असम व पश्चिम बंगाल, ये दो राज्य भारत के सबसे बड़े चाय बागान इलाके हैं। असम व पश्चिम बंगाल संयुक्त रूप से देश के 75 से 80 प्रतिशत चाय बागान क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हैं। टीमएसी शासित पश्चिम बंगाल और भाजपा शासित असम के चाय बागानों व वहां के मजदूरों की स्थिति की चुनाव में तुलना भी की जा रही है। ऐसे में दोनों राज्यों के जमीनी कार्यकर्ता इस पर स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं…

किरसेन खड़िया का आलेख
पश्चिम बंगाल में चुनाव का माहौल है। चारों तरफ रंग-बिरंगे झंडे नजर आ रहे हैं। कहीं घास-फूल छाप, कहीं कमल फूल, कहीं हंसिया-हथौड़ा-तारा, तो कहीं हाथ का निशान दिख रहा है। वहीं, कई जगह निर्दलीय उम्मीदवारों के बैनर और पोस्टर भी पूरे इलाके को चुनावी रंग से रंगीन बना रहे हैं।
बड़े-बड़े नेता, दूसरे राज्यों के मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री, केंद्रीय मंत्री, राज्य के छोटे-बड़े नेता, फिल्म कलाकार और सुपरस्टार आज हमारे गली-मोहल्लों में दिखाई दे रहे हैं। एक तरफ नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, तो दूसरी तरफ जनता सीधे सवाल कर रही है “इतने दिन कहां थे आप? विकास के लिए जो फंड मिला, उसका क्या किया आपने?”
निर्दलीय उम्मीदवार स्थानीय मुद्दों को अपना चुनावी एजेंडा बना रहे हैं और स्थानीय राजनीति को राज्य स्तर तक ले जाने की कोशिश कर रहे हैं।
हर रोज हमारे इलाके में हेलीकॉप्टर आ रहे हैं। लोगों में उत्सव जैसा माहौल है। लोग नेताओं को पहचानें या न पहचानें, लेकिन हेलीकॉप्टर देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ रही है।
चुनाव के दौरान नेताओं की भाषा की गरिमा भी गिरती नजर आ रही है। भाजपा के नेता व असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा कालचीनी आए थे, जहां उन्होंने आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुंमायू कबीर पर विवादित बयान दिया। उन्होंने बाबरी मस्जिद बंगाल में बनाने को लेकर कहा “तेरे बाप की जमीन है”। वहीं, मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अलीपुरद्वार की सभा से बीजेपी पर निशाना साधते हुए कहा कि “बीजेपी लोगों के डॉक्यूमेंट्स ले रही है और चुनाव के बाद बैंक खातों से पैसे निकाल लिए जाएंगे।”

ममता बनर्जी ने चाय बागानों को लेकर घोषणाएं कीं। उन्होंने कुछ वादे किए या दोहराए, जैसे – चुनाव के बाद मजदूरी 300 रुपये तक बढ़ाने, 15 प्रतिशत जमीन पर टी-टूरिज्म विकसित करना (हालांकि उनकी सरकार ने पिछले साल इसे 30 प्रतिशत जमीन पर करने की अधिसूचना जारी की है) और स्थानीय लोगों को रोजगार देना। साथ ही सभी को जमीन का पट्टा देने का भी वादा किया।
हालांकि, पश्चिम बंगाल में सामाजिक संगठनों ने इन योजनाओं का विरोध किया है। उनका कहना है कि पांच डिसिमल का सीमित पट्टा चाय मजदूरों के लिए पर्याप्त नहीं है। यह पट्टा न हस्तांतरित किया जा सकता है, न गिरवी रखकर लोन लिया जा सकता है। इसलिए मजदूरों की मांग है कि जितनी जमीन उनके पास है, उसका पूरा मालिकाना हक दिया जाए।
बीजेपी के प्रचार के दौरान उसके राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने नागराकाटा में कहा कि टीएमसी सरकार ने चाय बागानों को बर्बाद किया है और सबसे ज्यादा अन्याय मजदूरों के साथ हुआ है। उन्होंने वादा किया कि उनकी पार्टी की सरकार बनने पर असम की तरह यहां बेहतर मजदूरी दी जाएगी और विकास किया जाएगा।
इसी को ध्यान में रखते हुए हमने असम और पश्चिम बंगाल के चाय मजदूरों की स्थिति की तुलना की। इस सिलसिले में हमने ऑल आदिवासी स्टूडेंट्स एसोसिएशन ऑफ असम (AASAA) के अध्यक्ष गॉडविन हेंब्रम से बात की। यह संगठन कई वर्षों से चाय मजदूरों के अधिकारों के लिए आंदोलन करता आ रहा है।
उनकी मुख्य मांग है कि असम के आदिवासी चाय मजदूरों को अनुसूचित जनजाति (एसटी) का दर्जा दिया जाए। उरांव, मुंडा, खड़िया जैसी जनजातियां, जिन्हें दूसरे राज्यों में एसटी का दर्जा मिला है, असम में “टी ट्राइब्स” कहलाती हैं और उन्हें एसटी यानी अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के अधिकार नहीं मिलते।
मजदूरी के सवाल पर हेंब्रम ने बताया कि असम में ब्रह्मपुत्र घाटी में पहले 250 रुपये और बराक घाटी में 228 रुपये मजदूरी थी, जिसे बढ़ाकर अब क्रमशः 280 और 258 रुपये किया गया है। लेकिन, उनकी मांग है कि चाय मजदूरों की दैनिक मजदूरी कम से कम 551 रुपये होनी चाहिए।

जमीन के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि “डिजिटल पट्टा” दिया गया है, लेकिन रिकॉर्ड में जमीन मजदूरों के नाम पर स्पष्ट नहीं दिखती। इससे यह संदेह पैदा होता है कि यह चुनावी वादा ज्यादा है, वास्तविक अधिकार कम।
उन्होंने यह भी बताया कि कंसलटेटिव कमेटी ऑफ प्लांटेशन एसोसिएशन (CCPA) ने इस मुद्दे पर कोर्ट में केस किया है और आरोप लगाया कि चुनाव के समय सरकार और संगठनों के बीच मिलीभगत की आशंका भी रहती है।
जब हिमंता बिश्व सरमा के बिरसा मुंडा की प्रतिमा बनाने वाले बयान पर सवाल किया गया, तो हेंब्रम ने कहा कि बिरसा मुंडा आदिवासियों के लिए भगवान समान हैं। सरकार उनकी जयंती मनाती है, लेकिन उनके ही वंशजों को एसटी यानी अनुसूचित जनजाति का दर्जा नहीं देती यह एक बड़ा विरोधाभास है।
शिक्षा के मुद्दे पर उन्होंने बताया कि बागानों में कुछ हाई स्कूल बने हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। प्राथमिक स्कूल बागान प्रबंधन चलाता है, जहां शिक्षकों को मजदूरों की तरह दैनिक मजदूरी (करीब 280 रुपये) दी जाती है, जबकि हेडमास्टर को स्टाफ रैंक के अनुसार वेतन मिलता है।
अगर समग्र रूप से देखा जाए, तो असम और पश्चिम बंगाल के चाय मजदूरों की स्थिति काफी हद तक समान है। असम में मजदूरी थोड़ी अधिक है, लेकिन एसटी का दर्जा नहीं मिला है। वहीं पश्चिम बंगाल में शिक्षा व्यवस्था बेहतर है, क्योंकि स्कूल सरकार द्वारा संचालित होते हैं।
जमीन के मुद्दे पर पश्चिम बंगाल में टीएमसी सरकार ने 5 डेसिमल पट्टा देने की योजना लागू की है और “चाय सुंदरी” योजना के तहत 1.20 लाख रुपये देकर घर बनाने की व्यवस्था की गई है। मजदूरों को लेबर लाइन से हटाकर बसाने की कोशिश भी हो रही है।
लेकिन इस योजना का विरोध हो रहा है, क्योंकि पट्टे पर कई शर्तें हैं इसे बेचा या व्यावसायिक उपयोग में नहीं लाया जा सकता, और कई जगह लोगों को जमीन की सही जानकारी भी नहीं है।
इस तरह पश्चिम बंगाल में जमीन को लेकर भ्रम है, जबकि असम में भी “डिजिटल पट्टा” को लेकर सवाल बने हुए हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों ही राज्यों में अब तक चाय मजदूरों के लिए स्पष्ट न्यूनतम मजदूरी तय नहीं की गई है।
कुल मिलाकर देखा जाए तो दोनों राज्यों में चाय मजदूरों की स्थिति लगभग एक जैसी ही है। जैसा दावा हिमंता बिश्व सरमा द्वारा किया जा रहा है, वैसा जमीनी स्तर पर साफ तौर पर नजर नहीं आता।
(किरसेन खड़िया पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले के रहने वाले हैं और राज्य के उत्तर बंगाल क्षेत्र में एक सक्रिय चाय मजदूर अधिकार कार्यकर्ता हैं। वे पश्चिम बंग चा मजूर समिति से संबद्ध हैं।)