सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज के तीन राज्यों पर केंद्रित एक अध्ययन में पाया गया कि वन्य अभ्यारण्यों के आसपास स्थित स्कूलों के बच्चों के लिए पर्यावरण अनुकूल शिक्षण पद्धति विकसित करने से वन्यजीवों के प्रति उनकी संवेदशीलता बढी है और उनके अंदर सह अस्तित्व की भावना विकसित होने में मदद मिली है।
बेंगलुरु: सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज के एक नए अध्ययन के अनुसार, देश के 11 वन्यजीव अभयारण्यों के आसपास स्थित 200 सरकारी स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम के संचालन से बच्चों के पर्यावरण ज्ञान में 34 प्रतिशत और वन्यजीवों के प्रति सुरक्षित व्यवहार में 31 प्रतिशत तक का सुधार हुआ है। दक्षिण भारतीय राज्यों गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु में वन्यजीव अभ्यारण्यों के आसपास स्थित स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा का यह कार्यक्रम वाइल्ड शाले(Wild Shaale) के नाम से संचालित किया गया।
इस शोध में यह तथ्य सामने आया कि तमिलनाडु के छात्रों ने अधिक सहानुभूमि और वन्यजीव समर्थक दृष्णिकोण दिखाया, जबकि गोवा के छात्रों के पास मजबूत आधारभूत पर्यावरण ज्ञान था। वहीं, तमिलनाडु के छात्र जिनका शुरुआती स्तर सबसे कम था, उन्होंने सबसे अधिक शिक्षण प्रगति दिखायी।
डॉ कृति के करंथ (Krithi K. Karanth), डॉ श्रुति उन्नीकृष्णन (Sruthi Unnikrishnan) और डॉ गैबी सालाजार (Gabby Salazar) के इस अध्ययन का नाम “विविध सामाजिक पर्यावरणीय संदर्भों में पर्यावरण शिक्षा का विस्तार : भारत में वाइल्ड शाले कार्यक्रम” ( “Scaling environmental education across diverse socio-ecological contexts: Insights from the Wild Shaale program in India”) है। इससे मिली अंतरदृष्टि ने दिखाया कि राज्यों के बीच बड़े अंतर के बाजवूद वाइल्ड शाले के स्थान आधारित दृष्टिकोण ने सभी परिदृश्यों में सीखने को बढावा दिया। यह साबित करता है कि स्थानीय स्तर पर तैयार की गई पर्यावरण शिक्षा बड़े स्तर पर प्रभावी हो सकती है और समुदाय को ध्यान में रख आरंभिक उम्र में सहानुभूति और सुरक्षा को विकसित कर सकती है। यह पहल दुनिया भर में संरक्षित हॉटस्पॉट में जैव विविधता की रक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह अध्ययन जिन वन अभ्यारण्यों पर केंद्रित हैं, वे भारत के तीन राज्यों व पश्चिमी घाट में स्थित हैं। पश्चिमी घाट एक जैव विविधता हॉटस्पॉट है जो असाधारण वन्यजीवों के साथ उन लाखों लोगों का घर है जो उनके साह जीवन व्यतित करते हैं। इन क्षेत्रों में अक्सर मानव-वन्यजीव संघर्ष बढता है और यह समुदाय और संरक्षण प्रयासों के लिए खतरा पैदा करता है। ऐसे में पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम वन्यजीवों के प्रति सहानुभूति विकसित करने और सुरक्षित सह अस्तित्व व्यवहारों को प्रोत्साहित करने के लिए एक प्रभावी उपाय की रतह है। हालांकि ऐसे कार्यक्रमों को विविध सामाजिक और पारिस्थितिकी संदर्भाें में लागू करना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। इस अध्ययन में यह मूल्यांकन किया गया कि पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम को पश्चिमी घाट में प्रभावी रूप से लागू किया जा सकता है।
वाइल्ड शाले कार्यक्रम को सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडीज ने डिजाइन किया है और इसका उद्देश्य वन्यजीव अभ्यारण्यों के पास ग्रामीण स्कूलों में सहभागितापूर्ण संरक्षण आधारित सीख को पहुंचाना है। जून 2022 से फरवरी 2023 के दौरान इस कार्यक्रम ने गोवा, कर्नाटक व तमिलनाडु के 200 सरकारी स्कूलों के 10 से 13 वर्ष आयुवर्ग के 7381 बच्चों में पहुंच बनायी।

इस मैप पर तीनों दक्षिण भारतीय राज्यों में अलग-अलग रंग के डॉट के जरिये स्कूलों की मौजूदगी को दिखाया गया है।
इस अध्ययन में पाया कि वाइल्ड शाले में भाग लेने वाले छात्रों के पर्यावरणी ज्ञान, वन्यजीवों के आसपास सुरक्षित व्यवहारों की समझ और पर्यावरणीय दृष्टिकोण में मामूली ही लेकिन सकारात्मक बदलाव व महत्वपूर्ण सुधार हुआ है। पर्यावरण ज्ञान से संबंधित प्रश्नों के सही उत्तरों की दर में अधिकतम 25 प्रतिशत अंकों तक की वृद्धि देखी गई और कार्यक्रम के बाद छात्रों के सुरक्षा संबंधी प्रश्नों पर सही उत्तर देने की संभावना दो से तीन गुना अधिक हो गई। उदाहरण के लिए गोवा में उन छात्रों का अनुपात जो सही तरीके से पहचान सके कि जानवरों के जीवित रहने के लिए क्या जरूरी है, 40 से बढकर 66 प्रतिशत हो गए। वहीं कर्नाटक में सुरक्षा से जुड़े सही उत्तर 24 से बढकर 49 प्रतिशत हो गए। यह सुधार सभी लिंग में सामान रूप से देखा गया।
साथ ही शोध से राज्य स्तर पर आरंभिक दृष्टिकोणों और सीखने के परिणामें में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय भिन्नताएं भी उजागर हुई हैं। कर्नाटक व तमिलनाडु के छात्रों ने गोवा की तुलना में वन्यजीवों के प्रति अधिक सकारात्मक आरंभिक नजरिया दिखाया।
इस अध्ययन की मुख्य लेखिका डॉ कृति के करंथ कहती हैं, “वाइल्ड शाले की विशेषता यह है कि हम कार्यक्रम के साथ-साथ मूल्यांकन अनुसंधान भी करते हैं। इससे लगातार हमें सीखने और कार्यक्रम को सुधारने में मदद मिलती है। यह देखना बहुत उत्साहजनक है कि बच्चों के साथ काम करने से हमें ऐसे अदभुत अंतरदृष्टि मिलती है, जो भारत के वन्यजीवों और प्राकृतिक स्थानों के दीर्घकालिक संरक्षण को सक्षम बना सकती हैं”।
अध्ययन की सह लेखिका डॉ गैबी सालाज़ार कहती हैं, “यह शोध महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाता है कि एक पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम जैव विविधता हॉटस्पॉट में स्थानीय संदर्भों के अनरूपु छोटे-छोटेक्षेत्रीय अनुकूलनों के साथ प्रभावी रूप से विस्तार कर सकता है। हम इस निष्कर्ष से भी उत्साहित थे कि तीनों राज्यों में बच्चों के वन्यजीवों के प्रति प्रारंभिक दृष्टिकोण पहले से ही सकारात्मक थे”।