग नदी व नेपाल के सिद्धि खोला में भी मिलती है”। वे कहते हैं कि नदी तट पर स्थित गांवों के संवेदनशील लोग इसके संरक्षण के लिए प्रयास कर रहे हैं और इस नदी को प्रदूषण से बचाने के लिए तटीय क्षेत्र को प्लास्टिक फ्री जोन बनाना जरूरी है।

वे कहते हैं कि यहां दो वर्ष से पंचायत सिस्टम लागू हुआ है, हम लोग पंचायत के माध्यम से ग्रे वाटर मैनेजमेंट दूषित जल प्रबंधन कर रहे हैं।
लोगों का यह भी कहना है कि ओकाइटी चाय कारखाना की ओर से ग्रे वाटर मैंनेजमेंट प्लान बनाया गया है। इसके तहत फील्टर चैंबर बना है, लेकिन वह पूरा नहीं बना है।

सुनील राय कहते हैं, “दो तरह का कचरा होता है, सड़ने वाला और नहीं सड़ने वाला, हमें दूसरे तरह के कचरे की ज्यादा चिंता है। इसलिए यहां हगीज, डायपर, सेनेटरी पैड आदि को डिस्पोज करने के लिए मशीन लगाना चाहिए”।

सुनील राय कहते हैं, “सिक्किम में पानी की बोतलें बॉंस से बनायी जाती है, लेकिन यहां कई जगह प्लास्टिक फ्री जोन लिखा हुआ होने पर भी लोग प्लास्टिक का उपयोग होता है। हाल में पंचायत की ओर से प्लास्टिक उठाने की शुरुआत हुई है जो अच्छी बात है”। समुदाय इस बात को लेकर चिंतित है कि लुप्तप्राय मछलियों का संकट और गहरा न हो जाए और वे संरक्षण प्रयासों में सरकार के सहयोग की जरूरत को बताते हैं।
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