मेधा पाटकर ने सरदार सरोवर बांध पर केंद्र की मध्यस्थता व समाधान पर उठाए सवाल

नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर ने कहा है कि सरदार सरोवर संबंधी आंतरराज्य विवाद पर केंद्र की मध्यस्थता और उसके जरिये ढूंढे गए समाधान से उपजे सवालों का जवाब जरूरी है।

7669 करोड़ रुपये की डूबक्षेत्र की वैध भरपाई तथा उर्वरित पुनर्वास के लिए 2900 करोड़ रुपये के दावे की अनदेखी किस आधार पर?

मध्यप्रदेश सरकार कुछ हजार विस्थापितों के उर्वरित अधिकार देने का कार्य कैसे करेगी, यही सवाल!

बड़वानी (मध्यप्रदेश) : नर्मदा बचाओ आंदोलन और उसकी नेता मेधा पाटकर ने हाल में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मध्यस्थता में संबंधित राज्यों के बीच हुए समझौते को लेकर सवाल उठाया है। शनिवार को मध्यप्रदेश के बड़वानी में इस संबंध में मेधा पाटकर ने ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर संगठन का पक्ष रखा।


इस संबंध में नर्मदा बचाओ आंदोलन की ओर से जारी प्रेस वक्तव्य में कहा गया है – सरदार सरोवर परियोजना के कारण मध्यप्रदेश में जलमग्न हुई वन भूमि, शासकीय भूमि तथा अन्य सार्वजनिक संसाधनों की भरपाई को लेकर वर्षों तक अंतरराज्यीय विवाद चला। गुजरात से कानूनन अपेक्षित वित्तीय सहायता की मांग मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र की ओर से जारी रही। इन मुद्दों पर केंद्रीय गृह और जल संसाधन मंत्री की मध्यस्थता से समझौता किए जाने से गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं। इस समझौते का अधिकृत ब्यौरा नहीं है, लेकिन इससे जुड़ी बड़ी खबरें प्रचारित हुई हैं। ख़बरों में कुछ विरोधाभास भी है। हम इसे पूर्ण परिप्रेक्ष्य में जानना और इस मुद्दे पर स्पष्टता चाहते हैं।

वक्तव्य में समझौते के संबंध में कहा है कि राज्य शासन के तथा विस्थापितों के अधिकार सुरक्षित रहें, यह भी अपेक्षित है। जब सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई 90 मीटर तक वर्ष 2000 से सीमित थी, तब मध्यप्रदेश सरकार ने परियोजना से होने वाली क्षति के लिए 281.46 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग की थी। इस राशि में वन क्षेत्र के लिए 112.51 करोड़ रुपये, सरकारी भूमि के लिए 157.61 करोड़ रुपये तथा जलमग्न वन भूमि के लिए 11.34 करोड़ रुपये शामिल थे। इसके बाद बांध की ऊंचाई 110 और 121.92 मीटर तक बढ़ी। वर्ष 2014 से बांध की ऊंचाई बढ़ाकर 2017 में 138.68 मीटर कर दी गई। बांध की ऊंचाई बढ़ने के साथ मध्यप्रदेश में डूब क्षेत्र का विस्तार होता गया और बड़ी मात्रा में वन भूमि, सरकारी भूमि, कृषि क्षेत्र तथा अन्य प्राकृतिक संसाधन जलमग्न हुए। इससे राज्य को होने वाली क्षति पहले की तुलना में कई गुना बढ़ गई। विस्थापित गावों की संख्या, नियोजन के अनुसार 192 है और एक नगर भी इसके दायरे में है और यह 2019 से हुआ। 2023 में पुनरीक्षित बैकवॉटर लेवल्स के आधार पर पुनर्वास के लिए अपात्र घोषित किये हजारों परिवारों को बढे पानी से क्षति हुई।

इसी वास्तविक स्थिति को ध्यान में रखते हुए मध्यप्रदेश सरकार ने जलमग्न भूमि और अन्य प्रभावित परिसंपत्तियों का पुनर्मूल्यांकन कराया। 2019-2020 संबंधित आधार पर तैयार इस पुनर्मूल्यांकन के अनुसार राज्य ने अपने डूबक्षेत्र की भरपाई के दावे को बढ़ाकर 7,669 करोड़ रुपये होना साबित किया। यह दावा बढ़े हुए डूब क्षेत्र और वर्तमान मूल्य के अनुरूप वरिष्ठ अधिकारियों के द्वारा तैयार किया गया था। मध्यप्रदेश सरकार ने 10 फरवरी 2022 को अपना संशोधित भरपाई का दावा गुजरात सरकार को विधिवत प्रस्तुत किया।

नर्मदा आंदोलन से जुड़ी तसवीरें दाएं और बाएं, मध्य में नर्मदा में बाढ़ के दृश्य का एक फाइल फोटो।

इसके बावजूद लगभग दो वर्ष बाद 21 मार्च 2024 को गुजरात सरकार ने यह स्पष्ट कर दिया कि वह केवल 281.46 करोड़ रुपये के मूल दावे पर ही वह विचार करेगी तथा 7,669 करोड़ रुपये के संशोधित दावे को स्वीकार नहीं करेगी। यह रुख न केवल मध्यप्रदेश शासन के अनुसार हुई वास्तविक क्षति की उपेक्षा, बल्कि परियोजना से प्रभावित राज्य के वैधानिक अधिकारों की भी अनदेखी मानकर मध्यप्रदेश शासन ने नामंजूर की। विवाद पर नर्मदा नियंत्रण प्राधिकरण की हर बैठक में चर्चा चलती रही। नर्मदा जल विवाद न्यायाधिकरण के 1979 से लागू रहे प्रावधानों के अनुसार परियोजना से प्रभावित राज्यों के बीच वन भूमि, सरकारी भूमि तथा पुनर्वास से संबंधित दायित्वों का निर्वहन किया जाना अनिवार्य रहा।


सर्वाेच्च अदालत के 2000 से पारित फैसलों के अनुसार भी यही होना था। मध्यप्रदेश को उसके वैध अधिकारों के अनुरूप डूब क्षेत्र की उचित भरपाई तथा विस्थापन से प्रभावित प्रत्येक परिवार का न्यायपूर्ण पुनर्वास के लिए गुजरात से भुगतान करके सुनिश्चित किया जाना क़ानूनी बंधन रहा। आज भी मध्यप्रदेश के हजारों विस्थापित परिवार पूर्ण पुनर्वास की प्रतीक्षा कर रहे हैं। अनेक परिवारों को भूमि, आजीविका और पुनर्वास से जुड़े अपने वैधानिक अधिकार पूरी तरह प्राप्त नहीं हुए हैं। ऐसी स्थिति में राज्य सरकार ने 2900 करोड़ रुपये की मांग उर्वरित पुनर्वास कार्य के लिए गुजरात से की।


नर्मदा बचाओ आंदोलन ने अपने वक्तव्य में कहा है कि बीच में इस विवाद को लेकर मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात के वरिष्ठ अधिकारियों के बीच कई बैठकें हुईं। विवाद के निराकरण के लिए मध्यस्थता – समिति में भूतपूर्व अधिकारियों को नियुक्त किया गया, गुजरात के प्रतिनिधियों के साथ मध्यप्रदेश के डूबक्षेत्र की संयुक्त मुलाकात भी हुई।

इसको लेकर पहले खबर आयी कि मध्यप्रदेश और गुजरात के मुख्य सचिवों के बीच हुई बैठक में गुजरात से मध्यप्रदेश को 10,000 करोड़ रुपये देना तय हुआ। फिर भी प्रत्यक्ष लेनदेन नहीं हुई। फिर से दिनांक छह जून 2026 को खबर आयी कि मुख्य सचिवों के बीच गुजरात से मध्यप्रदेश को 7388 करोड़ रुपये देने के निर्णय हुआ, जिसे 30 जून 2026 को अंतिम स्वरूप देना भी जाहिर हुआ।

नर्मचा बचाओ आंदोलन ने कहा है कि 41 वर्ष चले अहिंसक सत्याग्रह और कानूनी प्रक्रिया के द्वारा तीनों राज्यों के करीबन 50,000 परिवारों को पुनर्वास का कम अधिक लाभ मिलने पर भी मध्यप्रदेश में हजारों और महाराष्ट्र, गुजरात में सैंकडांे परिवारों का, जिनमें आदिवासी, दलित, श्रमिक शामिल हैं। इसमें आदिवासी, दलित, कुम्हार, केवट, मछुआरे शामिल हैं।

एनबीए ने कहा है कि इस परिप्रेक्ष्य में जो समझौता हुआ है, उसमें मध्यप्रदेश से बांध के निवेश पूंजी में तथा नियमित ऑपरेशन एंड मेंटेनेंस कार्य का संचालन और व्यवस्थापन में हिस्सा भी कुछ विवादित और कुछ मंजूर हुआ।

किसी खबर अनुसार, सरदार सरोवर परियोजना की लागत और उसमें हर राज्य का हिस्सा बढ़ने से परियोजना की 1983 में आंकी गयी लागत 4200 करोड, योजना आयोग की मंजूरी (1988) के वक्त मंजूर की 6400$ करोड़ की और बढ़ते-बढते, गुजरात के मुख्यमंत्री अनुसार 75000 से अधिक करोड तथा भूतपूर्व मुख्यमंत्री सुरेश मेहता जी (जो भाजपा के मंत्री, जलविशेषज्ञ रहे) के अनुसार 90,000 करोड कैसे हुई? मूल नियोजन में खामियाँ थी, जिनकी गुजरात में और विश्वबैंक की नियुक्त अंतररराष्ट्रीय उच्चस्तरीय आयोग की रिपोर्ट में तथा सर्वाेच्च अदालत के 18 अक्टूबर 2000 में तीन में से एक न्यायाधीश के अल्पसंख्य फैसले में स्पष्ट चर्चा हुई। इसके बाद गुजरात के विधानसभा सत्रों में हुई बजट पर चर्चा से जाहिर है कि स्टैच्यू ऑफ यूनिटी तथा उसके क्षेत्र में लायी गयी पर्यटन योजनाओं की लागत भी कभी 1055 करोड़ तो कभी-2015 में -915 करोड़ रु. जैसी बांध परियोजना की ही लागत से जोड़ी जाती रही। इसकी वैधता पर जवाब मिलेगा?

सबसे गंभीर यह भी है कि मध्यप्रदेश के हजारों विस्थापितों का उर्वरित पुनर्वास वैकल्पिक भूमि/ अनुदान, मकान के लिए भूखंड/उसका रजिस्ट्रीकरण, भूखंडों का उर्वरित आवंटन तथा गृहनिर्माण के लिए गरीबों को 2017 से मान्य अनुदान, हर पुनर्वास स्थल पर उपलब्ध कराने की उर्वरित सुविधाएं आदि कार्य, जिसके लिए 2900 करोड़ की मांग थी, वह न मिलने पर क्या किया जाएगा? अटर्नी जनरल ने 2003 में ही सर्वाेच्च अदालत में चली याचिका के वक्त, गुजरात शासन की ही भूअर्जन पुनर्वास की पूरी लागत-राशि का भुगतान महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश. को करने का निर्णय और निर्देश दिया था।

बयान में कहा गया है कि हमारा मानना है कि मध्यप्रदेश और महाराष्ट्र के वैध वित्तीय और पुनर्वास संबंधी अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता राज्य और उसके लाखों प्रभावित नागरिकों के हितों के प्रतिकूल न हो। उपलब्ध तथ्यों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि किया गया समझौता राज्य के अहित में न हो। संगठन ने मध्यप्रदेश सरकार से मांग की है कि वह राज्य के 7,669 करोड़ रुपये के वैध भरपाई के तथा, वन एवं सरकारी भूमि के उचित प्रतिकर तथा हजारों वंचित विस्थापित परिवारों के पूर्ण और न्यायसंगत पुनर्वास के लिए दृढ़ता से वित्तीय सहायता का अपना पक्ष रखे तथा उसके लिए आवश्यक होने पर उपलब्ध सभी वैधानिक और संवैधानिक उपायों का उपयोग करे।

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