भारत-EU के बीच आज हुआ फ्री ट्रेड एग्रीमेंट क्या है, इसका क्या असर होगा?

फ्री ट्रेड एग्रीमेंट के तहत 90 प्रतिशत से अधिक वस्तुओं पर टैरिफ घटाने या हटाने से दोनों पक्षों को अरबों यूरो की सालाना बचत होगी, लेकिन इस डील की असली पहचान इसके आर्थिक आंकड़ों से ज्यादा, इसके ग्रीन स्ट्रक्चर में छुपी है।

दिल्ली और ब्रुसेल्स के बीच 18 साल लंबी बातचीत के बाद जब 27 जनवरी 2026 को भारत और यूरोपीय संघ (European Union) ने फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर मुहर लगाई, तो यह सिर्फ टैरिफ कटौती या बाज़ार खोलने की कहानी नहीं रही। यह एक नई तरह की वैश्विक साझेदारी का संकेत बनकर सामने आई है, जहां व्यापार और जलवायु नीति को एक ही फ्रेम में गूंथा गया है।

यह समझौता ऐसे वक्त पर हुआ है जब दुनिया जियो-इकॉनॉमिक खींचतान, कार्बन टैक्स, सप्लाई चेन अस्थिरता और ऊर्जा असुरक्षा के दौर से गुजर रही है। अमेरिका की टैरिफ राजनीति, यूरोप का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज़्म और वैश्विक बाज़ारों में बढ़ती अनिश्चितता ने देशों को नए “स्ट्रैटेजिक एंकर” तलाशने पर मजबूर किया है। इसी पृष्ठभूमि में भारत–EU FTA को अब सिर्फ ट्रेड डील नहीं, बल्कि एक क्लाइमेट–ट्रेड कन्वर्जेन्स प्लेटफॉर्म के रूप में देखा जा रहा है।

क्लाइमेट ट्रेंड्स की फाउंडर-डायरेक्टर आरती खोसला इसे बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन से जोड़कर देखती हैं। उनके मुताबिक, “यह समझौता ऐसे समय में रणनीतिक संरेखण को दिखाता है जब जियोपॉलिटिकल-अनिश्चितता बहुत ऊंचे स्तर पर है। यूरोपीय संघ एक स्थापित शक्ति है और भारत एक उभरती हुई ताकत। जलवायु लक्ष्यों, ग्रीन इंडस्ट्री और क्लीन टेक पर इन दोनों का साथ आना यह साफ संकेत देता है कि पैसा और बाज़ार किस दिशा में बढ़ रहे हैं। यह डील भरोसा बनाती है और मल्टीलेट्रलिज़्म को एक नई, रणनीतिक ज़मीन देती है।”

PM addresses the India-EU Business Forum at Bharat Mandapam, in New Delhi on January 27, 2026. PIB Photo

आर्थिक रूप से इस समझौते का आकार बड़ा है। भारत-EU के बीच द्विपक्षीय व्यापार, जो फिलहाल लगभग 124 अरब यूरो का है, अगले कुछ वर्षों में दोगुना होने का अनुमान है। 90 प्रतिशत से अधिक वस्तुओं पर टैरिफ घटाने या हटाने से दोनों पक्षों को अरबों यूरो की सालाना बचत होगी, लेकिन इस डील की असली पहचान इसके आर्थिक आंकड़ों से ज्यादा, इसके ग्रीन स्ट्रक्चर में छुपी है।

जलवायु अब फुटनोट नहीं, फ्रेमवर्क है

इस FTA की सबसे अहम बात यह है कि इसमें जलवायु को अलग अध्याय की तरह नहीं, बल्कि रणनीतिक आधार की तरह रखा गया है। भारत-EU Clean Energy and Climate Partnership पहले से ही रिन्यूएबल एनर्जी, एनर्जी एफिशिएंसी और ग्रीन हाइड्रोजन पर सहयोग का ढांचा बना चुकी है। नया व्यापार समझौता उसी ढांचे को आर्थिक और नीतिगत मजबूती देता है।

PM, the President of the European Council, Mr. António Luís Santos da Costa and the President of the European Commission, Ms. Ursula von der Leyen witness the Exchange of MoUs between India and EU, in Hyderabad House, New Delhi on January 27, 2026. PIB Photo

ग्रीन हाइड्रोजन इस साझेदारी का केंद्रीय स्तंभ बनकर उभर रहा है। भारत की 2030 तक इलेक्ट्रोलाइज़र क्षमता बढ़ाने और ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन की महत्वाकांक्षा, और यूरोप की डीकार्बोनाइजेशन जरूरतें, दोनों एक-दूसरे से जुड़ती दिख रही हैं।यह सिर्फ ऊर्जा संक्रमण की बात नहीं, बल्कि नई औद्योगिक भूगोल की कहानी भी है।

E3G में एशिया प्रोग्राम लीड मधुरा जोशी कहती हैं, “EU पहले से ही भारत का सबसे बड़ा ट्रेडिंग पार्टनर है और इस लंबे समय से लंबित FTA का पूरा होना एक ऐतिहासिक पल है. यह समझौता उससे कहीं आगे जा सकता है, एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी की ओर जो सिर्फ व्यापार तक सीमित न रहे। दोनों के सामने एक जैसी चुनौती है। साफ ऊर्जा उद्योग कैसे बनाए जाएं, बिना किसी एक देश या सप्लाई पर अत्यधिक निर्भर हुए। यहां पूरकता साफ दिखती है, अवसर बड़ा है और समय बिल्कुल सही।”

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