एमएमडीआर संशोधन विधेयक के वो प्रावधान जो खनिजों पर राज्यों के अधिकारों को कम करते हैं

10 अगस्त को लोकसभा में एमएमडीआर संशोधन विधेयक पेश किया गया। लोकसभा में 12 अगस्त को यह बिना चर्चा के पारित कराया गया, फिर 13 अगस्त को यह राज्यसभा में पारित कराया गया। इस तरह नए संशोधनों के साथ खान एवं खनिज विकास एवं विनियमन कानून देश में लागू हो गया।

झामुमो एवं बीजद ने इसे सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के फैसले के उलट बताया है। झामुमो ने बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है तो बीजद ने कहा है कि यह बिल बड़ी खनन कंपनियों को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से लाया गया है।

दो दिन पहले, 13 अगस्त को केंद्र सरकार ने खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) संशोधन विधेयक 2026 (एमएमडीआर संशोधन विधेयक) को संसद के दोनों सदनों से पारित करवाने का ऐलान किया। इस विधेयक के पारित होने के साथ झारखंड सरकार की सबसे पहले तीखी प्रतिक्रिया आयी। झारखंड सरकार से प्रतिक्रिया आना लाजिमी है, क्योंकि यहां केंद्र में शासन कर रही भाजपा की विरोधी पार्टियां झामुमो-कांग्रेस की सरकार है।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने एक विस्तृत बयान जारी कर कहा कि अगर सरकार ने इस संशोधन को वापस नहीं लिया तो इसके विरोध में झारखंड ऐसा आंदोलन करेगा जिसे पूरा देश देखेगा। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के शब्द थे – “खनिज झारखंड का, जमीन झारखंड की तो हमारे हक-अधिकार का फैसला दिल्ली क्यों करेगी”? उन्होंने इसे झारखंड के हाथ पैर काटने की संज्ञा दी और कहा कि ऐसे में राज्य की बहुत-सी कल्याणकारी योजनाएं बंद होने के कगार पर आ जाएंगी।

झारखंड के हजारीबाग जिले में स्थित बड़कागांव कोयला खनन क्षेत्र के पकरी बरवाडीह माइंस का एक दृश्य। यह खदान एनटीपीसी को आवंटित है। फोटो – राहुल सिंह।

हालांकि झारखंड से उलट अन्य प्रमुख खनिज उत्पादक राज्यों छत्तीसगढ़, ओडिशा, मध्यप्रदेश या पश्चिम बंगाल की सरकार की ओर से ऐसी प्रतिक्रिया नहीं आयी, क्योंकि ये भाजपा शासित राज्य हैं।

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया पर अपने बयान जारी करने के साथ ही इस मामले में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिख कर इस संशोधन को वापस लेने की मांग की।

ओडिशा में विपक्षी बीजू जनता दल ने इस संशोधन विधेयक पर आपत्ति जतायी और चिंता प्रकट की कि इससे राज्य को खनिज राजस्व का नुकसान हो सकता है। यह बिल 10 अगस्त को लोकसभा में पेश किया गया, 12 अगस्त को लोकसभा में बिना चर्चा को और फिर 13 अगस्त को राज्यसभा में पारित हो गया।

राष्ट्रपति को लिखे अपने पत्र में झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा है, सर्वोच्च न्यायालय के नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने यह स्पष्ट किया है कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रतिष्टि 49 के तहत राज्यों को खनिज धारण करने वाली भूमि पर कर या उपकर लगाने का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह माना है कि खनिज का मूल्य या उत्पादन ऐसे कर निर्धारण के आधार पर हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के इसी निर्णय के आधार पर झारखंड विधानसभा ने झारखंड मिनरल बेयरिंग लैंड सेस अधिनियम 2024 पारित किया था।

इस विधेयक के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं:

  1. खनिज युक्त भूमि पर केंद्र का नियंत्रण: केंद्र अब खनिज सामग्री वाली भूमि को भी विनियमित करेगा। ऐसी भूमि की पहचान एमएमडीआर अधिनियम के तहत केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित मानदंडों के अनुसार की जाएगी। यह खानों के विनियमन और खनिजों के विकास पर केंद्र के नियंत्रण की घोषणा करने वाले मौजूदा प्रावधान के अतिरिक्त है।
  2. नई धारा 9 डी – राज्य लेवी पर सीमा: खनिज अधिकारों या खनिज-युक्त भूमि पर राज्य सरकार द्वारा कोई कर, उपकर या अन्य लेवी, चाहे वह किसी भी नाम से पुकारा जाए, नहीं लगाया जाएगा। इसमें खनिज मात्रा, खनिज मूल्य, रॉयल्टी या किसी अन्य आधार पर लेवी शामिल हैं। इस तरह के शुल्क केवल केंद्र सरकार द्वारा निर्धारित शर्तों या प्रतिबंधों के अनुसार लगाए जा सकते हैं।
  3. पिछले शुल्कों के संदर्भ में नियम: संशोधन लागू होने से पहले राज्य द्वारा भुगतान या एकत्र नहीं किए गए किसी भी लेवी को अमान्य माना जाएगा। हालांकि, इस तरह के बदलाव से पहले पूर्व में जमा की गई या वसूल की गई राशि वापस नहीं की जाएगी।
  4. धारा 13 के तहत नियम बनाने की शक्ति: एमएमडीआर अधिनियम की धारा 13 में संशोधन किया गया है ताकि केंद्र सरकार को नियम बनाने का अधिकार दिया जा सके। ये नियम राज्य सरकारों द्वारा इस तरह के शुल्कों को लागू करने के लिए शर्तों या प्रतिबंधों को निर्धारित करेंगे।

सरकार ने संशोधन विधेयक पर क्या कहा?


एमएमडीआर संशोधन विधेयक, 2026 पारित होने पर सरकार की ओर से पीआईबी पर आए बयान में बताया गया कि इस संशोधन ने खनन क्षेत्र में कराधान और लेवी के मौजूदा ढांचे से उत्पन्न होने वाली कई चुनौतियों का समाधान बताया गया। इस प्रेस बयान के अनुसार, ये चुनौतियां इस प्रकार हैं – खनन क्षेत्र पर भारी कर का बोझ, खनन कार्य शुरू होने के बाद भी करों, उपकर और अन्य शुल्कों की अप्रत्याशित शुरुआत, खनिजों के उत्पादन या प्रेषण पर कई कर, उपकर और अन्य शुल्क। राज्यों के बीच करों और अन्य शुल्कों की गैर समान दरें। पूर्वव्यापी प्रभव से कर, उपकर या लेवी लगाना।

देवघर जिले में स्थित चितरा कोयला खनन क्षेत्र का एक दृश्य। फोटो – राहुल सिंह।

केंद्र ने संसोधन के पक्ष में क्या तर्क दिए?


सरकार ने कहा है कि पहले जो हालात थे उससे अधिक राजकोषीय बोझ ने खनन को व्यावसायिक रूप से अव्यहार्य बना दिया, खनिजों के उत्खनन को हतोत्साहित किया और कुछ मामलों में खदानें भी बंद हुईं। अतिरिक्त व अप्रत्याशित लागत ने छोटे व मंझोले स्तर के खनन ऑपरेटरों को अधिक प्रभावित किया। अधिक व असमान शुल्कों ने उद्योगों को स्थानीय आपूर्ति श्रृंखलाओं से बचने के लिए विवश किया। इससे कमजोर बाजार, उच्च परिवहन लागत और अधिक प्रदूषण उत्पन्न हुआ। पर्याप्त स्थानीय खनिज संसाधनों की बावजूद महंगी घरेलू आपूर्ति ने उच्च खनिज आयात का भी संकट पैदा किया। असंगत करों के कारण आर्थिक विकास धीमा हुआ। निष्कर्षण चरण में अधिक कर बोझ अंततः वस्तुओं व सेवाओं की लागत को बढाता है। करों को पूर्वव्यापी रूप से लागू करने से कानूनी अनिश्चितता पैदा हुई और निवेशकों का भरोसा कम हो गया। सरकार ने कहा है कि प्राकृतिक संसाधनों के न्यासी के रूप में राज्य को राष्ट्रीय हितों की रक्षा करने की जिम्मेवारी है।

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