क्या है संताल आदिवासियों का सकरात पर्व, क्या है मान्यताएं व रस्म?

पूर्वजों व ईष्ट देवताओं को याद करने व गांव को चलाने वालों के प्रति सम्मान प्रकट करने का है यह अवसर


दुमका: दिसोम मारंग बुरु युग जाहेर अखड़ा और सरी धर्म अखड़ा द्वारा झारखंड के दुमका जिले में संताल आदिवासियों के सकरात पर्व मनाया गया। दुमका जिले के दुमका प्रखंड के दुंदिया और धतिकबोना गांव में बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में इस पर्व के प्रमुख रस्मों को मनाया गया।

यह पर्व दो दिनों तक मनाया जाता है। पर्व के पहले दिन को “हाकु काटकोम माह” कहते हैं। इस दिन को लोग जील पीठह(मांस लगा हुआ रोटी), मांस, मछली, सुनुम पीठह, कई तरह के सब्जी आदि खाते हैं।

दूसरे दिन सुबह नहा-धोकर घर में पूर्वजों व मारंग बुरु आदि ईष्ट देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। .इस दिन अपने पूर्वजों की तीन पीढी का नाम लिया जाता है और गुड़, चुूड़ा, सुनुम पीठह आदि भोग में चढ़ाते हैं। इस दिन नए बरतन एवं नए चूल्हे पर खाना बनाने की भी प्रथा है। उसके बाद लोग शिकार की खोज में पहाड़, जंगल, खेत-खलिहान जाते हैं, जिसे “सिंदरा” कहते हैं।

सकरात पर्व के दौरान पूर्वजों व ईष्ट देवताओं को याद करने के साथ सिंदरा की भी परंपरा है।

सिंदरा से वापस आने के बाद लोग “बेझातुंज” करते हैं। बेझातुंज में केला या अंडी के पेड़ के टुकड़े को पूरब दिशा में जमीन में गाड़ा जाता है और पश्चिम से लोग इस पर तीर से निशाना लगाते हैं, जो इस पर निशाना लगाने में सफल होते हैं, उन्हें सम्मानित किया जाता है।

बेझातुंज के बाद तीर-धनुष को लेकर कई अन्य प्रतियोगिता भी ग्रामीण करते हैं। उसके बाद केला या अंडी के पेड़ के टुकड़े को पांच बराबर हिस्सों में काटा जाता है। उसके बाद उस सभी टुकड़े को हल्का बीच में काटा जाता है और एल नुमा बनाया जाता है, फिर इन टुकड़ो को लोग नाचते-गाते हुए गांव के “लेखा होड़”(गांव का व्यवस्था चलाने वाले लोग) के घर ले जाते हैं।

सकरात पर्व का आनंद लेते ग्रामीण।

एक टुकड़ा मंझी थान में, दूसरा टुकड़ा गुडित के घर के छप्पर पर, तीसरा टुकड़ा जोग मंझी के घर के छप्पर पर, चौथा टुकड़ा प्राणिक के घर के छप्पर परं और पांचवां टुकड़ा नायकी के घर के छप्पर में रखा जाता है। ये सभी गांव के “लेखा होड़” (गांव को चलाने वाले लोगं) होते हैं। उसके बाद सभी ग्रामीण नाचते-गाते हैं और भोजन का आनंद लेते हैं। इस आयोजन को सफल बनाने में प्रदीप मुर्मू, कारण हंसदा, नंदलाल सोरेन, सुनील मरांडी, सोरेंदार मरांडी आदि ने योगदान दिया।

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