मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के कई गांवों में आदिवासी परिवारों को राज्य सरकार की ओर से खेती के लिए करीब दो दशक पहले जमीन का पट्टा मिला है, लेकिन उस जमीन का चिह्निकरण नहीं होने की वजह से कई लोग अपनी जमीन पर अधिकार पाने से वंचित हैं। कई ऐसे परिवार हैं जो खुद को मिले पट्टे से अधिक जमीन पर खेती कर रहे हैं।
मध्यप्रदेश के पन्ना से सतीश भारतीय की रिपोर्ट
पन्ना (मध्यप्रदेश): मध्यप्रदेश में पन्ना एक पिछड़ा जिला है। जिले के ग्रामीण इलाकों में रोजी-रोटी का मुख्य साधन कृषि है। लेकिन, कृषि की कई चुनौतियों से किसान घिरे रहते हैं। किसानों की एक ऐसी ही चुनौती है कृषि जमीन का पट्टा होना पर क़ृषि के लिए जमीन कहां है, यह पता ना होना।
पन्ना जिले की पन्ना तहसील की इटवाखास पंचायत के अंतर्गत आने वाले करीब 800 की आबादी वाले खिरवा गांव में कई आदिवासी परिवार हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार, खिरवा गांव में 110 घर और 554 लोग थे। गांव की 86 प्रतिशत आबादी आदिवासी है और साक्षरता दर मात्र 33 प्रतिशत के आसपास दर्ज की गई थी, उसमें महिलाओं की साक्षरता दर मात्र 14 प्रतिशत के करीब थी।
इन आदिवासी परिवारों में करीब 15 परिवार ऐसे हैं जिन्हें राज्य सरकार की ओर से खेती के लिए जमीन के पट्टे दिये गये थे। मगर, पट्टे पर मिली यह जमीन कहां है, यह बहुत सारे आदिवासी परिवारों को पता नहीं है। इस गांव में मुख्य रूप से गोंड आदिवासी परिवार हैं। स्थिति यह है कि किसकी जमीन पर किस परिवार ने घर बना लिया, यह भी पता नहीं है। इन परिवारों को ये पट्टे 2006 में दिए गए थे।

मुन्नीलाल गोंड की भूमि अधिकार पुस्तिका।
गांव में हालात यह है कि खेत जोतने वाले कई आदिवासी परिवारों को भी यह पता नहीं है कि वे जिस जमीन को जोत रहे हैं, वह उनकी है या किसी और की। एक समस्या यह भी है कि किसी आदिवासी किसान को 2 एकड़ ज़मीन का पट्टा मिला है तो वह 2 एकड़ के साथ 3-4 एकड़ और जमीन पर खेती कर रहा है। वहीं, ऐसे भी लोग हैं जिनके पास 2 एकड़ जमीन का पट्टा तो है, मगर वह उस भूमि पर खेती ही नहीं कर पा रहा है, क्योंकि उनके हक की जमीन पर दूसरा व्यक्ति कब्जा करके खेती कर रहा है।
खिरवा गांव की हीराबाई गोंड कहती हैं, “हमें 5 एकड़ जमीन का पट्टा मिला था। मगर, आज तक हम जमीन की तलाश ही कर रहे हैं। खुद के पट्टे के साथ अन्य लोगों की जमीन पर कब्जा करके खेती कर रहे किसानों से हम कहते हैं कि हमारे पास भी 5 एकड़ जमीन का पट्टा है, हमें भी कुछ जमीन पर खेती करने दो। तब वह किसानों हमारी बात मानते नहीं। ज्यादा कुछ कहो तो गाली-गलौज से लेकर लड़ाई-झगड़े तक की नौबत आ जाती है”।

खिरवा गांव क खेत, जिसके बारे में लोगों को ठीक से पता नहीं है कि किसके हिस्से का कौन-सा खेत है। ऐसे में प्रभावशाली लोग अधिक खेत जोत रहे हैं और कमजोर परिवार अपनी जमीन से वंचित हैं।
लोगों ने समाधान के लिए पटवारी से की मांग
इस गांव में आगे हमारी मुलाकात शिवचरण गोंड से होती है। अपने परिवार के बारे में बताते हुए शिवचरण कहते हैं कि, “मेरे परिवार में 4 बेटे, 7 बेटियां और हम मियां-बीवी सहित 13 सदस्य हैं। इन सब के भरण-पोषण हेतु हमारे पास 5 एकड़ जमीन का पट्टा है। लेकिन, हमें जमीन पता नहीं तो हम खेती नहीं कर पाते। परिवार का पेट पालने के लिए मैं मजदूरी करता हूं और मेरे बेटों को इंदौर जैसे शहरों में काम के लिए पलायन करना पड़ता है”।
शिवचरण आगे कहते हैं, “इटवाखास व खिरवा गांव में कई आदिवासी परिवारों के हालत यह कि उनके 5 से 10 बच्चे हैं और जमीन के नाम पर उनके पास कागज का टुकड़ा भर है। ऐसे में आजीविका के लिए वे पलायन करते हैं”। वे यह भी कहते हैं कि अगर परिवार नियोजन के लिए जागरूकता लायी गई होती तब लोग कम बच्चे पैदा करते जिससे हमारी आजीविका का संकट कम होता।

गोंड परिवार का घर जो उनकी स्थिति को बयां करता है।
शिवचरण यह भी कहते हैं कि गांव के करीब 15 आदिवासी परिवार ऐसे हैं जिनकी जमीन के विवाद का समाधान नहीं हो पाता, क्योंकि इनमें कई ऐसे लोग हैं जो पट्टे की दो एकड़ जमीन के हकदार हैं लेकिन जोत 5-6 एकड़ जमीन रहे हैं। ऐसे लोगों को लगता है कि यदि जमीन आवंटन की गुत्थी सुलझ गई तो हमें 2 एकड़ जमीन ही जोतनी पड़ेगी, बाकी 3-4 एकड़ जमीन से कब्जा हटाना पड़ेगा।

शिवचरण गोंड बताते हैं कि जो लोग दूसरे की जमीन पर कब्जा कर बैठे हैं, वे नहीं चाहते हैं कि यह मामला सुलझे।
शिवचरण कहते हैं कि इसके बावजूद कई लोगों ने पट्टे की वास्तविक ज़मीन पाने के लिए अधिकारियों से गुहार लगाई है। यहां तक कि पटवारी को पैसे भी दिये कि वे जमीन का निराकरण करवा दें। मगर, इस समस्या का कोई निराकरण नहीं किया गया। यह मामला इसलिए भी उलझा है कि एक परिवार एक पट्टे के लिए पात्र है तो उसे तीन पट्टे भी दे दिए गए। ऐसा कुछ परिवारों के साथ हुआ है।
ग्रामीण मुन्नीलाल गोंड बताते हैं, “पट्टे पर मिली जमीन का ठीक से चिह्निकरण नहीं होने से हमें समर्थन मूल्य, सरकारी बीज, खाद जैसे अन्य योजनाओं का लाभ भी नहीं मिलता। यह समस्या केवल यहीं तक सीमित नहीं है बल्कि पन्ना तहसील के जनवार गांव में भी यही हालात हैं। जनवार गांव में करीब 65 आदिवासी परिवारों को 5-5 एकड़ भूमि के पट्टे दिये गये थे। इन 65 परिवारों में अधिकतर परिवारों के पास पट्टा तो है लेकिन उन्हें नहीं मालूम की उनकी जमीन कहां है।

खिरवा गांव के एक व्यक्ति जमीन पर कब्जा नहीं मिलने को लेकर अपनी परेशानियां बताते हुए।
मुन्नीलाल जिक्र करते हैं कि कई गांवों में आदिवासी परिवारों को जमीन का पट्टा मिला है, लेकिन उन्हें उनकी जमीन नहीं मिली है। इटवाखास, खिरवा, बंगला और मैरा गांव के कई आदिवासी लोगों के पास जमीन का पट्टा कागज पर मिला है पर वे अबतक अपनी जमीन ही तलाश रहे हैं।

इटवाखास के ऐसे परिवार जो आवंटित भूमि का चिह्निकरण नहीं होने से परेशान हैं। फोटो: सतीश भारतीय/क्लाइमेट ईस्ट।
पन्ना के ग्रामीण क्षेत्र में आदिवासियों के मुद्दों पर संघर्ष करने वाले मुकेश गोंड अपने समुदाय के अधिकारों के लिए आवाज उठाते आ रहे हैं। वे कहते हैं कि पन्ना ज़िले के कई आदिवासी गांवों में यह स्थिति आम है कि आदिवासियों के पास ज़मीन के पट्टे तो हैं, लेकिन उन्हें यह पता नहीं कि उनकी ज़मीन कहां हैं। ऐसे मामले तब हमारे सामने आते हैं जब हम जमीन अधिकारों पर जागरूकता शिविर लगाते हैं।’

खिरवा गांव से गुजरने वाली नदी।
मुकेश कहते हैं, “आदिवासियों के भूमि अधिकारों में कई प्रकार की बाधाएं होती हैं। जैसे आदिवासी समुदाय वर्षों की मेहनत से अनुपजाऊ भूमि को कृषि योग्य बनाकर पीढ़ियों से खेती करता है, फिर वह इस भूमि के अधिकार के लिए आवेदन करता है तब मुश्किल से उन परिवारों को ज़मीन का पट्टा मिलता है। इसके बावजूद उन्हें अपनी ज़मीन की वास्तविक पहचान और स्थिति के लिए भटकना पड़ता है”। वे कहते हैं, हमने इस तरह के मामलों से अधिकारियों व राजनेताओं को भी अवगत कराया है।

गोंड आदिवासी परिवारों के घर जो उनकी आर्थिक स्थिति को भी बयां करते हैं। ऐसे में यह जरूरी है कि जमीन का सही ढंग से चिह्निकरण हो।
भले ही आदिवासी परिवारों को कागज पर भूमि के पट्टे दे दिए गए हों लेकिन भूमि का सीमांकन या चिह्निकरण न किया जाना गांव के परिवारों के बीच गंभीर विवाद उत्पन्न कर देता है और उन्हें असमंजस की स्थिति में धकेल देता है। यह स्थिति उन्हें सामाजिक और आर्थिक रूप से मजबूत नहीं होने देती।