निलगिरि मार्टेन एक ऐसा संकटग्रस्त जीव है, जिस पर काफी कम अध्ययन किया गया है और कम मीडिया रिपोर्टिंग हुई है। दक्षिण भारत में पाया जाने वाला यह जीव पूर्व में शहद के छत्तों पर हमले की वजह से लोगों के निशाने पर होता था और इसका शिकार किया जाता था, लेकिन सख्त नियमों व जागरूकता की वजह से अब इसमें कमी आयी है।
निलगिरि मार्टेन भारतीय मूल की एक मार्टेन प्रजाति है, जो निलगिरि की पहाड़ियों व पश्चिमी घाट में पायी जाती है और अपने आकर्षक रंगरूप में कारण ध्यान खींचती है। यह लगभग 50 से 70 सेंटीमीटर लंबा और गहरे भूरे रंग का होता है और इसके गले में एक नींबू जैसा पीला धब्बा होता है। हाल में यह प्रजाति तमिलनाडु की वरिष्ठ आइएएस अधिकारी व वन्यजीव प्रेमी सुप्रिया साहू द्वारा इसकी नई तसवीरें सोशल मीडिया पर साझा किए जाने की वजह से वन्यजीव प्रेमियों के बीच चर्चा में आयी।
यह 300 मीटर से 2600 मीटर की ऊंचाई पर पायी जाने वाली प्रजाति है और जंगल व घास के मैदानों में रहती है। आइयूसीएन ने वर्ष 2015 में आखिरी बार इसका मूल्यांकन किया था और तब इसके परिवार की मौजूदा संख्या को स्थिर बताते हुए वलनरेबल डी – 1 (vulnerable D – 1) कटेगरी में रखा था। उस समय ही इसके परिवार में वयस्क सदस्यों की संख्या 1000 होने का अनुमान व्यक्त किया गया था।
यह एक ऐसी प्रजाति है जो कहीं पलायन नहीं करती या प्रवास के लिए नहीं जाती और सात साल का इसका जीवन काल होता है।
इस जीव को लेकर किए गए आइयूसीएन के आकलन में कहा गया है कि यह मुख्य रूप से सदाबहार जंगलों या पहाड़ी जंगल घास के मैदानों के मिश्रण वाले इलाके में देखा गया है। इसके अलावा कभी-कभी यह सदाबहार जंगल के बहुत करीब स्थित नम पतझड़ी जंगलों में भी देखा गया है।
यह भी पाया गया कि यह कुछ बदलते हुए आवास में भी मौजूद रहता है। जैसे कि चाय, अकेशिया, कॉफी, इलायची के बागान जो आमतौर पर जंगल से तीन किमी के दायरे में स्थित होते हैं।

Photo by – R.Vidhya Vigashini via IAS Supriya Sahu X account.
यह प्रजाति छोटे पक्षी या स्तनधारी का शिकार कर गुजारा करती है। यह फूलों के रस पर भी निर्भर रहती है और जंगल में गिरे हुए पेड़ या ठूंठ को संभवतः इस उम्मीद से कुरेदती है कि वहां कोई अकशेरुकी जीव या सरीसृप इसे शिकार के लिए मिल जाए। इसे लोग अक्सर बागान में तब देखते हैं, जब येे मधुमक्खी के छत्तों पर भी धावा बोलते हैं अैर शायद ऐसा ये शहद के बजाय लार्वा खाने के लिए करते हैं।
इस प्रजाति के सामने क्या है संकट?
इस प्रजाति के लिए आवासीय व व्यावसायिक विकास, खेती, खनन, परिवहन व सर्विस कॉरिडोर, इको टूरिज्म का विकास आदि खतरे हैं। सड़कों, बांधों के निर्माण से इसे आवास को बदलना पड़ सकता है। इसके द्वारा मधुमक्खी के छत्तों को नुकसान पहुंचाने के बदले में इसका शिकार करना जैसे खतरे हैं।
दरअसल कुछ दशक पहले तक इसके द्वारा मधुमक्खी के छत्ते को नुकसान पहुंचाने से शहद उत्पादन में कमी आने की वजह से इसके शिकार के लिए शहद उत्पादक पैसे भी देते थे, लेकिन जागरूकता व कड़े नियमों की वजह से अब ऐसी गतिविधियों में तेजी से कमी आयी हैं।
आइयूसीएन का आकलन बताता है कि बड़े परियोजनाओं की वजह से इसकी पिछली तीन पीढियों यानी 21 वर्षाें में इसके आवास नष्ट हो रहे थे और बचे हुए आवास छोटे टुकड़ों में बंट रहे थे। हालांकि इसके संबंध में किए गए 2015 के आकलन में कहा गया है कि अगले 21 सालों तक ऐसी नुकसान दर में खास वृद्धि नहीं होगी।

Nilgiri Marten, Photo by Neelakandan via Mongabay India.
मोंगाबे इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, यह बैजर व नेवले के परिवार से ताल्लुक रखता है और इसका स्वभाव ऐसा है कि इसे देखना और इस पर अध्ययन करना मुश्किल होता है।
इस रिपोर्ट में अक्टूबर 2023 से अक्टूबर 2025 के दौरान केरल में किए गए एक अध्ययन के हवाले से लिखा गया है कि, पहले इस जीव को अकेला रहने वाला जानवर माना जाता है, लेकिन दो सालों में 1500 घंटे फील्ड में बिताए गए समय में 42 बार यह जानवर दिखा जिसमें आधे से अधिक बार यह दो-तीन के समूह में नजर आया। इससे यह पुरानी धारणा ध्वस्त हो गई कि यह जीव अकेला रहता है। यह जीव सुबह नौ से 11 बजे और शाम तीन से पांच बजे के बीच अधिक सक्रिय रहता है, हालांकि इसकी सक्रियता पूरे दिन रहती है।