भरूच जिला मच्छीमार समाज के अध्यक्ष ने अपने पत्र में लिखा है कि भरूच जिला खनन अधिकारी ने बातचीत में इस आधार पर कार्रवाई करने से मना कर दिया कि खनन मालिकों को तीन दशक पुराने मैप के आधार पर पर्यावरण मंजूरी दी गई है और वह हिस्सा अब नदी में समा गया है। चूंकि तकनीकी रूप से इसे मंजूरी हासिल है, इसलिए वे कार्रवाई करने में अक्षम हैं।
भरूच (गुजरात) : ऑल भरूच डिस्ट्रिक्ट फिशरमैन सोसाइटी (समस्त भरूच जिला मच्छीमार समाज) के अध्यक्ष कमलेश एस मढीवाला ने राज्य के इनवॉयरमेंट इंपेक्ट एसेसमेंट ऑथोरिटी (Guarat State Environmental Impact Assessment Authority-SEIAA) के चेयरमैन को 24 दिसंबर 2025 को एक पत्र लिख कर नर्मदा नदी में रेत खनन व उसके तरीकों के बारे में बताते हुए हस्तक्षेप की मांग की है। ताकि गुजरात के लोगों की लाइफ लाइन सुरक्षित रह सके।
कमलेश एस मढीवाला ने अपने पत्र में बताया है कि सालों पुराने मैप के आधार पर रेत खनन के लिए लीज एरिया का पर्यावरण मंजूरी (Environmental clearance) जारी होना नर्मदा नदी में गलत तरीके से रेत के खनन की एक प्रमुख वजह है। मढीवाला ने अपने पत्र में कहा है कि नर्मदा नदी में अवैध व गलत ढंग से किये जा रहे रेत खनन के खिलाफ भरूच के खनन अधिकारी से बात करने पर उन्होंने बताया कि साल 1995 के मैप के आधार पर लीज एरिया की इसी पर्यावरण मंजूरी जारी होने के बाद खनन गतिविधियों के कारण नदी के बहाव की दिशा बदल गयी है और चूंकि लीज एरिया नदी के बहाव में आ गए हैं और उनकी इसी (Environmental clearance) जारी है, इसलिए वे नदी के बहाव में चल रहे रेत खनन को रोक नहीं सकते हैं, भले ही वह गैर कानूनी क्यों न हो और नदी के बहाव में लीज एरिया की इसी रद्द होने के बाद ही वैसी खनन गतिविधियों को रोका जा सकता है।

मढीवाला s ने SEIAA का ध्यान इस ओर खींचते हुए कहा है कि पुराने मैप और मौजूदा मैप के हिसाब से लीज एरिया के सही लोकेशन को वेरिफाई नहीं किया गया है। इसी यानी पर्यावरण मंजूरी का नवीनीकरण करने की प्रक्रिया में इस बात का ध्यान रखने में बड़ी गलती हुई है। जो जमीन कटकर नर्मदा नदी में बह गयी है, उसका रेवेन्यू रिकार्ड लैंड रेवेन्यू एक्ट के हिसाब से कम नहीं किया गया है।
उन्होंने यह सवाल उठाया है कि जब वह जमीन ही मौजूद नहीं है तो इसी का नवीनीकरण कैसे कर दिया गया? यह अपने आप में एक बड़ी गलती है। उन्होंने कहा है कि पुराने मैप और गैर कानूनी रेवेन्य रिकार्ड के आधार पर जो इसी जारी की गई है, वह गैर कानूनी तरीका अपना कर किया जा रहा है। उन्होंने लिखा है कि किसी भी कानून में नदी के पानी से रेत निकालने की अनुमति नहीं है, इसलिए ऐसा करने की छूट नहीं मिलनी चाहिए।
उन्होंने अपने पत्र में लिखा है कि रेत माइनिंग का काम सस्टेनेबल सैंड माइनिंग गाइड लाइन – 2016 और केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के एनफोर्समेंट एंड मॉनिटरिंग गाइड लाइन – 2020 और दूसरे सर्कुलर, पर्यावरण कानून और एनजीटी के अलग-अलग फैसलों से बंधा है। इसलिए सिर्फ इसी की आड़ में ऐसा किया जाना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के खिलाफ है और यह बड़ी इंसानी और प्रशासनिक गलती है।
मढीवाला ने पत्र में कहा है कि नर्मदा गुजरात की लाइफलाइन है और इसकी रक्षा हम सबका कर्तव्य है। नर्मदा मैया में सीधे बजरों व लोहे की नावों से ड्रेजिंग मशीनों से किये जा रहे गैर कानूनी रेत खनन को रोकना उचित कार्रवाई होगी। उन्होंने लिखा है कि करीब 300 से 400 गैर कानूनी मैकेनिकल नावों, बजरों का इस्तेमाल करके व लंबा पाइप लगाकर खुले आम बिना जीएमबी गुजरात मैरिनटाइम बोर्ड रजिस्ट्रेशन के रेत खनन किया जा रहा है। जीएमबी में इस संबंध में की गई शिकायत के बाजवूद भी वे चुप हैं।
नदी के बहाव में कंक्रीट का पुल बनाकर उसे रोक दिया गया है। पत्र में कहा गया है कि इन गतिविधियों को रोकने के लिए कानून है। अगर ऐसा नहीं किया गया तो माइनिंग मालिकों द्वारा अधिकारियों को कुचलने की पहले ही कई खबरें आयी हैं, और ऐसी घटनाएं और बढ सकती हैं। नर्मदा में अवैध खनन की वजह से कई लोगों के डूबने की भी खबर आयी है।