बाहा पर्व के वे दृश्य जो आपको सादगी, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ाव महसूस कराएंगे…

बाहा पर्व तीन दिनों का होता है। तीन दिनों में अलग-अलग आयोजन होते हैं। बाहा के दौरान लोग सादा पानी एक-दूसरे पर डाल कर उत्सव मनाते हैं।

आदिवासी समुदाय प्रकृति के साथ जीता है। उनके पर्व, उत्सव, त्योहार और परंपरा प्रकृति से न सिर्फ जुड़ी होती हैं, बल्कि उसके संरक्षण का भी संदेश देती हैं। संताल आदिवासियों का एक ऐसा ही पर्व है – बाहा।

बसंत के दिनों में मनाया जाने वाला यह पर्व ठंड के मौसम के खत्म होने और गर्मियों के दिन शुरू होने का भी संकेत देता है। इस त्योहार के दौरान लोग एक-दूसरे पर सादा पानी डालते हैं।

झारखंड के दुमका जिले के मकरो गांव में खेरवाड़ सावंत एभेज बायसी और ग्रामीणों ने एक मार्च को बाहा पर्व पर विशेष उत्सव का आयोजन किया।

मकरो गांव में कार्यक्रम की आयोजक टीम के अनुसार, बाहा पर्व तीन दिनों तक मनाया जाता है। प्रथम दिन को जाहेर दाप माह, द्वितीय दिन को बोंगा माह तथा तृतीय एवं अंतिम दिन को शरदी माह कहा जाता है।

इस अवसर पर ग्रामीण गांव के नायकी (पुजारी) को उनके आंगन से पारंपरिक नृत्य-गान के साथ जाहेर थान तक ले गए। वहां पहुंचने पर नायकी ने बोंगा दारी (पूज्य वृक्ष) सारजोम (सखुआ) पेड़ के नीचे स्थित पूजा स्थलों का गोबर एवं जल से शुद्धिकरण किया, जिसे गेह-गुरिह कहा जाता है।

इसके बाद सिंदूर एवं काजल अर्पित कर मातकोम (महुआ) और सारजोम (सखुआ) के फूल चढ़ाए गए तथा जाहेर ऐरा, मारांग बुरु, मोड़ेकू-तुरुयकू, धोरोम गोसाई आदि इष्ट देवी-देवताओं के नाम पर विधिवत बलि दी गई।

नायकी ने उपस्थित सभी महिला-पुरुषों, बुजुर्गों एवं बच्चों को सारजोम (सखुआ) का फूल प्रदान किया। फूल ग्रहण करने के बाद ग्रामीणों ने नायकी को डोबोह (प्रणाम) किया। पुरुष श्रद्धालुओं ने फूल को कान में तथा महिलाओं ने बाल के जूड़े में धारण किया।

इसके उपरांत तुन्दाह और टमाक की थाप पर पारंपरिक बाहा नृत्य एवं गीत प्रस्तुत किए गए। नृत्य समाप्ति के बाद सभी ने प्रसाद ग्रहण किया। बाद में ग्रामीण नायकी को पुनः नाच-गान के साथ गांव वापस लाए। गांव पहुंचने पर नायकी ने प्रत्येक घर में जाकर सारजोम (सखुआ) का फूल प्रदान किया। घर के सदस्यों ने नायकी के सम्मान में उनके चरण धोए तथा फूल प्राप्त कर एक-दूसरे पर सादा पानी डाले।

तृतीय एवं अंतिम दिन शरदी माह के अवसर पर सभी ग्रामीण प्रातःकाल से ही एक-दूसरे पर सादा पानी डाल कर बाहा पर्व का आनंद लेते हैं और एक-दूसरे के घर जाकर सामूहिक भोजन करते हैं।

बाहा पर्व की एक प्रतीकात्मक तसवीर जो दुमका जिले के ही एक अन्य गांव की है।

संताल समाज की मान्यता है कि बाहा पर्व केवल सादा पानी से ही खेला जाना चाहिए। रंगीन पानी का प्रयोग परंपरा के विरुद्ध माना जाता है, क्योंकि संताल समाज में रंग का अपना विशिष्ट सांस्कृतिक महत्व है। पूर्व समय में यदि किसी कुंवारी कन्या पर रंगीन पानी डाल दिया जाता था, तो उसे अशुद्ध माना जाता था। इस अशुद्धि को दूर करने हेतु दंडस्वरूप रंग डालने वाले व्यक्ति से पांच बकरियां जुर्माना में वसूलने का प्रावधान था।

बाहा पर्व के शुभ अवसर में बायसी ने बाहा नाच गान प्रतियोगिता का अभी आयोजन किया गया। इसमें सभी प्रतिभागियों को सम्मानित किया गया। इस अवसर पर मुख्य अथिति के रूप में रिटायर्ड सिविल सर्जन डॉ ए.एम. सोरेन, अतिथि के रूप में भवेंद्र सोरेन, बाबुसोल मुर्मू, मिसिल हांसदा, शिवलाल मरांडी के साथ मनोहर मरांडी, रुबिलाल मरांडी, प्रेम मरांडी, नटवा हांसदा, गोविंद मुर्मू, जोसेफ मुर्मू, सुशीला टुडू, एलेमसिला टुडू, सुनीता मरांडी, मदन टुडू, सुबोधन मरांडी के साथ बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष श्रद्धालु उपस्थित थे।

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