छत्तीसगढ़ की हरित गुफा की वो दुर्लभ खूबियां जिसको लेकर अब चिंतित हैं संरक्षणवादी

छत्तीसगढ़ सरकार का वन एवं पर्यटन विभाग हरित गुफा तक पर्यटकों के आवागमन के लिए आधारभूत संरचना का विकास कर रहा है। राज्य सरकार के इस कदम पर संरक्षणवादी सवाल उठा रहे हैं। लोगों की आवाजाही बढने से इस दुर्लभ गुफा के स्वरूप के प्रभावित होने और यहां आश्रण पाने वाली प्रजातियों के अस्तित्व को लेकर चिंता व सवाल कायम हैं।

छत्तीसगढ़ के बस्तर जिले में स्थित कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान अपनी कई विशिष्टताओं के लिए जानी जाती है। यहां तीन असाधारण गुफाएं स्थित हैं – कुटुम्बसर, कैलाश और दंडक स्टेलेग्माइट्स। ये आश्चर्यजनक भूगर्भीय संरचनाओं के लिए जाने जाते हैं।

इनमें कुटुम्बसर गुफा क्षेत्र में ग्रीन केव या हरित गुफा स्थित है, जो बस्तर जिला मुख्यालय जगदलपुर से करीब 27 किलोमीटर की दूरी पर है। छत्तीसगढ़ जनसंपर्क विभाग द्वारा इस साल के आरंभ में अपनी वेबसाइट पर जारी की गई एक जानकारी में ग्रीन केव या हरित गुफा के बारे में जानकारी दी गई है। इसके अनुसार, कांगेर घाटी में एक अनोखी प्राकृतिक स्थलाकृति सामने आई है, जिसे ग्रीन केव या ग्रीन गुफा नाम दिया गया है।

यह भी उल्लेख किया गया है कि राज्य के वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री केदार कश्यप ने स्पष्ट किया है कि ग्रीन गुफा को पर्यटन मानचित्र में शामिल करने से कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान में पर्यटन को नया आयाम मिलेगा व स्थानीय रोजगार के अवसर बढेंगे। इससे क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी और पर्यटक इस अदभुत गुफा की खूबसूरती को प्रत्यक्ष अनुभव कर सकेंगे। इस जानकारी के अनुसार, वन विभाग द्वारा आवश्यक तैयारियां पूरी किए जाने के बाद शीघ्र ही इस गुफा को पर्यटकों के लिए खोल दिया जाएगा। छत्तीसगढ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने भी ट्विटर के माध्यम से इसकी घोषणा की है।

ग्रीन केव या हरित गुफा का एक विहंगम दृश्य। फोटो – छत्तीसगढ़ सूचना एवं जनसंपर्क विभाग।

राज्य सरकार के इस फैसले का पर्यावरणविद व संरक्षणवादी विरोध कर रहे हैं व सवाल उठा रहे हैं।

सरकारी जानकारी के अनुसार, ग्रीन गुफा कुटुम्बसर परिसर के कंपार्टमेंट क्रमांक 85 में स्थित है। गुफा की दीवारों और छत से लटकती चूने की आकृतियों स्टैलेक्टाइट्स पर हरे रंग की सूक्ष्मजीवी परतें पायी जाती हैं, जिसके कारण इसे ग्रीन केव या ग्रीन गुफा नाम दिया गया है। यह एक दुर्लभ गुफा है और यहां तक पहुंचने के मार्ग में बड़े-बड़े पत्थर हैं। गुफा में सूक्ष्मजीवी जमाव से ढकी हरी चादर आकर्षक लगती हैं।

फिर आगे बढ़ने पर एक विशाल कक्ष दिखाई देता है, जहां से भीतर की ओर चमकदार और विशाल स्टैलेक्टाइट्स तथा फ्लो स्टोन बहते पानी से बनी पत्थर की परतें दिखती हैं, जो गुफा की प्राकृतिक भव्यता को और भी बढ़ा देती हैं।

सरकारी जानकारी के अनुसार, पर्यटकों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए इस दुर्लभ गुफा तक पहुंच मार्ग, पैदल पथ व अन्य जरूरी संरचनाओं का निर्माण किया जा रहा है।

हरित गुफा कई प्रजातियों का घर भी है, लेकिन पर्यटकों के लिए इसके खुलने और मानव गतिविधि बढने से उनके अस्तित्व को लेकर चिंताएं उभर सकती हैं। फोटो – छत्तीसगढ़ पर्यटन विभाग।

चिंता और सवाल किस बात पर हैं?


द वायर हिंदी ने इस संबंध में अपनी एक खबर में लखनऊ स्थित बीरबल साहनी पुराजीव विज्ञान संस्थान के निदेशक प्रो महेश जी ठक्कर के हवाले से लिखा है – पर्यटकों की आवाजाही से धूल, शोर, कंपन और आर्द्रता में बदलाव गुफा के पर्यावरण पर तात्कालिक और दीर्घकालिक दोनों तरह के दुष्प्रभाव डाल सकते हैं। बिना व्यापक वैज्ञानिक आधार, पारिस्थितिक और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन के ग्रीन केव या हरित गुफा को आमलोगों के लिए खोलना अत्यंत जोखिम भरा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से अविवेकपूर्ण है। इससे अपूरणीय क्षति हो सकती है।

द वायर हिंदी की खबर के अनुसार, गुफा की दीवारों को अनजाने में छूना भी हजारों वर्षाें में बने सूक्ष्मजीवी परतों और बायोफिल्म्स को पष्ट कर सकता है, कृत्रिम रोशनी से आक्रामक शैवाल पनप सकते हैं, जो गुफा की पारिस्थितिकी को मूल रूप में बदल सकते हैं।

द डक्कन क्रॉनिकल ने भारत के जाने माने गुफा खोजकर्ता और वैज्ञानिक डॉ जयंत विश्वास के हवाले से लिखा है – कांगेर घाटी की हमारी खोजी गई लगभग 27 गुफाओं में से यह एकमात्र गुफा है जहाँ सूरज की रोशनी पहुँचती है, वह भी दोपहर में और सिर्फ एक घंटे के लिए। इसमें स्टैलेक्टाइट्स हैं, जिन पर शैवाल की परत चढ़ी हुई है, जिससे यह बारीक हरे रंग के ऑयल.पेंट जैसा टेक्सचर देता है।

द वायर हिंदी की खबर के अनुसार, विशेषज्ञों ने जोर देकर कहा कि यदि भविष्य में कभी पर्यटन की अनुमति दी भी जाए तो वह अत्यंत सीमित कड़ाई से नियंत्रित और विज्ञान आधारित होनी चाहिए, जिसमें मनोरंजन से पहले संरक्षण को प्राथमिकता दी जाए। वहीं, पर्यावरण प्रेमी नितिन सिंहवी ने अतिरिक्त मुख्य सचिव (वन) को शिकायत भेजकर चेतावनी दी है कि पर्यटन से अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड, गर्मी, नमी, धूल और कंपन उत्पन्न होगा, जिससे गुफा की आंतरिक रसायनिकी प्रभावित होगी और उसकी हरी सूक्ष्मजीवी परतों को नुकसान पहुंचेगा।

रिसर्च क्या कहता है?

इस गुफा को लेकर किए गए एक रिसर्च में कहा गया है कि ग्रीन गुफा या हरित गुफा संभवतः 100 से 150 सालों में कुछ बड़े चट्टानों के खिसकने से इंसानों के लिए सुलभ हुआ है। इस रिसर्च में कहा गया है कि इस गुफा की सबसे प्रमुख आकर्षण इसकी लटकटती चट्टान (स्टैलेक्टाइट) है। शोध में कहा गया है कि यह गुफा का आकर्षक संसाधन है जो इस पर पर्यटकों का दबाव बढाएगा। जमीनी स्तर पर किए गए इस शोध में गुफा के अंदर मिलने वाले जीव-जंतुओं की सूची का उल्लेख है। इसमें कहा गया है कि यहां समृद्ध जैव विविधता है, क्योंकि इसका प्रवेश द्वार चौड़ा है। विभिन्न जैविक घटक इस गुफा में प्रवेश करते हैं जो अंततः इस गुफा की प्रजातियों का समर्थन करते हैं। यह भी कहा गया है कि कांगेर वैली नेशनल पार्क की दूसरी आम गुफाओं में रहने वाली प्रजातियों को भी यहां देखा गया। लेकिन, दिलचस्प बात यह है कि यहां मेगाडर्मा लाइरा की एक कॉलोनी मिली और प्रजाति कांगेर घाटी नेशनल पार्क की किसी दूसरी गफुा में नहीं देखी गई। दरअसल, मेगाडर्मा लाइरा एक मांसाहारी चमगादड़ है जो आमतौर पर दूसरे चमगादड़ों, छोटे पक्षी, सरीसृप, मछलियों व कीड़ों का शिकार करता है। इस गुफा में उसे न सिर्फ रहने की जगह मिली है, बल्कि उसका शिकार भी आसारी से मिल जाता है। वहीं, स्मॉल इंडियन सिवेट चमगादड़ों का शिकार करने इस गुफा में जाते हैं। 2024 के इस रिसर्च में कहा गया है कि यह अभी इंसानी दबाव से मुक्त है, लेकिन पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए यहां पर्याप्त संसाधन हैं।

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