नजरिया: बाढ़ की आपदा में महिलाओं, बुजुर्गाें व बच्चों के विशेष ख्याल की जरूरत

बाढ़ की त्रासदी महिलाओं को अधिक गंभीर रूप से प्रभावित करती है। बच्चे व बुजुर्ग भी अत्यधिक प्रभावित होते हैं। ऐसे में बाढ़ के दौरान महिलाओं, बच्चों व बुजुर्गाें के लिए विशेष कार्यनीति होना जरूरी है।

पूजा कुमारी


नेपाल में भोटेकोशी त्रासदी से आज न सिर्फ नेपाल बल्कि बिहार के कई हिस्से बाढ़ से प्रभावित हैं। अचानक आयी मुसीबत से दूर रहने वाले भी प्रभावित हो चुके हैं, जिसका अंदाजा विशेषज्ञों को पहले से था। इस भीषण तबाही में न सिर्फ हजार से अधिक लोग अपनी जान गवां चुके हैं, बल्कि कई हजार अभी भी लापता हैं और उनके परिजन उनको खोजने के लिए भटक रहे हैं। इस प्रक्रिया में राहत और बचाव कार्य बेहद पेचीदा है। जिसमें सिर्फ मलबा हटाना ही नहीं बल्कि बच गई जिंदगियों को फिर से अपने कदमों पर खड़ा करना भी शामिल है। नेपाल और बिहार में आपदा का निराकरण सिर्फ मौजूदा समय की जरूरत नहीं है। यह आने वाले समय में भयंकर चुनौती को रोकने को लेकर भी सवाल खड़ा करती है।

अभी जो एक समस्या है वो यह है कि सरकारों को सिर्फ खाने-पीने और तात्कालिक रहने की शेड के अलावा लंबे समय तक उन सभी लोगों को एक बसेरा देने का काम करना है जिनके पास खुद का सब कुछ था और इस तबाही में बह गया। इसमें सबसे ज्यादा दिक्कत महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों को है जो बिना संसाधन कहीं भी शिफ्ट नहीं किए जा सकते।

इनको लेकर साझा एवं विवेकपूर्ण कदम उठाए जाने की आवश्यकता है, जो इनको आगे के लिए मजबूत बनाए रखने में मदद करेंगी। ऐसी कई रिपोर्ट्स आ रहे हैं, जिनमें महिलाएं और बच्चियां अपनी अलग -अलग परेशानियों के बारे में बता रही है। जैसे कपड़े, खाने और पानी कमी, पैड्स की दिक्कत और मेडिकल सुविधा का अभाव।

ये बेहद पेचीदा और हर रोज जूझने वाला काम है, जिसमें सरकारों को तत्परता दिखानी चाहिए। नेपाल अन्य देशों से मिलने वाली मदद को भी जितनी जल्दी जमीन पर लागू करेगा उतना ही आम लोगों को राहत मिलेगा। वहीं, बिहार सरकार सिर्फ पानी को मॉनिटर नहीं कर सकती, उसे ये भी सुनिश्चित करना है कि अगले एक से दो महीने इस दिक्कत को नियंत्रित कर आम जनजीवन को सामान्य करना है।

हम यह नहीं बोल सकते हैं कि यह तो हर साल की समस्या है, क्योंकि इस बार उन लोगों को भी इसका प्रभाव झेलना पड़ रहा है जो किसी भी नदी से काफी दूर थे। कई शहर और गांव इसकी चपेट में हैं, जिससे वहां रहने वाले लोगों में महिलाएं अधिक प्रभावित हैं। उसमें भी वो लोग जिनके घर पूरी तरह से नदी में बह गए हैं या अपनी कोई जमीन नहीं है सबसे अधिक पीड़ा में हैे। यह सोच, कि बिना किसी अपनी चीज के खुले आसमान के नीचे सरकारी या एनजीओ की मदद के सहारे जीना पड़ेगा, बेहद पीड़ादायक है। अपनी आम जरूरतों के लिए किसी के आगे हिम्मत हारना सबसे बुरा होता है। इसलिए यह जरूरी है कि बिना किसी के बोले हम सबको पर्यावरण और प्रकृति का दर्जा दिए जाने वाली महिलाओं के लिए एक साथ मिलकर काम करना होगा।

नेपाल हो या फिर बिहार, पानी का प्रभाव जब तक रहेगा यह हमें करना ही होगा। क्योंकि हम सिर्फ विरासत ही साझा नहीं करते बल्कि समान समस्या भी झेल रहे है। सरकारों के कार्यशैली और पर्यावरण के प्रति अलगाव के नुकसान पर लगातार लिखने और उसके नुकसान की सबसे बड़ी भरपाई करने वाली महिलाओं के लिए यह कदम दुनिया भर के उन लोगों की भी जिम्मेदारी है जो बड़े संस्थानों में इस मुद्दे पर अपना पेपर लिख कर पब्लिकेशन बढ़ाते हैं। आप लगातार लिखेंगे तो सरकारों पर दबाव बना रहेगा। सिर्फ तात्कालिक शेड नहीं आजीवन ऐसे खतरों के नुकसान पर बात करते रहना, हमारे भविष्य की एक सबसे बड़ी जरूरतों में है।

(लेखिका दिल्ली स्थित एक रिसर्चर हैं।)

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