लेटो गांव में बेलबोरोन पूजा का आयोजन, जानिए क्या है दाशॉंय पर्व

गुरु-शिष्य की अटूट परंपरा, धर्म और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का प्रतीक है बेलबोरोन पूजा


दुमका: दिसोम मरांग बुरु युग जाहेर अखड़ा की ओर से दुमका प्रखंड के लेटो गांव में संताल आदिवासियों के पारंपरिक धार्मिक पर्व बेलबोरोन पूजा आयोजित की गई। इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठान के साथ दशांय नृत्य और गीत के माध्यम से ठाकुर एवं ठकरन का गुणगान किया गया। संताल समाज में बेलबोरोन पूजा को गुरु-शिष्य परंपरा, धार्मिक आस्था और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण का महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है।

धार्मिक मान्यता से जुड़ी है बेलबोरोन पूजा की परंपरा


संताली धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब पृथ्वी पर मनुष्यों के पाप बढ़ने लगे, तब ठाकुर ने मानव जाति को नष्ट करने का निर्णय लिया। मान्यता है कि ठाकुर ने 12 दिन और 12 रात तक सिंगबीर एवं मानबीर पर सेगेल दाह (अग्निबाण) बरसाए तथा पुहह (जीवाणु/विषाणु) के माध्यम से मनुष्यों को नष्ट करने की योजना बनाई।

जब ठकरन को इसकी जानकारी मिली, तो उन्होंने ठाकुर से मानव जाति को नष्ट नहीं करने का आग्रह किया। ठकरन ने कहा कि मनुष्य उनके ही बच्चे हैं और उनके विनाश से स्वयं उन्हें भी हानि होगी। उन्होंने लिटह (मरांग बुरु) के साथ मिलकर मनुष्यों को धर्म के मार्ग पर वापस लाने की बात कही।

इसके बाद ठकरन ने लिटह (मरांग बुरु) को मोनचोपुरी (पृथ्वी लोक) से शिरमापुरी (देवलोक) बुलाया और मनुष्यों को धर्म के मार्ग पर लाने का संदेश दिया। धार्मिक मान्यता के अनुसार, ठाकुर और ठकरन के वस्त्र एवं आभूषण पृथ्वी लोक पर ले जाकर दशांय नृत्य और गीत के माध्यम से उनका गुणगान करने की परंपरा शुरू हुई।

इस परंपरा में ठकरन के प्रतीक स्वरूप साड़ी, शंख, काजल तथा सुनुम-सिंदूर (तेल-सिंदूर) और ठाकुर के प्रतीक स्वरूप लिपुर, पैगोन, मोरपंख आदि का उपयोग किया जाता है। मान्यता है कि इस तरह पूजा, गीत और नृत्य के माध्यम से मनुष्यों के धर्म के मार्ग पर लौटने का संदेश दिया जाता है।

12 गुरु बोंगाओं की पूजा का विशेष महत्व


संताली धार्मिक परंपरा में 12 गुरु बोंगाओं (गुरु देवताओं) का विशेष महत्व बताया गया है। इनमें धरोम गुरु बोंगा, कमरू गुरु बोंगा, भुवग गुरु बोंगा, कांशा गुरु बोंगा, चेमेय गुरु बोंगा, सिद्ध गुरु बोंगा, सिदो गुरु बोंगा, रोहोड़ गुरु बोंगा, गांडु गुरु बोंगा, भाइरो गुरु बोंगा, नरसिं गुरु बोंगा और भेन्डरा गुरु बोंगा शामिल हैं।

परंपरागत मान्यता के अनुसार, इन गुरु बोंगाओं का संबंध धर्म, रोग मुक्ति, नृत्य-संगीत तथा जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से है। इनके माध्यम से समाज में धार्मिक ज्ञान, पारंपरिक चिकित्सा, औषधीय जड़ी-बूटियों की पहचान और उनके उपयोग से संबंधित ज्ञान को आगे बढ़ाने की परंपरा रही है।
मान्यता है कि ठकरन दशांय चांदु (संताली माह) के छठे दिन गुरु बोंगाओं के साथ पृथ्वी लोक पर अवतरित होती हैं। इसी लिए संताल आदिवासी बेलबोरोन पूजा करते हैं।

गुरु-शिष्य परंपरा से मिलता है पारंपरिक ज्ञान


बेलबोरोन पूजा से लगभग एक सप्ताह पहले गुरु-शिष्य गांव के आखड़ा में एकत्र होकर पारंपरिक अनुष्ठान की तैयारी करते हैं। इस दौरान गुरु अपने शिष्यों को परंपरागत मंत्र-साधना, धार्मिक रीति-रिवाज और चिकित्सा पद्धतियों से संबंधित ज्ञान देते हैं। गुरु-शिष्य पहाड़ों तथा अन्य स्थानों पर जाकर औषधीय जड़ी-बूटियों की पहचान और विभिन्न बीमारियों में उनके पारंपरिक उपयोग के बारे में भी सीखते हैं।

बेलबोरोन पूजा के दूसरे दिन से लगातार तीन दिनों तक गुरु-शिष्य गुरु बोंगाओं के प्रतीकों के साथ गांव-गांव भ्रमण करते हैं। इस दौरान दशांय नृत्य और गीत के माध्यम से ठाकुर एवं ठकरन का गुणगान किया जाता है। साथ ही श्रद्धालुओं के घरों में सुख, शांति और समृद्धि की कामना के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा के चौथे और अंतिम दिन अपने गांव में दशांय नृत्य एवं गीत प्रस्तुत किए जाते हैं।

धर्म, संस्कृति और सामाजिक जीवन का संदेश


बेलबोरोन पूजा संताल समाज की ऐसी परंपरा है, जो गुरु-शिष्य के अटूट संबंध को दर्शाती है। यह पर्व लोगों को अधर्म से दूर रहने, धार्मिक मूल्यों का पालन करने, समाज को स्वस्थ रखने, पारंपरिक जड़ी-बूटी चिकित्सा से जुड़े ज्ञान को संरक्षित करने तथा पारंपरिक नृत्य-संगीत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का संदेश देता है।

इस अवसर पर काहा मरांडी, सुनील टुडू, सुरय टुडू, जोहोन टुडू, झोमोल मरांडी, अल्बेनुस किस्कू, लुखिराम टुडू, फोनी टुडू, सोम किस्कू, साहब टुडू और पवन टुडू सहित अन्य लोग उपस्थित थे।

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