केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने दो बाजों की बिना रुके लंबी यात्रा की जानकारी अपने सोशल मीडिया एकाउंट पर शेयर की है। केंद्रीय मंत्री ने कहा है कि इन बाजों को सैटेलाइट टैग पिछले साल लगाया गया था। इसके माध्यम से इनके बारे में कई और महत्वपूर्ण जानकारियां पता चली हैं।
नई दिल्ली: बातचीत में लोग अक्सर बाज की चाल से किसी व्यक्ति की तुलना करते हैं या बाज की चाल को उपमा के रूप में प्रयोग करते हैं। शायद ऐसा बाज की तेज चाल और उसके लगातार उड़ते रहने की क्षमता की वजह से किया जाता है। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने 16 मई 2026 को एक ट्वीट कर बताया कि सैटेलाइट टैग से युक्त दो अमूर फाल्कन यानी अमूर बाज ने सोमालिया से पूर्वोत्तर भारत की लंबी यात्रा की।
भूपेंद्र यादव ने अपने एक्स एकाउंट पर लिखा है – “पूर्वोत्तर भारत में अमूर फाल्कन के संरक्षण के लिए पिछले एक दशक से लगातार चल रहे प्रयासों के तहत, नवंबर 2025 में मणिपुर के तामेंगलोंग ज़िले में उनके पड़ाव स्थल (चिउलुआन/Chiuluan) पर तीन अमूर फाल्कन को सैटेलाइट टैग लगाया गया था। इनमें से दो अमूर फाल्कन दक्षिणी अफ्रीका में अपने गैर प्रजनन क्षेत्रों में चार महीने से ज़्यादा समय बिताने के बाद, अपने बसंत प्रवास पर हैं और भारत के रास्ते वे सुदूर पूर्वी एशिया में अपने प्रजनन क्षेत्र में लौट रहे हैं। सोमालिया से पूर्वोत्तर भारत की ओर जाते समय उन्होंने छह दिनों में लगभग 6000 किलोमीटर की बिना रुके उड़ान भरी”।

केंद्रीय मंत्री ने आगे लिखा कि अलंग नाम की टैग लगी एक मादा अमूर फाल्कन इस समय भारत के पश्चिमी तट की ओर बढ रही है और अरब सागर को पार कर रही है, उसने कल 15 मई को सोमालिया से अपनी यात्रा शुरू की थी। उन्होंने लिखा, “फिलहाल, अनुकूल हवाओं के चलते यह समुद्री यात्रा तीन दिनों में बिना रुके पूरी हो जाएगी”।
उन्होंने बताया है कि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से मिली आर्थिक सहायता से समुदाय के नेतृत्व वाला यह संरक्षण प्रयास संचालित हो रहा है। उन्होंने अपने पोस्ट में कहा है कि इस अदभुत छोटे शिकारी पक्षी जो एक लंबी दूरी का अंतर गोलार्धीय प्रवासी है के बारे में कई दिलचस्प जानकारियां भी सामने आयी हैं। उन्होंने यह उम्मीद जतायी है कि इन जानकारियों से उनके संरक्षण प्रयासों को दिशा मिलेगी।
अमूर बाज बाज प्रजाति में अपेक्षाकृत एक छोटी नस्ल माना जाता है। भारतीय वन्यजीव संरक्षण कानून 1972 के तहत यह शिड्यूल – 4 की प्रजाति है, जबकि सीएमएस ने इस श्रेणी – 2 में सूचीबद्ध किया है। आइयूसीएन ने आखिरी बार 2021 में इसका आकलन किया था और इसकी आबादी को स्थिर माना गया, इसलिए इसे कम चिंताजनक श्रेणी में रखा गया है। इसकी संख्या दो लाख से 6.67 लाख के बीच होने का अनुमान है।