विनोद हेंब्रम: 10 दिन रेल पटरियों पर भूखे पैदल चलने वाले प्रवासी मजदूर की कहानी

यह कहानी दुमका जिले के एक ऐसे प्रवासी श्रमिक की है जो पैसे के बिना पैदल ही रेल पटरियों के सहारे अपने घर के लिए निकले। कोरोना के दौर के बाद यह संभवतः इस तरह का पहला मामला है। इससे पहले उन्होंने जहां काम किया वहां उन्हें तनख्वाह नहीं मिली और काम के लिए साथ ले जाने वाले मेठ या ठेकेदार ने न तो उन्हें खोजने की कोशिश की और न ही उनके परिवार को कोई सही सूचना दी।

दुमका के मुड़ायाम गांव से राहुल सिंह की रिपोर्ट


मुड़ायाम (दुमका): विनोद हेंब्रम ने मंगलवार (पांच अगस्त, 2025) को कुछ महीनों के बाद अपने हरे-भरे गांव मुड़ायाम पहुंच कर राहत की सांस ली। विनोद ने इस दिन ज्यादातर वक्त अपने गांव के खेत, नदी और जंगल में घूमते हुए बिताया। इससे पहले उन्होंने महाराष्ट्र के व्यस्त शहर मुंबई-पुणे में तकरीबन ढाई-तीन महीना गुजारा। जहां काम किया वहां तनख्वाह नहीं मिलने और बंधक जैसे हालात में रखे जाने के बाद उन्होंने मुंबई के कल्याण स्टेशन से ट्रेन पकड़ी। किसी तरह वे ट्रेन से वे उत्तरप्रदेश के पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन पहुंचे, जिस पहले मुगलसराय के नाम से जाना जाता था। मुंबई से कई ट्रेनें सीधे पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन आती हैं तो उन्हें वहां तक पहुंचने में दिक्कत कम हुई। लेकिन, पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन पर उतरने के बाद उन्हें यह नहीं पता चला कि यहां से कौन-सी ट्रेन उन्हें उनके गृह जिला झारखंड के दुमका पहुंचा देगी। इन दोनों स्टेशनों के बीच कोई सीधी ट्रेन नहीं है और दूरी 500 किलोमीटर से ज्यादा। विनोद ने इस संवाददाता से कहा, “मेेरे पास टिकट खरीदने और खाने-पीने का पैसा नहीं था, इसलिए पैदल ही चल पड़े”।


ऐसे हालात में 34 साल के विनोद हेंब्रम ने लोगों से पूछा कि कौन-सी रेल लाइन झारखंड की ओर जाएगी और किसी से पुष्टि होने पर पैदल ही पटरियों के किनारे-किनारे चलना शुरू कर दिया, ताकि अपने गांव पहुंच सकें। यह इस साल जुलाई के आखिरी दिनों और अगस्त के शुरुआती दिनों की बात है। विनोद हेंब्रम नौ दिन व नौ रात पैदल चलने के बाद दसवें दिन बिहार के सासाराम पहुंचे। दोनों स्टेशनों के बीच की दूरी 102 किमी है। विनोद हेंब्रम ने इस संवाददाता को मंगलवार को अपने गांव पहुंचने पर बताया, “हम पैदल ही रेल पटरी पर चल रहे थे, क्योंकि मेरे पास पैसा नहीं था, इस दौरान रात होने पर आसपास की झोपड़ी में सो जाते थे”। यह पूछने पर भी भूख लगने पर क्या करते थे, तो उनका जवाब था पानी पी लेते थे।

पांच अगस्त को अपने गांव पहुंचने के बाद विनोद हेंब्रम।


विनोद हेंब्रम की यह कहानी कोरोना के दौर की याद ताजा करा देती है, जब देश भर के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले प्रवासी श्रमिक पैदल व अन्य माध्यमों से अपने घर की ओर चल पड़े थे। तब वर्ष 2000 में केंद्र सरकार ने संसद में एक सवाल के जवाब में बताया था कि मार्च 2000 से जून 2000 के बीच एक करोड़ प्रवासी श्रमिकों पैदल चलते हुए अपने घर पहुंचे

विनोद हेंब्रम के पिता मिसिल हेंब्रम ने इस संवाददाता से कहा, “मेरे दो लड़के हैं, बड़ा विनोद है, वह पहले दुमका में होटल में काम करता था, लेकिन किसी ठेकेदार के साथ काम करने तीन महीने पहले चला गया था और जिस टोली के साथ गया था उससे बिछड़ गया और भटक गया।” इससे आगे सवाल पूछने पर वे कहते हैं, “हम ज्यादा नहीं बता सकेगा, विनोद ही बता सकेंगे, उसका इंतजार कीजिए नदी तरफ गया है आ जाएगा”। हालांकि खेती व पशुओं की चरवाही करने वाले इस बुजुर्ग को अब इस बात का संतोष है कि उनका बेटा घर आ चुका है।

विनोद के पिता खेती क अलावा पशुपालन करते हैं, यह रस्सी चरने के लिए गए उनके पशुओं की है।

विनोद के परिवार में उनकी पत्नी उर्मिला मुर्मू व तीन बच्चे हैं, जिसमें एक बड़ी लड़की छठी में पढती है और दो और छोटे बच्चों में एक लड़का व एक लड़की है। विनोद दो भाई में करीब तीन एकड़ जमीन है जो दोनों के परिवार का गुजारा होने के लिए पर्याप्त नहीं है। हालांकि विनोद की पत्नी उर्मिला मुर्मू को झारखंड सरकार की मईयां सम्मान योजना से हर माह मिलने वाला ढाई हजार रुपये परिवार का एक बड़ा आर्थिक सहारा है।


दुमका में होटल में काम करने के दौरान विनोद की कुछ युवकों से दोस्ती हुई जो एक लोकल मेठ या एजेंट के साथ काम करने के लिए मुंबई जाने वाले थे। विनोद के गांव के युवक समुएल हेंब्रम कहते हैं, “विनोद हेंब्रम व उनके साथियों को एक मेठ मुंबइ की ट्रेन पर बैठा कर भेज दिया और वहां दूसरा एजेंट उन्हें रिसीव करने के लिए स्टेशन पर लगा हुआ था, लेकिन ट्रेन से उतरने के दौरान विनोद हेंब्रम अपने साथियों से बिछड़ गए। वे युवक उनके गांव या उसके आसपास के नहीं थे, इसलिए वे उनसे संपर्क नहीं कर सके”। विनोद बताते हैं कि साथियों से बिछड़ने के बाद वे बंबई से पुणे चले गए और वहां किसी गाय-भैंस पालने वाले के यहां काम करने लगे, लेकिन वहां उन्हें उनके काम का पैसा नहीं दिया जा रहा था, सिर्फ रहना-खाना हो पाता था। फिर वे वापस मुंबई के कल्याण स्टेशन आए और पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन आने वाली ट्रेन पर सवार हो गए। दीन दयाल उपाध्याय एक महत्वपूर्ण और बड़ा स्टेशन है जो देश के उत्तरी, पश्चिमी हिस्से को रेल लाइन से पूर्वी हिस्से से जोड़ता है और उसका एक महत्वपूर्ण पड़ाव है।

राजेश हेंब्रम के अनुसार, जब वे विनोद को लेने आरपीएफ के पास पहुंचे तो विनोद हेंब्रम के पैरों में चप्पल नहीं थी, यानी वे खाली पैर ही पटरियों के सहारे चल रहे थे।


ऐसा भी नहीं है कि विनोद हेंब्रम पहली बार अपने जिले व राज्य से बाहर कमाने गए थे। उनके चचेरे भाई राजेश हेंब्रम बताते हैं कि दो-तीन साल पहले वे काम करने जम्मू-कश्मीर की तरफ गए थे। उल्लेखनीय है कि लेह-लद्दाख में बड़ी संख्या में झारखंड के श्रमिक बॉर्डर रोड आर्गेनाइजेश (BRO) के सड़क निर्माण में काम करते हैं और झारखंड सरकार का श्रम विभाग बीआरओ में काम करने वाले अपने प्रवासी श्रमिकों के लिए अलग से अपना एक स्कीम संचालित करती है ताकि उनकी सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।


कैसे घर पहुंचे विनोद हेंब्रम?


विनोद हेंब्रम पंडित दीन दयाल उपाध्याय स्टेशन से रेल पटरियों के सहारे चलते हुए सासाराम स्टेशन तक नौ दिनों में पहुंचे। दसवें दिन जब वे सासाराम से पटरियों के सहारे आगे बढ रहे थे, इसी दौरान एक स्थानीय युवक ने इस तरह आगे बढते उन्हें टोका। सासाराम में एनजीओ ग्राम साथी के गिरिजा राम ने क्लाइमेट ईस्ट को बताया, “सासाराम स्टेशन पर कई लड़के पढाई करते हैं, इनमें से एक लड़के ने उन्हें रेल पटरियों पर चलते देखा तो टोका और पूछा कि ऐसे आप क्यों चल रहे हैं। इस पर विनोद ने उस लड़के से कहा कि मेरा घर झारखंड के दुमका जिले में है और मुझे वहां जाना है, यह रेल पटरी झारखंड पहुंचा देगी न। इतना कह कर आगे बढने लगे। इसके बाद उनके रेल लाइन पर असुरक्षित ढंग से आगे बढने पर उस लड़के ने इसकी सूचना आरपीएफ को दी, आरपीएफ ने विनोद को अपने कब्जे में लेकर एनजीओ ग्राम साथी केे सदस्यों को इसकी सूचना दी”।

विनोद हेंब्रम के चचेरे भाई राजेश हेंब्रम जो उन्हें घर लेकर आए। राजेश हेंब्रम भी रोजगार के लिए बाहर जाते हैं। वे गुजरात के एक धागा फैक्टरी में काम कर कुछ महीने पहले घर लौटे हैं। राजेश का कहना है कि हमें पता नहीं कि श्रमिकों का रजिस्ट्रेशन कहां और कैसे होता है।

ग्राम साथी एनजीओ के साथ काम करने वाले गिरिजा राम कहते हैं कि चूंकि हमारा काम झारखंड के दुमका व गोड्डा जिले में भी चलता है और हम बच्चों की सुरक्षा व बाल विवाह जैसे मुद्दों पर काम करते हैं, इसलिए आरपीएफ वालों ने हमें इस घटना की सूचना दी ताकि हम उक्त युवक को घर तक पहुंचाने में मदद कर सकें। गिरिजा राम कहते हैं कि हमने दुमका में अपनी टीम को इसकी सूचना दी और फिर वहां से शिकारीपाड़ा के बीडीओ एजाज अहमद तक सूचना पहुंचाई गयी। गिरिजा राम बताते हैं कि उस रात विनोद हेंब्रम को मैंने अपने घर में रखा और उसके घर वालों के आने का इंतजार किया। विनोद ने भी यह बात बतायी कि उसे सासाराम में ही भरपेट खाना कई दिनों बाद मिला।

राजेश के साथ समुएल हेंब्रम विनोद को घर लाने सासाराम-डेहरी ऑन सोन गए थे। समुएल को पंचायत समिति सदस्य से विनोद के बारे में सूचना मिली थी।

दुमका जिले के शिकारीपाड़ा ब्लॉक के बीडीओ ऐजाज अहमद ने क्लाइमेट ईस्ट से कहा, “हमारे प्रखंड क्षेत्र के युवक के सासाराम में होने की सूचना मिलने पर मैंने संबंधित पंचायत के पंचायत समिति सदस्य सगीर अहमद को इसकी सूचना दी और उनके परिवार व गांवा वालों को इस बारे में सूचित करने को कहा”। सगीर अहमद कहते हैं कि उन्होंने बीडीओ से सूचना मिलने के बाद इसके बारे में विनोद के गांव के समुएल हेंब्रम को इसकी सूचना दी। सूचना मिलने के बाद समुएल हेंब्रम और विनोद के चचेरे भाई राजेश हेंब्रम उन्हें लेने के लिए निकले और डेहरी ऑन सोन स्टेशन पर आरपीएफ ने चार अगस्त को विनोद हेंब्रम को उनके हवाले कर दिया और मंगलवार सुबह यानी पांच अगस्त 2025 को ये लोग धनबाद होते हुए दुमका जिला के अपने गांव पहुंचे। विनोद हेंब्रम के चचेेरे भाई राजेश बताते हैं कि विनोद के पैर में चप्पल भी नहीं थी और वे नंगे पैर आ रहे थे।


कैसा है मुड़ायाम गांव का हाल?


मुड़ायाम दुमका जिले के शिकारीपाड़ा ब्लॉक में स्थित एक संताल आदिवासी बहुल पंचायत है। इस पंचायत में नौ गांव हैं, जिसमें मुड़ायाम भी एक गांव है। स्थानीय लोगों के अनुसार, मुड़ायाम छह टोलो में बंटा है, जिसमें पांच टोला संतालों के हैं और एक टोले में बंगाली परिवार हैं। इस गांव की बेटी और पड़ोस की गंदरकपुर पंचायत की मुखिया सरोजमुखी हेंब्रम ने इस संवाददाता से कहा, “विनोद पहले गांव वालों के साथ काम करने बाहर गए थे तो दिक्कत नहीं हुई थी, इस बार वे बाहर के लड़कों के साथ गए थे, इसलिए परेशानी में पड़ गए”।

दुमका जिले के शिकारीपाड़ा ब्लॉक में स्थित मुड़ायाम गांव एक संताल आदिवासी बहुल गांव है। गांव के लोगों के पास छोटी जोत है और रोजगार के दूसरे विकल्प नहीं हैं, ऐसे में पलायन मजबूरी है।


वे कहती हैं, “स्थानीय स्तर पर रोजगार के विकल्प नहीं हैं, लोगों के पास पर्याप्त खेती भी नहीं है, इसलिए बाहर पलायन करना मजबूरी है”। सरोजमुखी हेंब्रम व गांव के अन्य लोग कहते हैं कि करीब 70 प्रतिशत युवा पुरुष काम के लिए बाहर जाते हैं। यहां से लोग गुजरात, महाराष्ट्र, केरल, जम्मू कश्मीर काम करने ज्यादा जाता है। पड़ोस के पश्चिम बंगाल भी कृषि मजदूर के रूप में काम करने लोग जाते हैं। ग्रामीणों के इस दावे की पुष्टि इस बात से भी होती है कि इस संवाददाता ने जिन 10-12 पुरुषों से बात की, उनमें से अधिकांश ने कहा कि वे कमाने बाहर जाते हैं और उन्होंने इन्हीं राज्यों के नाम प्रमुखता से लिए।


खुद विनोद के घर लाने वाले उनके चचेरे भाई राजेश हेंब्रम एक प्रवासी श्रमिक हैं। राजेश हेंब्रम गुजरात के भरूच में एक धागा कंपनी में काम करते थे और छह महीने पहले घर आए तो उसके बाद अभी नहीं गए हैं, हालांकि वे यह कहते हैं कि फिर काम करने जाएंगे। गांव के लोग अमूमन धान की रोपनी हो जाने के बाद जाते हैं और सामान्यतः छह से आठ महीने बाहर काम करते हैं और फिर कुछ महीने गांव में गुजारते हैं।

मुड़ायाम गांव के 70 प्रतिशत पुरुष सदस्य रोजगार के लिए पलायन करने को मजबूर हैं। संताल परिवारों से प्रमुख रूप से पलायन होता है। रोजगार के लिए गुजरात, जम्मू कश्मीर, महाराष्ट्र व केरल जैसे राज्य यहां के लोग जाते हैं।

यहां के श्रमिकों के पलायन का एक ट्रेंड यह है कि वे उस शहर या राज्य में जाते हैं जहां उनके गांव या आसपास के गांव का पहचान का आदमी पहले से काम कर रहा है या फिर कोई मेठ उन्हें एक ग्रुप में किसी राज्य में नौकरी दिलवाने की बात कह कर ले जाता है। झारखंड सरकार के श्रम विभाग के प्रावधानों के अनुसार, काम के लिए पलायन करने वाले मजदूरों का रजिस्ट्रेशन वैकल्पिक है यानी मजदूर उसे करवा सकते हैं या नहीं भी, लेकिन अगर कोई मेठ या ठेकेदार के रूप में श्रमिकों को काम के लिए बाहर ले जाता है तो उसके लिए यह अनिवार्य है कि वह श्रम विभाग में अपना रजिस्ट्रेशन करवाये और काम के लिए भेजे जाने वाले मजूदरों का विवरण दे। हालांकि व्यवहार में ऐसा बहुत कम होता है कि मेठ रजिस्ट्रेशन करवा कर श्रमिकों को ले जाते हों। रजिस्ट्रेशन के लिए राज्य सरकार ने श्रमाधान नाम से एक पोर्टल भी बनाया है।


जैसा कि सुरजमुखी हेंब्रम ने कहा, “विनोद हेंब्रम करबिंधा तरफ का एक मेठ काम के लिए दूसरे लड़कों के साथ लेकर गया था, विनोद की पत्नी उसके घर एक बाद पूछने गई थी तो उन्हें कोई जानकारी नहीं मिली”।

काम के अधिक घंटे, मामूली तनख्वाह


मुड़ायाम गांव के कई प्रवासी श्रमिकों ने बताया कि उनकी तनख्वाह सामान्यतः नौ-दस हजार रुपये महीने की होती है और 12 घंटे काम करवाया जाता है। नोएल मरांडी नामक एक युवक ने कहा, “हम मुंबई काम करने जाते हैं, तीन महीना पहले वहां से आये, एयरपोर्ट पर काम कर रहे थे और मात्र नौ हजार रुपये दे रहा था, इसलिए घर आ गए”। हालांकि वे रोजगार के लिए अभी भी बाहर जाने को तैयार हैं और खुद के अनुकूल अवसर की तलाश में हैं।


मनोज हेंब्रम नामक एक 48 वर्षीय व्यक्ति ने कहा कि वे पहले प्रवासी श्रमिक के रूप में कई राज्यों में काम कर चुके हैं, लेकिन अब एक साल से घर में ही रहते हैं। उन्होंने बताया कि पिछले साल अहमदबाद में एक स्टील कारखाने में काम करने गए थे, तीन महीने काम किया फिर वापस आ गए। मनोज हेंब्रम के अनुसार, वहां उन्हें 12 घंटे काम का करीब 10 हजार रुपये मिल रहा था। हालांकि उससे पहले वे केरल में इलाइची की खेती में काम करने गए थे। मनोज कहते हैं, इलाइची की खेती का काम में दिक्कत नहीं थी, वहां मेरा दामाद काम करता है तो उसी के साथ गए थे।

मनोज के बड़े बेटे 25 वर्षीय अलबिनोस हांसदा इस समय जम्मू कश्मीर कमाने गए हैं। मनोज कहते हैं कि बड़ा लड़का शादीशुदा है, उसे राज्य सरकार की योजना से अबुआ आवास मिला है, लेकिन घर की ढलाई के लिए पैसा नहीं है, इसलिए कमाने चले गए। पूछने पर मनोज कहते हैं, कह रहा था कि 2.20 लाख रुपये अबुआ आवास का मिलेगा, लेकिन करीब पौने दो लाख ही मिला, ईटा, सीमेंट, बालू इतना महंगा है, पैसा खत्म हो गए तो ढलाई नहीं हो सकी, इसलिए वह कमाने के लिए गया है ताकि घर की ढलाई कर सके।

मनोज हेंब्रम के बेटे कमाने के लिए बाहर इसलिए गए हैं ताकि पैसे जोड़ कर घर की ढलाई करा सकें। यह मकान उनके बेटे ने राज्य सरकार के अबुआ आवास स्कीम से बनाया लेकिन ढलाई के लिए पैसे कम पड़ गए।


मनोज हेंब्रम कहते हैं, “हमारे पास खेत भी डेढ-दो बीघा है और उससे गुजारा नहीं होगा, कोई रोजगार नहीं है, इसलिए बाहर जाना होता है। उनके अनुसार, इस साल बारिश अच्छी हो रही है तो बढिया है, नहीं हो हर साल इतनी अच्छी बारिश नहीं होती है और लोगों के बाहर जाने की संख्या और बढ जाती है”।


पंचायतों की भूमिका


झारखंड सरकार ने प्रवासी श्रमिकों के लिए रजिस्ट्रेशन का प्रावधान किया है। कोरोना संक्रमण के दौरान झारखंड सरकार की पहल पर पंचायतों के द्वारा काम के लिए जाने वाले प्रवासी मजदूरों का ब्यौरा रखने का चलन शुरू हुआ था, लेकिन बाद में यह शिथिल हो गया। मुड़ायाम पंचायत की मुखिया निर्मला मुर्मू कहती हैं, “पहले हम कमाने के लिए बाहर जाने वालों का विवरण रखते थे, लेकिन अब नहीं रखते हैं”। वे यह स्वीकार करती हैं कि श्रम विभाग की ओर से उन्हें मजदूरों का रजिस्ट्रेशन कराने के बारे में जानकारी दी गई है, हालांकि सभी लोग रजिस्ट्रेशन नहीं करवा पाते हैं। निर्मला मुर्मू कहती हैं कि खेती का काम खत्म हो जाने के बाद लोग ज्यादा बाहर जाते हैं। वहीं, गंदरकपुर की सरोजमुखी हेंब्रम कहती हैं, “कोई बाहर जाने के लिए रजिस्ट्रेशन हेतु आवेदन करता है तो हम उनकी पहचान को प्रमाणित करते हैं और उसे थाना भेज देते हैं, थाने से वह जिले में व श्रम विभाग के पास जाता होगा”।

विनोद हेंब्रम।

जमीनी स्तर पर श्रमिकों से बातचीत में यह तथ्य भी पता चलता है कि अधिकतर को रजिस्ट्रेशन के नियमों के बारे में पता नहीं है और उन्हें यह भी नहीं पता है कि यह किस कार्यालय से होगा और वह कार्यालय जिला मुख्यालय में कहां है। ऐसे में इस प्रावधान का विकेंद्रीकरण पंचायत स्तर पर करना एक अधिक सटीक विकल्प हो सकता है।

(तसवीरें: राहुल सिंह/क्लाइमेट ईस्ट।)

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