गैलेक्सी फ्रॉग : एक दुर्लभ मेढक, जिसके आवास को फोटोग्राफी के शौक ने पहुंचाया नुकसान

एक रिसर्च से यह स्पष्ट होता है कि मानव का गैर जिम्मेवार व्यवहार व फोटोग्राफी की लालसा वन्यजीवों के लिए दिक्कतें उत्पन्न कर सकता है। इस अध्ययन में यह सिफारिश की गई है कि वन्यजीवों की फोटोग्राफी को लेकर एक स्पष्ट दिशानिर्देश होना जरूरी है।

यह अध्ययन मेढक की एक किस्म गैलेक्सी को लेकर किया गया है, जिसे अंग्रेजी में गैलेक्सी फ्रॉग कहते हैं। हालांकि इसका वैज्ञानिक नाम मेलानोबैट्राकस है और यह संकीर्ण मुंह वाले मेढकों की एक प्रजाति है जो अपने खास रंग-रूप को लेकर आकर्षित करती है।

यह मेलानोबैट्राकस की एकमात्र प्रजाति है और दुर्लभ व संकटग्रस्त है, इसलिए संरक्षणवादियों को इसके संरक्षण को लेकर चिंता रहती है। 1878 के एक अध्ययन के अनुसार, इसके शरीर की लंबाई 31.75 से 34.92 मिमी बतायी गयी है, जबकि 2014 के एक रिसर्च के आधार पर इसकी लंबाई 24 से 28 मिमी बतायी गयी है।

यह मेढक दक्षिणी पश्चिमी घाट में पाया जाता है और 900 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले ट्रॉपिकल सदाबहार जंगल, गीले समशीतोष्ण जंगल और अर्ध सदाबहार जंगलों में पायी जाती है। यह खास तरह के छोटे आवास या माइक्रो हैविटेट में रहने वाली प्रजाति है, जैसे – आमतौर पर सड़ते हुए लट्ठों या पत्थरों के नीचे।

बायोलॉजिस्ट राजकुमार केपी ने अपने एक अध्ययन में पाया कि फोटोग्राफी के लिए इस मेढक की तलाश और उसके हैवीटेट तक पहुंचने की फोटोग्राफरों की कोशिश ने इस दुर्लभ प्रजाति को नुकसान पहुंचाया है।

इस अध्ययन में कहा गया है कि पहले की रिपोर्ट में इस प्रजाति के मिलने की सटीक जगह की जानकारी छिपाई गई थी, क्योंकि डर था कि इन्हें इकट्ठा करने के लिए इनका शिकार किया जा सकता है। जब इस प्रजाति को केरल में मथिकेत्तन शोला नेशनल पार्क की फ्लैगशिप प्रजाति घोषित किया गया तो यह खबरों में आया और लोगों व फोटोग्राफरों का इस ओर ध्यान गया।

अध्ययन के अनुसार, इसके आकर्षक रंग, दुर्लभता और किसी नेशनल पार्क के लिए पहली फ्लैगशिप मेढक प्रजाति होने के कारण फोटोग्राफर इसे देखने और इसकी तस्वीरें लेने के लिए उत्सुक रहते हैं। इसकी आबादी पर नज़र रखने की कोशिशों के तहत केपी राजकुमार की टीम 2019 से केरल वन और वन्यजीव विभाग की मंज़ूरी से जंगल के एक हिस्से में नियमित रूप से फील्डवर्क कर रही है।

मार्च 2020 में इस टीम को लटठ्ों के नीचे सात इंडिकस मिले। हालांकि अगस्त 2021 में, केरल वन और वन्यजीव विभाग के लिए काम करने वाले एक स्थानीय मुखबिर ने बताया कि जून 2020 और अप्रैल 2021 के बीच फोटोग्राफरों के कई समूहों ने स्टडी वाली जगह का दौरा किया था, जिनका मकसद खास तौर पर इस मेढक की तस्वीरें लेना था। फोटोग्राफरों को रिपोर्टों और स्थानीय ट्रैकर्स से इस प्रजाति के माइक्रोहैविटेट के बारे में जानकारी थी और उन्होंने इस प्रजाति को खोजने के लिए कई लट्ठों को पलट दिया था। इनमें से पच्चीस लट्ठों भी शामिल थे, जिसके बारे में अध्ययन दल ने वहां इस मेढक के रहने की पुष्टि की थी।

अध्ययन में कहा गया है कि उन लट्ठों को उनकी असली जगह पर वापस नहीं रखा गया था और आसपास की वनस्पति को बुरी तरह रौंद दिया गया था। कई लट्ठों को पलटकर उनका निचला हिस्सा ऊपर कर दिया गया था, जिससे पहले काई से ढका हुआ ऊपरी हिस्सा पत्तों के ढेर में दब गया था। इससे लट्ठों के नीचे का माइक्रोहैबिटेट बदल गया होगा और इस जगह पर प्रजाति के लिए उपलब्ध आवास कम हो गया होगा। अध्ययन में कहा गया कि अगस्त 2021, नवंबर 2021 और मई 2022 में सर्वे के दौरान इन लट्ठों के नीचे इंडिकस नहीं मिले।

एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार, पहले इसके विलुप्त होने का डर था, पर 1997 में इसे फिर से खोजा गया। हालांकि यह प्रजाति कलाक्कड़-मुंडनथुराई टाइगर रिज़र्व, इंदिरा गांधी नेशनल पार्क और पेरियार टाइगर रिज़र्व जैसे संरक्षित इलाकों में पाई जाती है। ऐसा इसलिए था क्योंकि यह 5,000 वर्ग किलोमीटर से कम इलाके में ही पाई जाती थी और यह दायरा बुरी तरह से टुकड़ों में बंटा हुआ है। साथ ही, संरक्षित इलाकों के बाहर इसके रहने की जगह का दायरा और गुणवत्ता लगातार घट रही है। इसके रहने की जगह के घटने के कारणों में जंगली इलाकों को खेती की ज़मीन में बदलना और इलाके में बांध बनाना शामिल है। आयूसीएन ने आखिरी बार 2020 में इसका आकलन किया और वर्ष 2022 में इसे संकटग्रस्त (Vulnerable) श्रेणी में रखा।

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