बंगाल के छोटे मछुआरों ने मांगा पानी पर अधिकार, जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान की भी हो भरपाई

छोटे मछुआरों के संगठन का कहना है कि तटों व पानी में बढते इन्फ्रास्ट्रक्चर व विकास परियोजनाओं के कारण उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है। मछुआरों ने राज्य सरकार से वेस्ट बंगाल इनलैंड फिशरीज पॉलिसी 2023 रद्द करने की भी मांग की है।

कांथी (पूरब मेदिनीपुर) : पश्चिम बंगाल में मछुआरों के सबसे बड़े संगठन दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम के सहयोगी संगठन पूरब मेदिनीपुर मत्स्यजीवी फोरम (Purba Medinipur Matsyajibi Forum) एवं कांथी महाकुमा खोटी मत्स्यजीवी यूनियन (Kanthi Mahakuma Khoti Matsyajibi Union – Contai Sub-Division Fish Landing Centre Fishworkers Union) ने मछुआरों को पानी पर उनका अधिकार दिए जने की मांग की है। दोनों संगठनों ने अपने एक संयुक्त बयान में कहा है कि छोटे मछुआरों के हितों का लगातार दमन हो रहा है।

विश्व मत्स्यकी दिवस के मौके पर इस साल पश्चिम बंगाल के मछुआरों ने अपनी मांगों को लेकर कई दिनों तक आंदोलन चलाया। फोटो क्रेडिट: दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम (DMF)

दोनों संगठनों ने अपने संयुक्त बयान में कहा है कि छोटे मछुआरों और मछली पकड़ने वाले स्थलों जैसे तटीय पानी, नदियों, खाड़ियों, वॉटरबॉडीज और वहां तक पहुंचने के लिए संसाधनों के उपयोग व प्रबंधन का अधिकार व मान्यता दी जाए। साथ ही पर्यावरणीय क्षति पहुंचाने वाले बॉटम ट्रॉलिंग, पेयर-ट्रॉलिंग और एलइडी लाइट फिशिंग पर रोक लगायी जाए। अत्यधिक झींगा एक्वाकल्चर पर रोक लगायी जाए और इसके बजाय वहनीय मिश्रित मत्स्य कृषि को बढावा दिया जाए। जलवायु संकट की वजह से मछुआरों को हो रहे वित्तीय नुकसान के लिए मौसमी मुआवजा दिया जाए। मछुआरों के नुकसान को कम करने के लिए जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में गांव की जमीन के उपयोग और ड्रेनेज सिस्टम को फिर से व्यवस्थित करने और उसे री-प्लान करने को मंजूरी दी जाए। छोटे स्तर पर मछली पकड़ने की गतिविधि की पूरी भागीदारी के साथ स्थानीय व गांव के स्तर पर आपदा प्रबंधन की योजना बनायी जाए।

मछुआरा संगठन नदी, समुद्र व जलस्रोतों में प्लास्टिक प्रदूषण रोकने की भी मांग कर रहे हैं।

इसके साथ ही महिला मछुआरों की रोजी-रोटी की सुरक्षा की गारंटी दी जाए। फिशर रजिस्ट्रेशन कार्ड में मछली पकड़ने की जगहों के नाम पर गलतियों को ठीक किया जाए। तटों व नदियों में प्लास्टिक कचरे व बहाव को रोका जाए। नदियों, समुद्र और प्राकृतिक जलस्रोतों में छोटे स्तर के मछुआरों को विशिष्ट अनुमति दी जाए। साथ ही नदियों व तटीय इलाकों में छोटे स्तर पर मछली पालन के लिए फिशरीज से जुड़ा आधारभूत संरचना विकसित करें। हल्दिया इंडस्ट्रियल कांप्लेक्स से बिना उपचारित गंदा पानी छोड़ना बंद किया जाए। विदेशी व घरेलू मालवाहक यान और जहाहों से छोटे मछुआरों के जाल को होने वाले नुकसान को रोका जाए। पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा लाए गए वेस्ट बंगाल इनलैंड फिशरीज पॉलिसी 2023 को रद्द किया जाए। मछली पकड़ने के बैन पीरियड के लिए समुद्र साथी मुआवजा स्कीम को तीव्रता से लागू किया जाए।

अपने अधिकारों की मांग को लेकर प्रदर्शन करतीं महिला मछुआरा। फोटो क्रेडिट: दक्षिण बंग मत्स्यजीवी फोरम (DMF)

मछुआरा संगठनों ने अपने बयान में कहा है कि पूरब मेदिनीपुर जिले के छोटे मछुआरे विश्व मत्स्यकी दिवस के मौके पर समुद्र के तट पर मार्च कर रहे हैं और छोटे पैमाने पर मछली पालन की और नीति के लिए लोगों का समर्थन जुटा रहे हैं। हमारा नारा है पानी की रक्षा करो, तट की रक्षा करो और तटीय इलाकों के मछुआरों की रक्षा करो। ऐसी यात्रा इस साल 18 नवंबर से शुरू की गई थी। 1997 में 21 नवंबर को पर्यावरण के अनुकूल व वहनीय मछली पालन की पहचान और अपील के लिए अंतरराष्ट्रीय मत्स्यकी दिवस घोषित किया गया था।

पूरब मेदिनीपुर के मछुआरों का यह मार्च 2005 के कोस्टल मार्च की 20वीं सालगिरह के रूप में मनाया गया है, जिसमें पहली बार यह मुद्दा उठाया गया था कि कैसे पश्चिम बंगाल के तटों और समुद्र के औद्योगिकीकरण से मछुआरों का अस्तित्व खत्म हो रहा है।

पूरब मेदिनीपुर मत्स्यजीवी फोरम की महिला शाखा की श्रीदेवी कर भुनिया। Photo Credit – DMF.

इस मार्च के जरिये छोटे मछुआरों ने तटीय जमीन व पानी पर उनके अधिकारों को पूरी तरह से कानूनी पहचान देने की मांग की है। ऐसी पहचान सुनिश्चित नहीं होने की वजह से छोटे स्तर के मछुआरों को उनकी जमीन से बेदखल किया जा जा रहा है, बिना किसी सही प्रक्रिया के। राज्य की मदद से जमीन को औद्योगिक क्षेत्र, रियल एस्टेट, रिक्रिएशनल, पोर्ट, ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक इन्फ्रास्ट्रक्चर में बदला जा रहा है। यह कहा गया है कि तट के औद्योगिकीकरण की वजह से राइट टू वॉटर यानी पानी पर अधिकार कानून लाने की जरूरत है।

बयान में यह भी कहा गया कि सी-फूड यानी समुद्र से प्राप्त होने वाले खाद्य चीजों का औद्योगिकीकरण छोटे स्तर के मछुआरों के वजूद के लिए खतरा बन गया है।

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