एक नए अध्ययन से पता चलता है कि बिहार के उत्तरी हिस्से में एक बार बाढ़ आने पर एक परिवार को आम तौर पर दो लाख रुपये की संपत्ति का नुकसान होता है। इस इलाके के गांवों में साल में 60 बार अचानक बाढ़ आती है। मेघ पायन अभियान के अध्ययन पर आधारित इस स्टोरी के जरिए बिहार के बाढ़ के आर्थिक प्रभाव को समझिए…
निधि जम्वाल की रिपोर्ट
पांच फरवरी को बिहार विधानसभा में विपक्ष के नेता और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के कार्यकारी अध्यक्ष तेजस्वी यादव ने बिहार में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार पर जमकर निशाना साधा और राज्य विधानसभा में गरीबी, महिलाओं की सुरक्षा, कानून-व्यवस्था और रोजी-रोटी के मुद्दों पर सवाल उठाकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को घेरा।
राजद नेता ने कहा, “दूसरे राज्यों की तुलना में, बिहार सबसे गरीब है। यहां सबसे ज़्यादा बेरोज़गारी है। यह शिक्षा में पिछड़ा हुआ है। यह स्वास्थ्य में पिछड़ा हुआ है… प्रति व्यक्ति आय सबसे कम है। किसान ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।”
निःसंदेह बिहार भारत का सबसे गरीब राज्य है, जहां की 33.76 प्रतिशत आबादी कई तरह की गरीबी झेल रही है। बहुआयामी गरीबी इंडेक्स (एमपीआइ) स्वास्थ्य, शिक्षा और रहन-सहन में एक साथ कमी का आकलन करके आय से गरीबी की पहचान करता है। यह तय करने के लिए कि कोई व्यक्ति गरीब है या नहीं, तीन खास डाइमेंशन(आयाम) में 10 इंडिकेटर का इस्तेमाल किया जाता है। भारत में बिहार इस सूची में सबसे ऊपर है।

बिहार में गरीबी का एक प्रमुख कारण उत्तर बिहार के अधिकतर इलाकों में नियमित आने वाली बाढ़ है, जिससे लोगों के घर नष्ट हो जाते हैं, उनके पशुधन बर्बाद हो जाते हैं, पानी में उनके खेत डूबे रहने की वजह से सामान्यतः वे साल में मात्र एक फसल ले पाते हैं। फोटो – निधि जम्वाल।
बाढ़ का नुकसान: एक अधिक व्यापक आयाम
बिहार में कई वजहों से गरीबी बढ़ती है। परंतु, बार-बार आने वाली बाढ़ आबादी के एक बड़े हिस्से को नुकसान और उससे उबरने के बुरे चक्र में फंसाए रखने में अहम भूमिका निभाती है।
यह बात मेघ पाइन अभियान (एमपीए) के वर्ष 2024 की बाढ़ के बाद जमीनी स्तर किए गए एक आकलन पर आधारित रिपोर्ट में उल्लेखित है। एमपीए (मेघ पाइन अभियान) एक पब्लिक चौरिटेबल ट्रस्ट है जो पूर्वी भारत में पानी से जुड़े मुद्दों पर काम करता है। उत्तर बिहार में हाउसहोल्ड लेवल फ्लड लॉस एसेसमेंट 2024 (Household-level Flood Loss Assessment 2024) रिपोर्ट दिसंबर 2025 में जारी की गई थी और इसे टाटा ट्रस्ट का समर्थन मिला।
एमपीए के इस व्यापक आकलन में उत्तर बिहार के सात जिलों में सर्वे किए गए और 2,290 घरों में कुल 126.3 करोड़ रुपये के आर्थिक नुकसान की गणना की गई है, जो जो निचले स्तर पर भारी आर्थिक बोझ को दिखाता है। इन सात जिलों में पश्चिम चंपारण, सीतामढ़ी, दरभंगा, मधुबनी, सहरसा, सुपौल और किशनगंज शामिल हैं। ये 2,290 घर 2024 में 26 सितंबर से 29 सितंबर के बीच दूसरे चरण की बाढ़ से प्रभावित हुए थे।
रिपोर्ट के मुताबिक, बाढ़ से प्रभावित हर घर को औसतन 5.51 लाख रुपये का नुकसान हुआ, हालांकि अधिकतर परिवारों के लिए 2.11 लाख रुपये का औसत नुकसान ज्यादा सही आंकड़ा है। एमपीए की सर्वे टीम ने 20 श्रेणी में नुकसान का आकलन किया और इसे सात बड़ी थीम में बांटा: घर, निजी और घरेलू संपत्ति, (पानी, स्वच्छता और हाइजीन), ज़मीन, पशुधन और खेती।

एक महिला अपनी पीड़ा बताते हुए। फोटो: निधि जम्वाल।
मेघ पाइन अभियान के मैनेजिंग ट्रस्टी एकलव्य प्रसाद ने कश्मीर टाइम्स से बातचीत में कहा, “बिहार में पहली बार बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन ज़मीन से किया गया है, जहाँ बाढ़ के दौरान असल में लोग रहते हैं, घरों के अंदर, न कि सरकारी रजिस्टरों में”।
उन्होंने कहा, “अबतक बाढ़ के असर को ज़िला स्तर के नंबरों तक सीमित कर दिया गया है, जिससे असमानता कम हो जाती है और रोज़मर्रा के नुकसान का पता नहीं चल पाता। यह रिपोर्ट एक पारिवारिक इकाई के स्तर पर समुदाय के साथ बातचीत के आधार पर बाढ़ से हुए नुकसान का आकलन करती है, जिसमें न सिर्फ़ घरों और फसलों को हुए नुकसान का दस्तावेजीकरण किया गया है, बल्कि निजी और घरेलू संपत्ति, ज़मीन, पशुधन, पानी और सफ़ाई तक पहुँच, खेती से होने वाली रोज़ी-रोटी, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक प्रतिष्ठा या गरिमा के हुए नुकसान को भी डॉक्यूमेंट करती है”।
इस अध्ययन में बिहार के बाढ़ से होने वाले नुकसान में – ज़मीन का नुकसान सबसे बड़ा योगदान देने वाला रहा – जो कुल नुकसान का 47.2 प्रतिशत (55.4 करोड रुपये) था, इसके बाद घर की मरम्मत की लागत का हिस्सा 36.2 प्रतिशत (42 करोड रुपये़) था। जन सुविधाओं को हुआ नुकसान (2.2 प्रतिशत, 2.8 करोड रुपये़), पशुधन का नुकसान (2.4 प्रतिशत, तीन करोड़) के बराबर था, जबकि खेती और जानवरों को मिलाकर कुल नुकसान का 10 प्रतिशत हिस्सा था।
घरेलू स्तर पर ये नुकसान सिर्फ़ बाढ़ की एक घटना (2024 में दूसरे चरण की बाढ़) के लिए है, जबकि उत्तर बिहार के गांव बार-बार अचानक आने वाली बाढ़ का सामना करते हैं, जिनमें से कई की रिपोर्ट नहीं की जाती और उनका कोई हिसाब नहीं होता। अगर एक साल में बाढ़ की सभी घटनाओं के नुकसान को इकट्ठा करके जोड़ा जाए, तो यह रकम बहुत अधिक होगी और इससे पता चलेगा कि उत्तर बिहार में रहने वाले लोग देश के सबसे गरीब लोगों में से एक क्यों हैं। इन परिवारों को हर साल कई बाढ़ की घटनाओं का सामना करना पड़ता है, जिससे बार-बार नुकसान होता है, और हाशिए पर रहने वाले और कमज़ोर समुदाय लगभग कभी भी इससे उबर नहीं पाते हैं।
उदाहरण के लिए, एमपीए के 2016 की एक पिछले अध्ययन, जिसका टाइटल था ‘पोस्ट डिज़ास्टर रिकवरी: असेसमेंट ऑफ़ नीड्स इन मॉडरेट फ्लड कंडीशंस’(Post Disaster Recovery: Assessment of Needs in Moderate Flood Conditions) में पाया गया कि भारत-नेपाल सीमा पर छोटी, पहाड़ी नदियों में साल में 50 से 60 बार अचानक बाढ़ आती है, जिससे संपत्ति को बहुत नुकसान होता है और फसलें बर्बाद हो जाती हैं। चेगराहा नदी जनवरी से अक्टूबर के बीच उत्तर बिहार के पश्चिम चंपारण की रूपवलिया पंचायत के हरकतवा गांव में नियमित रूप से बाढ़ लाती है। हरकतवा के गांववालों ने एक साल में अचानक बाढ़ की 60 घटनाओं को रिपोर्ट किया है!

एक व्यक्ति बाढ़ के पानी का स्तर बताते हुए। फोटो: निधि जम्वाल।
बिहार: भारत का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य
बिहार का 73 प्रतिशत हिस्सा बाढ़ के प्रभाव वाला माना गया है। इस रूप में यह भारत का सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य है और देश के कुल बाढ़ वाले इलाके का लगभग 17.2 प्रतिशत हिस्सा इसी राज्य में आता है। यह बात नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर ने राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन विभाग के साथ मिलकर तैयार किए गए बिहार के बाढ़ आघातीय मानचित्र में दर्ज की गई है।
उत्तर बिहार की लगभग 76 प्रतिशत आबादी बार-बार आने वाली बाढ़ के खतरे में रहती है। नेपाल से सटे उत्तर बिहार के मैदानी इलाकों में कई नदियां बहती हैं, जिनका जलग्रहण क्षेत्र नेपाल के हिमालय में है, जिनमें कोशी, गंडक, बूढ़ी गंडक, बागमती, कमला बलान, महानंदा और अधवारा समूह की नदियां शामिल हैं (नीचे मैप देखें: उत्तर बिहार का रिवर बेसिन मैप)। उत्तर बिहार का इलाका राज्य के कुल 38 जिलों में से 21 को कवर करता है, और यह दक्षिण बिहार से गंगा नदी द्वारा अलग होता है। लगभग हर साल बाढ़ से बिहार में चल-अचल संपत्ति को बहुत नुकसान होता है। खड़ी फसलें और अनाज बर्बाद हो जाते हैं, और आधारभूत संरचना को बुरी तरह नुकसान होता है। बाढ़ गांव वालों के लिए बहुत सारी मुश्किलें लाती है क्योंकि उन्हें अपने टूटे-फूटे घर छोड़कर लंबा समय तक राहत कैंपों, तटबंधों या अस्थायी शरणस्थलों में बिताना पड़ता है। इसका स्वास्थ्य और शिक्षा पर असर पड़ता है। लोग रोजी-रोटी की तलाश में पलायन करने को मजबूर हो जाते हैं। सरकार (केंद्र और राज्य दोनों) राहत और पुनर्वास के लिए कई करोड़ रुपये देती है, लेकिन पुनर्वास और बर्बादी का यह सिलसिला चलता ही रहता है।

बाढ़ से गरीबी कैसे बढ़ती है?
बाढ़ से होने वाला नुकसान लंबे समय तक गरीबी को बढ़ावा देता है। यह परिवारों की उत्पादकता छीन लेता है और उन्हें कर्ज के चक्र में उलझा देता है।
एमपीए की हालिया बाढ़ नुकसान असेसमेंट रिपोर्ट के मुताबिक, इसके तुरंत बाद गुज़ारा करने के लिए, 67 प्रतिशत परिवारों को स्थानीय साहूकारों/महाजनों से अक्सर अधिक ब्याज दर पर पैसे उधार लेने पड़े। इसके अलावा, 35 प्रतिशत ने अपने घर के जेवर गिरवी रख दिये और 15 प्रतिशत ने ज़रूरी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए अपने जानवर बेच दिया या गिरवी रख दिया।
इन कामों से कुछ समय के लिए गुज़ारा तो हो जाता है, लेकिन भविष्य की कमाई के लिए ज़रूरी संपत्ति खत्म हो जाती है, जिससे परिवार लंबे समय तक अन्य स्रोतों पर निर्भरता और गरीबी के चक्कर में फंस जाते हैं।
उत्तर बिहार में बाढ़ से होने वाले क्षति को लेकर विरोधाभाष भी है। यहां संपन्न परिवारों द्वारा अधिक आर्थिक नुकसान दर्ज कराया जाता है, वहीं कम संसाधन वाले हाशिए पर रहने वाले परिवारों के लिए छोटे नुकसान कहीं अधिक खतरनाक होते हैं। उदाहरण के लिए, एमपीए के अध्ययन में पाया गया कि 36 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति परिवारों (आदिवासी वर्ग) को गुज़ारे के लिए ज़मीन गिरवी रखने और 56 प्रतिशत को अपने पशु गिरवी रखने के लिए मजबूर होना पड़ा, जबकि संपन्न लोगों के पास सामाजिक संपर्क और उधार हासिल करने तक बेहतर पहुंच है।

समुदाय के लिए वित्तीय सुरक्षा तंत्र की भी कमी है। लगभग 80 प्रतिशत परिवारों को बाढ़ बीमा के बारे में कोई जानकारी या उस तक पहुंच नहीं थी, जिसका मतलब है कि उन्हें पुनर्निमाण का पूरा खर्च खुद उठाना होगा। बिना किसी औपचारिक मुआवज़े के, जो कथित तौर पर कई ज़िलों में नहीं था या फिर एक जैसा नहीं था; परिवार भेजे गए पैसे या अधिक ब्याज वाले महाजनी कर्ज पर निर्भर रहते हैं।
बार-बार आने वाली बाढ़ से भी मजबूरी में पलायन होता है, खासकर लड़कों का। लगभग 45 प्रतिशत जवाब देने वालों ने बताया कि बाढ़ के बाद पलायन, ज़िंदा रहने का एक तरीका है। जबकि 68 प्रतिशत परिवारों के लिए बाहर से भेजा गया पैसा एक ज़रूरी लाइफलाइन है। यह निर्भरता स्थानीय स्तर पर रोज़ी-रोटी के सही विकल्प की कमी और मौजूदा सिस्टम को मज़बूत बनाने में नाकामी को दिखाती है।
बाढ़ से पढ़ाई में रुकावट आती है, क्योंकि कई इलाकों में स्कूल एक से दो महीने तक बंद रहते हैं, और सबसे गरीब घरों के छात्र और लड़कियां सबसे ज़्यादा प्रभावित होते हैं। मानव संसाधन के विकास में यह रुकावट ऊपर की ओर सामाजिक आर्थिक गतिशीलता या संभावनाओं के मौकों को और कम कर देती है।
बाढ़ से लड़ने की ताकत बनाने का रोडमैप
मेघ पायन अभियान की रिपोर्ट हाउसहोल्ड लेवर फ्लड लॉस एसेसमेंट 2024 बिहार के बाढ़ प्रबंधन को एक प्रतिक्रियावादी राहत केंद्रित मॉडल से एक पहले से कदम उठाने वाला व समुदाय केंद्रित सिस्टम में बदलने के लिए बहु आयामी फ्रेमवर्क प्रस्तुत करती है। यह इस बात पर ज़ोर देती है कि समाधान स्थानीय परिस्थितियों के प्रति संवेदनशील हो, जिसका मतलब है कि वे बाढ़ की खास प्रकृति, जैसे कि तटबंधों में दरार पड़ने से आने वाली बाढ़, अचानक आई बाढ़ या जलजमाव के हिसाब से हों, न कि सबके लिए एक जैसे हों।
एकलव्य प्रसाद कहते हैं, “बाढ़ का स्वरूप, जगह और सामाजिक पहचान, नुकसान और भरपाई दोनों को कैसे आकार देते हैं, ऐसे बारीक सबूत बाढ़ से जूझने की संवेदनशील तैयारी और लंबे समय की योजना तय करने के लिए बहुत जरूरी हैं। ताकि यह पक्का हो सके कि नीतियां कमज़ोरी को कम करें, न कि उसे बढ़ाए”।
चार तरह के काम पर ध्यान देने की ज़रूरत है – तैयारी (बाढ़ से पहले के काम), प्रतिक्रिया (बाढ़ के दौरान के काम), भरपाई (मध्यम समय के लिए पुनर्बहाली) और लचीलापन (लंबे समय का बदलाव)।
तैयारी के तहत, लक्ष्य बाढ़ आने से पहले स्थानीय क्षमतावर्द्धन और संरचना बनाना है। इसमें पंचायत स्तर पर इमरजेंसी ऑपरेशन सेंटर बनाना और लोकल वॉलंटियर कैडर को स्थानीय भाषाओं व बोलियों में हाइड्रो मेटियोरोलॉजिकल (बारिश, बाढ़ व मौसम से संबंधित) चेतावनियों को समझने और रिले करने की ट्रेनिंग देना शामिल है।
लोगों के लिए स्थायी, ऊंचे बहुउद्देश्यीय शरणस्थल और चारा, पानी और पशुधन किट से से युक्त पशु शरणगाह बनाने की ज़रूरत है। समुदाय स्तर पर नावें, मेडिकल किट और स्टैंडर्ड मॉड्यूलर राहत सप्लाई पहले से रखी जानी चाहिए।
बाढ़ के दौरानए फोकस तेज, सबको साथ लेकर चलने वाले और तकनीक से जुड़े दखल पर होना चाहिए। खास किस्म की बाढ़ के हिसाब से मोटरबोट तैनात करने और जीआइएस और एआइ टूल्स का इस्तेमाल करके निकलने के रास्तों को पहले से मैप करने की ज़रूरत है। फंसे हुए घरों तक पहुंचने के लिए स्वयं सहायता समूहों जैसे जमीनी नेटवर्क के ज़रिए राहत किट की आखिरी जगह तक डिलीवरी पक्की की जानी चाहिए।
मोबाइल हेल्थ क्लीनिक बोट एम्बुलेंस लगाना और लैंगिक सवंदेशनील स्वच्छता सुविधाएं (महिलाओं के लिए) देना, जिसमें माहवारी हाइजीन प्रोडक्ट शामिल हैं, बहुत ज़रूरी है। बाढ़ के दौरान पानी से होने वाली बीमारियों को रोकने के लिए ज़ीरो एनर्जी वाले घरेलू पानी के फिल्टर और पोर्टेबल प्यूरिफिकेशन यूनिट देने की भी ज़रूरत है।

रिकवरी पक्की करने के लिए एमपीए रिपोर्ट बिल्डिंग बैक बेटर की वकालत करती है ताकि परिवार फिर से गरीबी में न डूबें। इसके लिए घर मालिकों द्वारा चलाए जा रहे पुननिर्माण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। परिवारों को डिज़ाइन और मटीरियल का विकल्प देकर अस्थायी झोपड़ियों से हटकर बाढ़ अनुरूप घरों की ओर बढ़ने की ज़रूरत है। ऐसे कार्य के लिए रेज़िलिएंस वाउचर को एक वित्तीय टूल के रूप में प्रयोग किया जा सकता है। यह वित्तीय टूल है जो प्रभावित घरों को फिर से व्यवस्थित करने और पुननिर्माण में मदद के लिए प्रस्तावित किया गया है।
फसल नुकसान के मुआवज़े में तेज़ी लाने की ज़रूरत है और बीज बदली बैंक और चारा बैंक के ज़रिए तेज़ी से पुनर्बहाली में मदद दी जानी चाहिए। जीआइएस लिंक्ड डैमेज रजिस्ट्री और ब्लॉक चैन एनेबल ट्रैकिंग का इस्तेमाल यह पक्का करने के लिए किया जाना चाहिए कि मुआवज़ा सबसे कमज़ोर लोगों तक बिना किसी भेदभाव या भ्रष्टाचार के पहुँचे।
लंबे समय के बदलाव के लिए एमपीए रिपोर्ट ने समुदाय के नेतृत्व वाले माइक्रो इंश्योरेंस और तेज़ी से पेमेंट के लिए मोबाइल वेरिफिकेशन के साथ इंडेक्स आधारित फसल बीमा शुरू करने का सुझाव दिया है। इसने अभी ज़्यादा जोखिम वाले इलाकों में स्कूलों और हेल्थ सेंटरों को दूसरी जगह ले जाने और बाढ़ के दौरान पहुंच बनाए रखने के लिए गांव की सड़कें बनाने के लिए जलवायु लचीला मटीरियल का इस्तेमाल करने की भी सलाह दी है।
पानी के बहाव को मैनेज करने और लंबे समय तक पानी जमा होने को कम करने के लिए माइक्रो ड्रेनेज प्लान और कैचमेंट रेस्टोरेशन को सांस्थानिक बनाने की ज़रूरत है। नदी के तटबंधों के बीच रहने वाले परिवारों के लिए क्लस्टर आधारित पुनर्वास के लिए दूसरी ज़मीन की पहचान की जानी चाहिए।
इस रिपोर्ट में, समुदाय आधारित संगठन और नवप्रवर्तकों के बीच औपचारिक सहयोग की सलाह दी गई है, ताकि जलवायु लचीला समाधान सामने आ सके, जैसे उत्तर बिहार में बाढ़ के अनुरूप शौचालय का निर्माण।

बिहार में बाढ़ के अनुरूप बनाए गए शौचालय, महिलाओं के लिए विशेष तौर पर उपयोगी हो सकते हैं। फोटो: निधि जम्वाल।
जलवायु परिवर्तन को देखते हुए, जिससे भारी बारिश और अचानक बाढ़ के मामले बढ रहे हैं, जलवायु लचीलापन को मुख्यधारा में लाने की तुरंत ज़रूरत है। कई रिपोर्ट बिहार में जलवायु परिवर्तन के ज़्यादा खतरे की ओर इशारा करती हैं। 2021 में नई दिल्ली के एक थिंक टैंक काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वॉटर (CEEW) ने अपनी रिपोर्ट में इस लिहाज से बिहार को पांचवां सबसे कमज़ोर राज्य बताया। इस रिपोर्ट में भारत की जलवायु आपदाओं के लिहाल से कमजोर क्षेत्रों को मैप किया गया था।
इसके अलावा, 2019-2020 के एक अध्ययन, क्लाइमेट वल्नरेबिलिटी असेसमेंट फॉर अडैप्टेशन प्लानिंग इन इंडिया यूजिंग अ कॉमन फ्रेमवर्क के अनुसार, भारत में जलवायु परिवर्तन के लिए सबसे ज़्यादा कमज़ोर 50 जिलों में से 14 बिहार में हैं।
यह रिपोर्ट कश्मीर टाइम्स में अंग्रेजी में प्रकाशित The Hidden Cost of Floods and The Brutal Math of Poverty in Bihar का हिंदी अनुवाद है और इसे हमने कश्मीर टाइम्स से साभार प्रकाशित किया है।