पटना स्थित एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंस के पूर्व निदेशक व अर्थशास्त्री डॉ डीएम दिवाकर बिहार के सामाजिक ताने-बाने, विकास व पिछड़ेपन से जुड़े मुद्दों की गहरी समझ रखते हैं। बिहार केंद्रित अध्ययन-अध्यापन का उनके पास लंबा अनुभव है। वे पिछले कुछ सालों से बिहार के मधुबनी जिले में स्थित अपने गांव जलसैन में डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के जरिये बिहार केंद्रित अध्ययन को लेकर सक्रिय हैं। वे स्थानीय बच्चों के लिए एक स्कूल का भी संचालन करते हैं, ताकि गांव के बच्चों को गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा मिले और वे बाहरी दुनिया से प्रतियोगिता कर सकें।
क्लाइमेट ईस्ट के लिए राहुल सिंह ने चार अक्टूबर 2025 को उनके गांव जलसैन में बिहार चुनाव के मद्देनजर बिहार के विकास से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत बात की। प्रस्तुत है बातचीत का संपादित अंश –
सवाल: बिहार की चुनौतियों के परिप्रेक्ष्य में आप बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को कैसे देखते हैं?
जवाब: चुनाव लोकतंत्र का एक उत्सव है। नागरिक अपने हिसाब से नेता व पार्टी दोनों को चुनते हैं। जनता चाहती है कि बदलाव हो, सत्ताधारी पार्टियां चाहती हैं कि उनकी स्थिति बनी रहे। इसलिए आप देखेंगे कि सरकार ने भले अपने कार्यकाल के पहले तीन साल-चार साल काम किया हो या न किया हो, लेकिन जब चुनाव का साल आता है तो वह कई जनोन्मुखी घोषणाएं करती हैं। बिहार में भी आपने देखा होगा कि महिलाओं को 10 हजार रुपये की सीड मनी सहायता दी गई, रसोईया का वेतन बढा दिया गया। अन्य कई लोगों की भी तनख्वाह बढी है।
बावजूद इसके इस बार का चुनाव दो लिहाज से मेरे ख्याल से महत्वपूर्ण है। एक कि बिहार का जो सामाजिक-आर्थिक सर्वे 2023 हुआ, उसमें समुदाय को अपनी संख्या मालूम हो गई और वे अब अपना हिस्सा मांग रहे हैं।
मेरी राय है कि पुराने लोग अभी भी चुनाव में जाति के खेमे से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। लेकिन, नौजवान पीढी और सजग महिलाएं लीक से हट कर वोट करेंगी।
विपक्ष ने जो हर परिवार में नौकरी की बात कही है, वह असरदार रही है। इस कारण उनकी स्थिति बेहतर दिखती है। लेकिन, अभी कुछ कहना इतना आसान नहीं है। महिलाओं को 10 हजार का जो सीड फंड दिया गया है, उससे एक हद तक वे जाति के दायरे से बाहर जाकर वोट करेंगी, लेकिन बहुत ज्यादा ऐसा नहीं हो सकेगा। क्योंकि, पितृसत्तात्मकता का असर अब भी है, परिवार में पुरुष सदस्य निर्णय लेते हैं, हालांकि अपवाद में कुछ महिलाएं होती हैं जो अपना फैसला ले सकती हैं। मेरी समझ से एनडीए को एंटी इन्कबेंसी झेलनी पड़ेगी।
सवाल: आजादी के 73 साल गुजर गए हैं और इस सदी के भी करीब 25 साल गुजर गए हैं, 75 साल बचे हैं। इस दौरान भारत की आर्थिक प्रगति ठीक रही है, बिहार की आर्थिक तरक्की एक मुद्दा है। बिहार के आर्थिक भविष्य को आप कैसे देखते हैं। प्रधानमंत्री के आर्थिक सलाहकार परिषद की एक रिपोर्ट कहती है कि आजादी के बाद से बिहार की आय लगभग स्थिर है, उसमें सिर्फ एक बार मामूली बदलाव हुआ। आपने इस मुद्दे पर हाल में एक अखबार के लिए एक लेख भी लिखा है। इसे आप कैसे देखते हैं? क्या भारत और बिहार की औसत आय में बीच की खाई और बढेगी?
जवाब: बिहार के पास बहुत ही उर्वर भूमि है। पर्याप्त पानी है और बहुत ही मेहनती लोग हैं। बिहार के लोग जहां भी जाते हैं अपनी मेहनत से अपना झंडा बुलंद करते हैं, चाहे वे मजदूर जा रहे हों या व्हाइट कॉलर वाले जा रहे हों। वे अपनी छाप छोड़ते हैं।
ये चीजें विकास के लिए जरूरी होती हैं और यह हमारे पास हैं।
बिहार देश का पहला राज्य है, जहां भूमि सुधार कानून बना। लेकिन, वह भूमि सुधार कानून, दफ्तर, न्यायालय और मुकदमे के चक्कर में अटक गया और वह उस तरह से प्रभावी नहीं हो सका। राज्य में भूमि सुधार नहीं हो सका। ये संरचनात्मक पेचीदगियां हुईं। इससे इंस्टीट्यूशनल नुकसान हुआ। अगर संरचानात्म सुधार हो गया होता और जमीन अगर जोतने वाले के हाथ में गई होती तो राज्य के लोगों की आय बढ जाती। और, यह केवल बिहार का सवाल नहीं है। यह देश का भी सवाल है। अगर भूमि सुधार हुआ होता तो देश की उत्पादकता बढ जाती, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ।
अगर ऐसा नहीं हो सका तो फिर क्या हो सकता है? यहां मेरा मानना है कि अगर जमीन का बेहतर प्रबंधन ही हुआ होता तो अच्छा होता। इससे हम बेहतर फसल ले पाते। पर जमीन के बेहतर प्रबंधन में जो निवेश होना चाहिए था, वह नहीं हो सका। अगर पब्लिक इन्वेस्टमेंट कमजोर पड़ जाता है, तो प्राइवेट इन्वेस्टमेंट बढता है और वह मुनाफे के लिए होता है।
आजादी के पहले जो निजी निवेश होता था, वह राष्ट्र निर्माण के लिए होता था। अब जो निवेश होता है वह लाभ के लिए होता है।
आज अपना खर्च बचाने के लिए सरकार संस्थानों को पीपीपी मोड में निजी निवेश की दिशा में ले जाती है। परिणाम यह हुआ कि हमारे स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी पब्लिक के बदले प्राइवेट हो गए।
आप जानते हैं कि अगर स्कूल बढिया नहीं होगा तो कॉलेज में अच्छे छात्र नहीं होंगे। अगर कॉलेज में अच्छी पढाई नहीं होगी तो स्कूल में अच्छे शिक्षक नहीं होंगे। यह कोई पहले या कोई बाद वाली प्रक्रिया नहीं है।
कर्पूरी ठाकुर जी ने यह आवाज उठायी थी और यह पॉलिसी भी लायी थी कि हरेक पंचायत में एक स्कूल होगा। उन्होंने उस काम को आगे बढाया भी, उसके लिए बजट का प्रावधान किया। आज सभी कर्पूरी जी का नाम लेते हैं, लेकिन उसके साथ-साथ सब जगह स्कूल बंद करने में लगे हैं।
बिहार में भी अनगिनत संख्या में स्कूल बंद हुए। पूरे देश में मुहिम चल रही है। रिपोर्ट बताती है कि पूरे देश में 80 हजार से अधिक स्कूल बंद हुए हैं।
हमारे पास विश्वविद्यालय सेवा आयोग था। 2007 में उसे यह कह कर स्क्रैप (खत्म) कर दिया गया कि इसमें भ्रष्टाचार है। संस्था भ्रष्ट नहीं होती, व्यक्ति भ्रष्ट होता है। ऐसे में आप भ्रष्ट व्यक्ति को हटाते, नए लोगों को लाते तो ठीक होता, उसके बजाय आपने संस्थान को ही बंद कर दिया।
अगर संस्थान को बंद करना ही निदान है तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री तो सचिवालय में भी है, सचिवालय को ही बंद कर दीजिए!
इसी तरह ब्यूरोक्रेसी भी रहेगी, पंचायत भी रहेगी और ब्यूरोक्रेसी पंचायत पर अफसरसाही भी करेगी तो उस पंचायत का मतलब क्या होगा?
2006-07 में विश्वविद्यालय सेवा आयोग स्क्रैप हुआ तो 2017 में फिर यह बना। यानी बिहार सरकार को यह समझने में 10 साल लग गया कि विश्वविद्यालय में रिक्रूमेंट का कोई प्रोसेस होना चाहिए।
इस दौरान यह भी हुआ कि बिहार में ढेर सारे कॉलेज व विश्वविद्यालय खुले और रास्ता निजीकरण की ओर बढा।
स्कूल में आज भी पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं। बीच में जो शिक्षक भर्ती हुए वे प्रशिक्षित नहीं थे और उनका सर्टिफिकेट कहीं से, किसी तरह मैनेज किया गया।
अब अगर ये नहीं हुआ तो आपने भूमि, पानी व मनुष्य का प्रबंधन किया होता।
बिहार की आबादी 2050 तक 20 करोड़ होगी तो उस आबादी को सशक्त नागरिक बनाने के लिए जो करना होगा वह आप कर नहीं पा रहे हैं। डेमोग्राफिक डिविडेंट (जनसांख्यिकीय लाभांश – आश्रित आबादी की तुलना में अधिक कामकाजी आबादी का आर्थिक लाभ प्राप्त करना) आप नहीं दे पाएंगे और अगर आप डेमोग्राफिक डिविडेंट नहीं दे पाएंगे तो हमें और कोई कारण नहीं लगता है जिसके आधार पर आप कहेंगे कि बिहार आगे बढे।
अभी तक स्थिति यही हुई है। जिस कारण बिहार की साक्षरता दर सबसे कम, बिहार की आमदनी सबसे कम, महिलाओं का निरक्षरता सबसे ज्यादा, इनरॉलमेंट रेट सबसे कम, ड्राप आउट रेट करीब-करीब सबसे ज्यादा है। इन सब कारणों से जो ह्यूमेन डेवलपमेंट या मानव विकास होना था, मैन पॉवर की जो प्लानिंग होनी थी, वह नहीं हुई। इसलिए अच्छी मिट्टी, पर्याप्त पानी और मेहनती लोग होने पर भी हम आगे नहीं बढ सके।

डॉ डीएम दिवाकर अपने संस्थान के बारे में बताते हुए।
सवाल: बिहार की ओर से विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग होती रही है। केंद्र में कोई सरकार हो, वह इसे मानकों के आधार पर खारिज करती रही है। बिहार सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित राज्य है। क्या आपको लगता है कि अब वक्त आ गया है कि विशेष राज्य के दर्जे के मानक पर पुनर्विचार किया जाना चाहिए?
जवाब: हमारे यहां बाढ़ नियंत्रण का तरीका पुराना है। बाढ़ नियंत्रण का तरीका यह है कि आदमी को बचा लिया और पानी का बहा दिया। हम अपने जल संसाधन का कैसे बेहतर उपयोग कर सकते हैं, यह बात हमारे दिमाग में आती नहीं है। हमारे दिमाग में यह बात नहीं आती कि जल एक संसाधन भी है। उत्तर बिहार के 18 जिलों में एक तरफ बाढ़ भी आती है और दूसरी ओर वे सूखे से भी जूझते हैं।
पानी बह जाता है तब सुखाड़ की स्थिति होती है। मध्य बिहार का इलाका सुखाड़ का सामना करता है। कुल मिलाकर अगर आप पानी का प्रबंधन करते तो आपके पास हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी भी होती। पानी का इंतजाम भी होता और आप सिंचाई सुविधा भी दे पाते। आपके पास जो इतनी उर्वर भूमि है, जिस पर अभी डेढ़ फसल ही साल भर में ले पाते हैं, तब तीन फसलें ले पाते। बिहार की करीब आधी जमीन अंडर यूटिलाइज (भू संसाधन का कम उपयोग करना) है, यानी आप जमीन का उपयोग नहीं कर पाते हैं।
आप जिन इलाकों की बात कर रहे हैं, कोशी का इलाका उनका इतिहास देखिए। यह बताता है कि जहां से बांध नहीं जाना चाहिए, वहां से बांध गुजरा है, परिणाम क्या हुआ जो क्षेत्र कल डूब क्षेत्र नहीं था, वह अब डूब क्षेत्र है। दिनेश जी (बिहार की नदियों के चर्चित विशेषज्ञ दिनेश मिश्रा) लिखते हैं कि बांध की लंबाई जितनी बढती गई, डूब क्षेत्र भी उतना ही बढता गया। फिर डूब क्षेत्र का फायदा क्या है? बांध के किनारे वाले जो लोग हैं, उनकी जमीन दलदल हो गई। उससे उनके खेत खराब हो जाते हैं, बीमारियां होती हैं। कुल मिलाकर आपने जल का प्रबंधन किया ही नहीं। इससे क्या हुआ? जल ‘संसाधन’ बना ही नहीं, वह बहाव मात्र बनकर रह गया। हम पानी को सिर्फ ड्रेन आउट (बहाना) करना जानते हैं, कंजर्व करना (बचाना) नहीं।
अगर हम फसल की गहनता बढाये होते तो रोजगार बढा होता। हमारी फसल की गहनता 1.47 के करीब है। मतलब एक जमीन में 1.47 फसलें साल भर में होती है। यानी हम द्वीफसली राज्य भी नहीं हैं। अगर हम फसल गहनता बढा पाते तो इससे आमदनी व रोजगार बढता।
कृषि उत्पादन बाजार समिति को हमने 2006-07 में खत्म कर दिया और हमारी सरकार गर्व के साथ कहती है हमने तो इसको तोड़ दिया कोई हल्ला ही नहीं हुआ। लेकिन, आपने क्या नुकसान क्या यह आपको पता नहीं चला। उनको यह नहीं पता कि यहां के जो बड़े किसान हैं वे पंजाब जाकर अपनी फसल बेचते हैं। छोटे किसान डिस्ट्रेस (तनाव) में अपनी उपज बेचते हैं, क्योंकि समय पर सरकार खाद-बीज का इंतजाम नहीं करती है तो वे औने-पौने दाम में फसल बेच कर खाद-बीज का खर्च और घर के खर्चे आदि चलाते हैं।

डेवलपमेंट रिसर्च इंस्टीट्यूट के जरिये डॉ दिवाकर बिहार के विकास पर शोध और अध्ययन को बढाने के लिए प्रयासरत हैं।
आप यह कह सकते हैं कि बिहार में सड़कें बेहतर हो गई हैं, बिजली उपलब्ध हो गई है, लेकिन आप देखिए कि बिहार में सबसे महंगी बिजली है।
एक ओर हमारे पास स्कूल खोलने के लिए, अस्पताल खोलने के लिए जमीन नहीं है, दूसरी ओर सरकार अदानी जैसे बड़े उद्योगपति को एक रुपये प्रति एकड़ की दर से भागलपुर में एक हजार 50 एकड़ जमीन दे रही है। सरकार की ये नीतियां बिहार के विकास में बहुत बड़े बाधक हैं।
सवाल: राज्य में लोकल उद्योग व रोजगार की क्या संभावनाएं आप देखते हैं?
जवाब: जीएसटी के बाद संभावना नजर नहीं आती है। फिर भी जो लोग प्रशिक्षित हैं और गांव में रहना चाहते हैं, वे तो कुछ करेंगे। जब लॉकडाउन के दौरान लोग बाहर से आए थे तो उनकी कोविड प्रोफाइलिंग की जा रही थी, उस दौरान मैंने उनके स्कील या कौशल के प्रोफाइलिंग की बात कही थी, ताकि उन्हें उनकी क्षमता या कौशल के हिसाब से जिला उद्योग केंद्र के माध्यम से मदद कर रोजगारोन्मुख किया जाए व आत्मनिर्भर बनाया जाए।
कितने दिन आप यह कहते रहेंगे कि हमें ब्रिटिश ने ठगा, केंद्र ने ठगा, कहीं से तो शुरुआत कीजिएगा। लेकिन, जब आप शुरुआत करते हैं तो उसका हरेक एंगल पूंजीपतियों की ओर जाता है।
सवाल: सामाजिक दृष्टिकोण से जो सबसे कमजोर लोग होते हैं, उनका सामाजिक-आर्थिक हर दृष्टिकोण से सशक्तीकरण सबसे महत्वपूर्ण होता है। बिहार में जीविका दीदी और दूसरा शराबबंदी इन दो की चर्चा बार-बार होती है। आप इन दोनों का सामाजिक प्रभाव कैसे देखते हैं?
जवाब: शराबबंदी बहुत अच्छा कदम है – खासकर कम आमदनी वाले घरों के लिए। लेकिन मेरी राय ली गई होती या मुझसे पूछा गया होता तो मैं नहीं कहता कि शराबबंदी कर दें; मैं कहता कि शराब पर इतना टैक्स लगा दें कि वह सामान्य जनता की पहुंच से बाहर हो जाए। और शराब से होने वाली आमदनी भी नहीं रुकती, क्योंकि बड़े लोग आज भी पीते ही हैं, उनके पास होम डिलिवरी तो आती ही है। अखबार में कई बार निकलता है कि शराब चूहा पी गया। यदि शराबबंदी के नाम पर कोई पकड़ा जा रहा है तो माफिया नहीं पकड़ा जा रहा है, कैरियर पकड़ा जा रहा है। कैरियर का मतलब क्या हुआ। गरीब आदमी है, कोई रोजगार नहीं मिल रहा है तो तस्करी में शामिल हो गया। उसको तो आप पकड़ लेते हैं। लेकिन, उसी बहाने आप बड़े माफिया को नहीं पकड़ पाते हैं।
शराबबंदी से फायदा यह हुआ है कि गांवों में चौक-चौराहे पर भद्दी-भद्दी गालियां देने और मारपीट करने की घटनाएं बंद हो गई हैं और इसके वैल्यू को आप मॉनिटरी टर्म में कहीं कलकुलेट नहीं कर सकते हैं।
नोटबंदी के आसपास शराबबंदी को लेकर एक रिपोर्ट बनायी गयी थी, जिसमें इस कदम के लाभ बताए गए थे। इसमें कहा गया था कि लोग महंगी साड़ियां और गाड़ियां अब खरीदने लगे हैं। कहा गया कि दूध की खपत बढ गयी। लेकिन रिपोर्ट तैयार करने का वह समय क्या था, तो लगन का समय था। लगन में दूध की खपत बढ जाती है, साड़ी की खपत बढ जाती है और लोग गाड़ियां खरीदते हैं तो यह हुआ।
इन कारणों से जो लोग कहते हैं कि शराबबंदी का लाभ हुआ है तो ऐसे नहीं हुआ है। लेकिन हां लाभ हुआ है। अब गरीब के घर सब्जी आने लगी है, गरीब के बच्चों के बीच मारपीट कम हो गई।
दूसरी बात कि बिहार में जीविका दीदी का प्रयोग लाइवलीहुड मिशन वैशाली से शुरू हुआ। वहां अच्छा काम हुआ और फिर इसे जीविका दीदी कहा जाने लगा। अब तो सीएम जीविका दीदी योजना आ गई है। महागठबंधन के नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि हम इनकी तनख्वाह 30 हजार रुपये मासिक कर देंगे। अब ये एक अच्छी संख्या में वोटबैंक हैं।
लेकिन, इस तरह या इनके माध्यम से जो कलेक्शन व इन्वेस्टमेंट होता है, वह पैसा अंतरराष्ट्रीय बाजार में चला जाता है। जीविका दीदी अब फोकस हो गई हैं, उन्होंने अपनी पहचान बना ली और आप देखेंगे कि चुनाव के समय जीविका दीदी महत्वपूर्ण हो गई।
सवाल: भारत में चुनावों में यह ट्रेंड चल गया है कि पार्टियां या उनके गठबंधन लोकलुभावन घोषणाओं के जरिये चुनाव मैदान में उतरती हैं। झारखंड का पिछला विधानसभा चुनाव मईयां सम्मान योजना के नाम पर लड़ा गया। बिहार में भी कई लुभावनी चुनावी घोषणाएं की गई हैं। मेरा सवाल यह है कि इस तरह की घोषणाओं के लिए पैसे कहां से आएंगे और क्या उसका राज्य के राजकोष पर असर नहीं पड़ेगा?
जवाब: पैसे कहां से आएंगे, यह सवाल महागठबंधन से लोग पूछते हैं, लेकिन एनडीए से नहीं पूछते हैं कि वे पैसे कहां से लाएंगे। बिहार में जब शिक्षा के क्षेत्र में पांच लाख नौकरी देने की बात आयी थी तो भी कहने वाले लोग कह रहे थे कि पैसा कहां से लाएंगे। लोग असंसदीय शब्द का भी लोग प्रयोग कर रहे थे।
जब तक हम कोई एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हैं, जैसे खेती के लिए कानून बनाएं तो कहेंगे कहां से करेंगे, अगर मजदूर के लिए कहें तो कहते हैं कहां से करेंगे, नौजवान के लिए कहें तो कहते हैं कि कहां से करेंगे?
ये जो कहां से करेंगे वाली बात है, वह एंटी पुअर स्टेबलिशमेंट है। अभी बिहार में 20 से 25 लाख पद पर काम करने वाले हैं, बाकी पद खाली हैं। अगर हर प्रकार की इकाइयों को जोड़ें तो लगभग एक करोड़ रोजगार की जरूरत है। विपक्ष ने कहा है कि हर परिवार से एक को नौकरी देंगे। बिहार में पौने तीन करोड़ परिवार हैं। अब उनके लिए प्लानिंग करनी होगी। अब ऐसा नहीं है कि उन्हें कल ही नौकरी दे देंगे, लेकिन कोई तो आया जो यह कह रहा है कि रोजगार केंद्रित विकास कार्यक्रम हो।
इससे पहले जब हम बात कर रहे थे तो हमारा सारा ध्यान उत्पादन केंद्रित विकास पर था कि उत्पादन कैसे बढे, बिजली कैसे बने, सड़क कैसे बने, उत्पादन कैसे बढे, लोगों को सस्ता समान कैस मिले इस पर बात होती थी।
आज उन्होंने रोजगार नहीं नौकरी की बात कही है, सरकारी नौकरी हर परिवार में एक आदमी को। आप जानते हैं कि बिहार में जो प्यून की भी नौकरी होगी उसके लिए मैट्रिक पास होना जरूरी है। आपको तो पहले प्यून ही बहाल करना है तो उतने स्कूल चाहिए जहां से मैट्रिक पास उत्तीर्ण हों। तो फिर आप कितना स्कूल खोलेंगे, कितना ट्रेनिंग कॉलेज स्थापित करेंगे, कितना आप उनके लिए बाकी व्यवस्था करेंगे।
अगर प्रक्रिया शुरू हो जाएगी तो एक करोड़ नहीं 10 लाख ही सालाना रोजगार मिलेगा तो इससे एक वैक्यूम नहीं रहेगा। इसलिए मैं इस घोषणा को बहुत आवश्यक और बहुत महत्वपूर्ण समझता हूँ, बिहार के विकास के लिए। क्योंकि यह डिमांड भी बढाता है।

डॉ डीएम दिवाकर द्वारा स्थापित स्कूल फॉर लाइवलीहुड एंड प्रोग्रेस के जरिए स्थानीय बच्चों को ऐसी शिक्षा देने की कोशिश हो रही है, जिससे उनमें आत्मविश्वास आए और वे बाहरी दुनिया से प्रतिस्पर्धा कर सकें।
सवाल: चार दिन पहले मोकामा में जो हिंसा हुई और उसके बाद सोशल मीडिया, टीवी व अखबारों पर जो बहस शुरू हुई कि बिहार वही पुराने जातीय व सामाजिक संघर्ष की ओर जाएगा, उसे आप कैसे देखते हैं?
जवाब:मेरी समझ से इतिहास इस तरह खुद को नहीं दोहराता है। 10 साल या 20 साल पहले बिहार जहां खड़ा था, उसको आज खुद को रिपीट करना होगा तो वह वहां जाकर या इस तरह नहीं होगा। पहले जो नरसंहार हुए, घटनाएं घटी उससे निकलकर नई पीढ़ी पढी-लिखी है, चाहे वह पीड़ित की ओर से हो या पीड़क की ओर से। अब उनकी दिशा बदली है। वे अब उस तर्ज पर नहीं सोचते हैं, बूढे-पुराने लोग सोचते हैं कि बदला लेना है। लेकिन, नई पीढ़ी में अब यह बात नहीं है।
इसलिए कानून व्यवस्था का जो सवाल है, वह मूलतः विकास के लिए महत्वपूर्ण है। यदि आप कानून व्यवस्था ठीक नहीं रखेंगे तो विकास के लिए निवेश नहीं आएगा। आप जैसे कहते हैं कि जंगल राज के नाम पर हंगामा हो रहा है, लेकिन उसका दूसरा पक्ष देखिए, किस तरह से कानून व्यवस्था के बदलने से अब एक अलग संतुलन बना है और जाति का बंधन टूटा है। अभी भी बिहार हरियाणा नहीं है कि आप खाप पंचायत के जरिये कुछ कर लेंगे।
हमारे दलित भाई सवाल पूछते हैं, सरकार से भी पूछते हैं, वे सशक्त हुए हैं, मेरा मानना है कि नागरिक बनने की प्रक्रिया तेज हुई है। इस कारण से बिहार में सचेत लोगों की तादाद बढी है। हां, चुनौती बरकरार है कि अगर कानून-व्यवस्था ठीक नहीं हुई तो विकास नहीं कर सकेंगे। हाल ही में मोकामा में दुलारचंद की हत्या हुई, पटना में एक हत्या हुई, सीवान में एसआई की हत्या हुई, यह लॉ एंड ऑर्डर के सवाल को उठाता है कि अगर हमारा दारोगा सुरक्षित नहीं है तो आम नागरिक कहां से सुरक्षित होगा।
सवाल: अब जो नई सरकार बनेगी 10 दिन बाद, आज चार तारीख है। 10 दिन बाद 14 नवंबर को चुनाव परिणाम के बाद एक नया लोकतांत्रिक ढांचा राज्य के सामने होगा। बिहार के एक अध्येता के रूप में, गहराई से इस राज्य को समझने वाले विशेषज्ञ के रूप में वे कौन-सी तीन या पांच प्राथमिकताएं होनी चाहिए जिस दिशा में राज्य को बढना चाहिए?
जवाब: जैसा मैंने पहले ही कहा कि हमारे पास उर्वर भूमि है, पर्याप्त पानी है और मेहनती लोग हैं। अगर इन तीनों को आप संवार लेंगे तो बिहार आगे निकल जाएगा। आज भी बिहार से निकल कर लोग जब कहीं जाते हैं तो पलायन कर ही जाते हैं, डिस्ट्रेस माइग्रेशन में ही जाते हैं, लेकिन जहां जाते हैं अपनी छाप छोड़ते हैं। अगर उनकी कुशलता का हम विस्तार कर दें, तो ये दुनिया के बड़े-बड़े जो लेबर मार्केट हैं, जहां मनचाहे ढंग से पैकेज मिलता है, उसमें बिहार के लोग सबसे आगे होंगे। आज देखिए ब्यूरोक्रेसी में बिहार सबसे आगे रहता है।
अगर कुशल जल प्रबंधन और मनुष्य का निर्माण, शिक्षा व स्वास्थ्य की व्यवस्था और इनके लिए बाजार अगर सुरक्षित कर दी जाए तो कोई कारण नहीं बचेगा कि बिहार रुकेगा। तब बिहार जरूर आगे बढेगा। यह जरूरी है कि इनमें निवेश बढाया जाय। हम उम्मीद करते हैं कि जो भी नई सरकार हो, चाहे यही आए या मौजूदा विपक्ष चुन कर आए तो ऐसी सूरत में आवश्यकता है कि वे इस दिशा में काम करें और विकास करें।
एक सवाल है कि बिहार में रिजनल डिस्पेरिटी या क्षेत्रीय असमानता बहुत ज्यादा है। बिहार में 534 ब्लॉक हैं और हरेक ब्लॉक का इनके पास सेंसस का आठ इंडिकेटर का डेटा उपलब्ध है। अब यह बात दीगर है कि केंद्र की हमारी मजबूत सरकार सेंसस का रूटीन काम नहीं करवा पायी। हमारे पास नए आंकड़े नहीं हैं, जो पुराने आंकड़े हैं, उसके ही आधार पर आठ इंडिकेटर पर 534 ब्लॉक का कंपोजिट इंडेक्स बना कर तब उसमें क्रमवर अगड़े, पिछले ब्लॉक की पहचान करें। किस में क्या खूबी है या क्या विशेषता है या कौन कहां कमजोर है, उसकी पहचान कर लें। उसके आधार पर अगर प्लानिंग करें तो हम कह रहे हैं कि 2050 तक हम 20 करोड़ लोग होंगे तो उस समय तक हम कुछ न कुछ ऐसी व्यवस्था करने में कामयाब होंगे जिससे बिहार आगे होगा।
बिहार चुनाव के मद्देनजर बिहार की चुनौतियों व संभावनाओं पर यह इंटरव्यू भी पढ़ें –