वर्ष 2026 की गर्मियों में भारत सिर्फ गर्मी से नहीं जूझ रहा। इस बार आसमान भी बेचैन है और समुद्र भी। मौसम की दुनिया में चल रही हलचल का असर खेतों से लेकर बिजली, पानी, खाद्य सुरक्षा और लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी तक पहुँच सकता है।
साल की शुरुआत कमजोर ला नीना से हुई थी। अभी दुनिया ENSO (El Niño–Southern Oscillation – अल नीनो-दक्षिणी दोलन) न्यूट्रल स्थिति में है। लेकिन प्रशांत महासागर के भीतर कुछ बदल रहा है। धीरे-धीरे नहीं, तेज़ी से। वैज्ञानिकों का कहना है कि दुनिया एक मजबूत अलनीनो की तरफ बढ़ रही है। और अगर यही रफ्तार बनी रही, तो 2026-27 में दुनिया बहुत मजबूत अलनीनो देख सकती है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने पहले ही संकेत दे दिए हैं। इस साल दक्षिण-पश्चिम मानसून सामान्य से कम रह सकता है। अनुमान है कि बारिश दीर्घकालिक औसत यानी 870 मिमी का करीब 90 प्रतिशत रह सकती है, जिसमें ±4% की त्रुटि सीमा है।
आइएमडी के प्रॉबेबिलिटी फोरकास्ट में 60 प्रतिशत संभावना कम वर्षा की है, जबकि 24 प्रतिशत संभावना “सामान्य से कम वर्षा” की बताई गई है। यह फर्क तकनीकी लग सकता है। लेकिन इसका मतलब बहुत सीधा है। भारत सामान्य और कमजोर मानसून की सीमा रेखा पर खड़ा है। और यह सिर्फ बारिश कम होने की कहानी नहीं है।
असल चिंता उस अस्थिरता की है, जो एक विकसित होते अलनीनो के साथ आती है। मौसम वैज्ञानिक बताते हैं कि अलनीनो कोई साधारण समुद्री घटना नहीं। यह पूरी पृथ्वी के मौसम तंत्र को प्रभावित करता है। खासकर भारत जैसे उपोष्णकटिबंधीय देशों को। अलनीनो बनने पर प्रशांत महासागर के ऊपर चलने वाला वॉकर परिसंचरण (Walker Circulation) कमजोर पड़ जाता है। इसका असर यह होता है कि भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर उच्च दबाव बनने लगता है। नम हवा ऊपर नहीं उठ पाती। बादल कमजोर पड़ते हैं। और मानसून की बारिश टूटने लगती है।
लेकिन इस बार एक और बात चिंता बढ़ा रही है। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि “evolving El Niño”, यानी बनता हुआ अलनीनो, उतना ही खतरनाक हो सकता है जितना पूरी तरह स्थापित अलनीनो।
मॉनसून को स्थिर वातावरण चाहिए। लेकिन जब महासागर और वायुमंडल खुद अस्थिर हों, तो मौसम में रुकावटें बढ़ जाती हैं। बारिश आती है। रुक जाती है। फिर अचानक तेज़ हो जाती है।
लंबे “break monsoon” बनते हैं। यानी खेतों के लिए सबसे मुश्किल स्थिति। अमेरिका की National Oceanic and Atmospheric Administration (NOAA) के मुताबिक मई से जुलाई 2026 के बीच अलनीनो बनने की संभावना 82 प्रतिशत है। और दिसंबर 2026 से फरवरी 2027 तक इसके बने रहने की संभावना 96 प्रतिशत तक पहुँचती है।
समुद्र के तापमान को मापने वाला RONI इंडेक्स भी अब ENSO Neutral की सीमा पार कर चुका है। वैज्ञानिक इसे शुरुआती संकेत मान रहे हैं कि प्रशांत महासागर गर्म हो रहा है।
इतिहास भी डराता है। 1950 के बाद दुनिया ने सिर्फ चार सुपर अलनीनो देखे हैं – 1982-83। 1991-92। 1997-98। और 2015-16।
इन वर्षों ने दुनिया भर में सूखा, गर्मी, जंगल की आग और मौसम की चरम घटनाओं को बढ़ाया था। अब मॉडल बता रहे हैं कि 2026 का सुपर अलनीनो भी उसी श्रेणी के करीब जा सकता है।
जीपी शर्मा, जो स्काइमेट वेदर में मौसम और जलवायु परिवर्तन विभाग के अध्यक्ष हैं और भारतीय वायुसेना में एयर वाइस मार्शल रह चुके हैं, कहते हैं कि महासागर रिकॉर्ड गर्मी की तरफ बढ़ रहे हैं। उनके मुताबिक 2027, 2024 को पीछे छोड़ते हुए दुनिया का सबसे गर्म साल बन सकता है।
वह याद दिलाते हैं कि महासागर मानव गतिविधियों से पैदा हुई अतिरिक्त गर्मी का लगभग 90 प्रतिशत हिस्सा अपने भीतर सोख चुके हैं। यानी अलनीनो अब सिर्फ प्राकृतिक घटना नहीं रह गया। वह ग्लोबल वार्मिंग की पृष्ठभूमि पर और खतरनाक बन रहा है। रघु मर्तुगुड्डे (Raghu Murtugudde), जो यूनिवर्सिटी ऑफ मैरीलैंड के एमेरिटस प्रोफेसर हैं और आइआइटी कानपुर में विजिटिंग प्रोफेसर भी, कहते हैं कि इस बार सबसे बड़ी चिंता बारिश का वितरण है।
उनके मुताबिक कुल बारिश का आंकड़ा उतना महत्वपूर्ण नहीं जितना यह कि बारिश कहाँ और कब होगी। वे चेतावनी देते हैं कि उत्तर-पश्चिम भारत में इस साल “humid heatwaves” यानी उमस भरी खतरनाक गर्मी देखने को मिल सकती है। खासकर अगर जुलाई तक मानसून ठीक से नहीं पहुँचा। तब पाकिस्तान की तरफ से आने वाली गर्म हवाएँ और अरब सागर की नमी मिलकर हालात और मुश्किल बना सकती हैं।
भारत के लिए यह चिंता सिर्फ मौसम तक सीमित नहीं। की लगभग 52 प्रतिशत खेती अब भी बारिश पर निर्भर है। देश के 40 प्रतिशत खाद्य उत्पादन का रिश्ता सीधे मानसून से जुड़ा है। बारिश का मतलब सिर्फ कम फसल नहीं। कम भूजल रिचार्ज, कम रिजरवायर लेवलl। कम हाइड्रोपॉवर उत्पादन। और शहरों में बढ़ता जल संकट।
खाद्य नीति विश्लेषक देविंदर शर्मा का कहना है कि यह साल भारत के लिए जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक अनिश्चितता के बीच “testing ground” साबित हो सकता है।
वह कहते हैं कि उर्वरक संकट, बढ़ती महंगाई और कमजोर मानसून साथ आए, तो इसका असर सीधे किसानों पर पड़ेगा। उनके मुताबिक भारत को अब कृषि पारिस्थितिकी और गैर-रासायनिक कृषि की तरफ गंभीरता से बढ़ना होगा।
सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर में कार्यकारी निदेशक डॉ. जी. वी. रामंजनयुलु कहते हैं कि असली समस्या सिर्फ कम बारिश नहीं बल्कि सूखा होंगे।
अगर एक हफ्ते से ज्यादा बारिश रुकी, तो मिट्टी फसलों को सहारा नहीं दे पाएगी।
वह सलाह देते हैं कि किसान धान जैसी पानी-खपत वाली फसलों से कुछ दूरी बनाएं और दलहन, तेलहन और मोटे अनाज की तरफ बढ़ें। साथ ही मिट्टी में कार्बनिक पदार्थ बढ़ाना अब सिर्फ टिकाऊ अभ्यास नहीं, जीवित रहने की रणनीति बनता जा रहा है। फिर भी मौसम की कहानी कभी सीधी रेखा में नहीं चलती।