सड़क नहीं तो वोट नहीं, छोटा गुलामशुली के ग्रामीणों ने कुल्ही दुरुप कर खोला मोर्चा

विधायक,सांसद को दो-दो बार आवेदन देने के बाद भी नही बन रही सड़क

दुमका: दुमका जिले के रानिश्वर प्रखंड के गुलामशुली गांव के छोटा गुलामशुली टोला में सड़क की बदहाली को लेकर ग्रामीणों का आक्रोश अब खुलकर सामने आ गया है। वर्षों से पक्की सड़क की मांग कर रहे ग्रामीणों ने कुल्ही दुरुप (बैठक) कर प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति नाराजगी जताई। ग्रामीणों ने दो टूक कहा कि अब आश्वासन नहीं, सड़क चाहिए। जल्द सड़क का निर्माण नहीं हुआ तो आगामी किसी भी चुनाव में वे वोट नहीं देंगे। गुलामशुली गांव में करीब 110 आदिवासी परिवार निवास करते हैं। गांव दो टोलों – बड़ा गुलामशुली में 53 घर और छोटा गुलामशुली में 57 घर – में बंटा है। दोनों टोलों के बीच करीब डेढ़ से दो किलोमीटर की दूरी है। विडंबना यह है कि आजादी के 79 वर्ष और झारखंड गठन के 26 वर्ष बाद भी छोटा गुलामशुली पक्की सड़क के इंतजार में है। ग्रामीणों ने बताया कि करीब बीस(20) वर्ष पहले सड़क के नाम पर पुल-पुलिया का निर्माण और बोल्डर बिछाने का काम किया गया था, लेकिन इसके बाद पक्की सड़क बनाने की सुध किसी ने नहीं ली। आज स्थिति यह है कि रास्ते पर साइकिल चलाना तो दूर, पैदल चलना भी मुश्किल हो गया है।

बीमार को खाट पर ले जाने की मजबूरी


ग्रामीणों ने अपनी पीड़ा बताते हुए कहा कि छोटा गुलामशुली तक चारपहिया वाहन, टोटो और एंबुलेंस तक नहीं पहुंच पाते। किसी के बीमार पड़ने या गर्भवती महिला को अस्पताल ले जाने की जरूरत पड़ने पर मरीज को करीब डेढ़ से दो किलोमीटर तक खाट पर बैठाकर बड़ा गुलामशुली लाना पड़ता है। इसके बाद ही एंबुलेंस या अन्य वाहन से अस्पताल पहुंचाना संभव होता है।

ग्रामीणों का कहना है कि सड़क की स्थिति इतनी खराब है कि डॉक्टर भी गांव आने से कतराते हैं। ऐसे में गंभीर बीमारी या प्रसव जैसी आपात स्थिति में ग्रामीणों की परेशानी और बढ़ जाती है।

सड़क नहीं, तो शिक्षा और रोजगार भी प्रभावित


पक्की सड़क के अभाव का असर बच्चों की पढ़ाई पर भी पड़ रहा है। बरसात और खराब रास्ते के कारण स्कूल आने-जाने में बच्चों को परेशानी होती है। ग्रामीणों को हाट-बाजार जाने के लिए भी भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

बदहाल सड़क।

शादी-विवाह में भी टोला की बदहाली साफ दिखाई देती है। ग्रामीणों ने बताया कि जब छोटा गुलामशुली में शादी होती है तो बरात की गाड़ियों को करीब करीब डेढ़ से दो किलोमीटर दूर बड़े गुलामशुली में ही छोड़ना पड़ता है और बरातियों को पैदल टोला तक जाना पड़ता है। सड़क की समस्या के कारण बेटियों और बेटों के लिए वैवाहिक रिश्ते खोजने में भी परेशानी होती है।

ग्रामीणों का सवाल – हमारी सुध लेने वाला कोई क्यों नहीं?


ग्रामीणों ने कहा कि उनकी समस्याओं को जानने और देखने के लिए अब तक कोई बड़ा अधिकारी छोटा गुलामशुली टोला नहीं पहुंचा। ग्रामीणों का कहना है कि वे जनप्रतिनिधियों को इस उम्मीद से चुनते हैं कि वे जनता की समस्याओं का समाधान करेंगे, लेकिन वर्षों से सड़क की मांग करने के बावजूद उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है।

ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि चुनाव के समय नेता गांव-गांव पहुंचकर वोट मांगते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद जनता की समस्याएं नजर नहीं आतीं।

सांसद और विधायक को दो-दो बार आवेदन, फिर भी नतीजा शून्य


ग्रामीणों के अनुसार दुमका सांसद नलिन सोरेन और शिकारीपाड़ा विधायक आलोक कुमार सोरेन को सड़क निर्माण के लिए दो-दो बार आवेदन दिया जा चुका है। इसके बावजूद अब तक सड़क निर्माण की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हुई है। ग्रामीणों ने बताया कि पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान सड़क नहीं होने से नाराज होकर उन्होंने मतदान नहीं करने का निर्णय लिया था। उस समय विधायक गांव पहुंचे और ग्रामीणों से कहा कि वोट बर्बाद नहीं करें, चुनाव जीतने के बाद छोटा गुलामशुली को सड़क से जोड़ दिया जाएगा। ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव बीत गया, आवेदन भी दिए गए और आश्वासन भी मिला, लेकिन सड़क आज तक नहीं बनी।

बदहाल सड़क पर ही बैठ कर कुल्ही दुरुप करते ग्रामीण।

अब ग्रामीणों ने लिया आर-पार का फैसला


लगातार उपेक्षा से नाराज ग्रामीणों ने कुल्ही दुरुप में स्पष्ट निर्णय लिया कि यदि जल्द छोटा गुलामशुली टोला को पक्की सड़क से नहीं जोड़ा गया, तो आगामी किसी भी चुनाव में ग्रामीण मतदान नहीं करेंगे।

ग्रामीणों ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, सांसद नलिन सोरेन, विधायक अलोक कुमार सोरेन और प्रशासन से मांग की है कि मामले को गंभीरता से लेते हुए तत्काल स्थल का निरीक्षण किया जाए और पक्की सड़क निर्माण की प्रक्रिया शुरू की जाए। ग्रामीणों का कहना है कि विकास के दौर में जब हर गांव तक सड़क पहुंचाने की बात हो रही है, तब 57 आदिवासी परिवारों का टोला आज भी सड़क के लिए संघर्ष कर रहा है, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

कुल्ही दुरुप में दिनेश सोरेन, गंगा टुडू, अनिल मुर्मू, लखन टुडू, धूमा मुर्मू, ठाकुर सोरेन, सोमलाल मरांडी, जसमी सोरेन, चुड़की किस्कू, सोनामुनी मरांडी, ताना सोरेन, रासमुनी किस्कू, होपना मुर्मू, टोनूय हेम्बम, सुखी हेम्बम, छोटी किसकू, बिटियां हांसदा, सजली सोरेन सहित बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित थे।

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