मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज की वो खूबियों जिसने इसे विश्व विरासत सूची की दौड़ में शामिल कराया

लिविंग रूट ब्रिज जिसे मेघालय में जिंगकिएंग जरी कहा जाता है, एक परंपरागत आदिवासी ज्ञान और उसके अभ्यास का बेहतरीन नमूना है। रबर के पेड़ की जड़ों से बनाए जाने वाले ऐसे पुल आसपास के 75 गांवों को कनेक्टिविटी प्रदान करते हैं।

मेघालय के लिविंग रूट ब्रिज जिंगकिएंग जरी (Jingkieng Jri) भविष्य में यूनोस्को की विश्व विरासत सूची में शामिल हो सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि भारत के राजदूत और यूनेस्को में स्थायी प्रतिनिधि विशाल वी शर्मा ने यूनेस्को के विश्व धरोहर केंद्र के निदेशक लाजारे असोमो एलौंडो को इसको लेकर डोजियर सौंपा है।

अब इस स्थल की जांच वर्ष 2026-27 के मूल्यांकन चक्र के दौरान की जाएगी और धरोहर सूची में इसे शामिल करने की संभावनाओं का आकलन किया जाएगा।

मेघालय के मुख्यमंत्री कॉनराड कोंगकल संगमा ने 29 जनवरी 2026 को एक ट्वीट के माध्यम से इस कदम का स्वागत किया। उन्होंने लिखा यह तब हुआ है जब बाल हैली वार को पद्म पुरस्कार से सम्मानित किया गया है, जो टिकाऊ प्राकृतिक विरासत की इस अद्भुत परंपरा को अपनाने, बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए उनके जीवन भर के प्रयासों की पहचान है।

पूर्वी खासी में डबल रूट ब्रिज का एक दृश्य। फोटो क्रेडिट – CC BY 2.0

File:Living root bridges, Nongriat village, Meghalaya2.jpg

Created: 16 May 2011

उन्होंने आगे लिखा – हमें उम्मीद है कि इस साल लिविंग रूट ब्रिज को सूची में शामिल कर लिया जाएगा, जिससे यह सुनिश्चित होगा कि स्थानीय समुदायों, जो इस जीवित विरासत के संरक्षक हैं, उन्हें वह वैश्विक पहचान मिले जिसके वे हकदार हैं।

अब चलिए बात करते हैं कि लिविंग रूट ब्रिज क्या है?

लिविंग रूट ब्रिज जैसा कि अंग्रेजी के इस नाम या शब्द से ही स्पष्ट है – जड़ों का पुल। यह वास्तव में आदिवासी ज्ञान व अभ्यास से निर्मित है। जिसका प्रयोग सदियों से खासी आदिवासी समुदाय के लोग करते आए हैं, जिसके जरिये रबड़ के पेड़ों की जड़ों का पुल के रूप में प्रयोग किया जाता है। ये संरचनाएं सदियों से तीव्र जलवायु पारिस्थितिकी में भी काम करते हैंं और उनके लिए सहनीय होते है, जो मनुष्यों व प्रकृति के बीच एक सामंजस्य को भी दर्शाते हैं।

यह ज्ञान पृथ्वी के सबसे नम क्षेत्र और उसके आसपास के 75 से अधिक गांवों को कनेक्टिविटी प्रदान करता है। यह चेरापुंजी के पास भारतीय रबर के पेड़ आधारित पुल निर्माण की एक असाधारण परंपरा है। ये लिविंग ब्रिज महत्वपूर्ण इंजीनियरिंग और वानस्पतिक विशेषताओं को उजागर करते हैं।

खासी और जैंतिया पहाड़ियों में रहने वाले लोगों के पूर्वजों ने सुरक्षित रास्ते बनाने के यह अनोखा तरीका खोजा था। ये पुल फिकस इलास्टिका यानी भारतीय रबर अंजीर का पेड़ की जड़ों से बनाए जाते हैं।

मोंगाबे हिंदी की एक खबर के अनुसार, प्रसिद्ध लिविंग रूट ब्रिज ने यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थलों की अस्थायी सूची में पहले ही जगह हासिल कर ली है। इस खबर के अनुसार, फिकस आधारित लिविंग आर्किटेक्चर जिसे खासी भाषा में जिंगकिएंग जरी के नाम से जाना जाता है, वह सिर्फ पुलों तक सीमित नहीं है।

जड़ों से बनी मुश्किल सीढियां व पुल बेहद संकरे और पहाड़ी के किनारे बने होते हैं और हल्की चूक भी किसी व्यक्ति को नीचे गहराई में ले जा सकती है। पर, फिकस के पेड़ों की जड़ों कुशलता से तैयार की गई रेलिंग गिरने नहीं देती। इन पुलों का प्रबंधन व निर्माण समुदाय द्वारा किया जाता है।

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