दुमका जिले के जामा प्रखंड के भालुसुगिया टोला के ग्रामीण बिना सड़क के परेशानी का सामना करते हैं। बारिश के चार महीनों में उनकी परेशानी काफी बढ जाती है। सबसे अधिक दिक्कत गर्भवती महिलाओं, बच्चों व बुजुर्गाें को होती है। सड़क निर्माण की मांग को लेकर ग्रामीणों ने कुल्ही दुरुप कर राजनीतिक दलों को चेताया है।
दुमका: देश की आजादी के 79 वर्ष और झारखंड राज्य के गठन के 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी जामा प्रखंड के आदिवासी गांव पलासबनी का भालुसुगिया टोला आज तक पक्की सड़क से नहीं जुड़ पाया है। करीब 15 घरों की आबादी वाले इस टोले के ग्रामीणों को सड़क के अभाव में रोजमर्रा की जिंदगी में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। पलासबनी गांव के मांझी टोला तक पक्की सड़क पहुंच चुकी है, लेकिन भालुसुगिया टोला इससे करीब एक किलोमीटर दूर है। ग्रामीणों का कहना है कि यह एक किलोमीटर दूरी उनके लिए वर्षों से बड़ी समस्या बनी हुई है। इससे उन्हें आवागमन व दैनिक कार्याें में परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
बीमारी और प्रसव के समय बढ़ जाती है परेशानी
सड़क नहीं होने के कारण गर्मी हो या बरसात, एम्बुलेंस टोला तक नहीं पहुंच पाता। मरीजों और गर्भवती महिलाओं को करीब एक किलोमीटर पैदल चलकर मुख्य सड़क तक पहुंचना पड़ता है, जिसके बाद ही एम्बुलेंस की सुविधा मिल पाती है। आपात स्थिति में यह दूरी ग्रामीणों के लिए गंभीर परेशानी बन जाती है।
वहीं, शादी-विवाह अथवा अन्य बड़े कार्यक्रमों के दौरान छोटे-बड़े चार पहिया वाहनों को टोले से करीब एक किलोमीटर दूर खड़ा करना पड़ता है। इसके बाद ग्रामीणों को पैदल ही टोला तक जाना पड़ता है।
साइकिल-मोटरसाइकिल चलना भी मुश्किल, बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित
अभी वर्षा ऋतु में स्थिति और भी खराब हो गई है। ग्रामीणों के अनुसार, कीचड़ और खराब रास्ते के कारण साइकिल और मोटरसाइकिल चलाना मुश्किल हो गया है। यहां तक कि पैदल चलने में भी काफी परेशानी होती है।
भालुसुगिया टोला के सड़क से नहीं जुड़ने का प्रतिकूल असर बच्चों की शिक्षा पर भी पड़ रहा है। बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र और स्कूल जाने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के दिनों में रास्ते की स्थिति खराब होने से बच्चों की आवाजाही और भी मुश्किल हो जाती है।
सड़क के अभाव का असर सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों पर भी पड़ता है। सोहराय, बाहा सहित अन्य आदिवासी पर्वों के दौरान सामूहिक कार्यक्रम एवं नृत्य आदि आयोजित करने में भी ग्रामीणों को परेशानी होती है।

भालुसुगिया टोला की खराब सड़क, जिससे आने-जाने में लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ता है।
20 वर्ष पहले हुआ था मिट्टी-मोरम, फिर नहीं ली किसी ने सुध
ग्रामीणों के मुताबिक करीब 20 वर्ष पूर्व रास्ते में मिट्टी-मोरम का कार्य कराया गया था तथा पुल-पुलिया भी बनाया गया था। इसके बाद से सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने इस सड़क की ओर कोई विशेष ध्यान नहीं दिया।
ग्रामीणों का कहना है कि वे लगातार जनप्रतिनिधियों और प्रशासन से महज एक किलोमीटर पक्की सड़क बनाने की मांग करते रहे हैं, लेकिन वर्षों बीत जाने के बाद भी उनकी समस्या का समाधान नहीं हुआ।
चुनाव के समय मिलता है आश्वासन, जीतने के बाद भूल जाते हैं वादा
ग्रामीणों ने नाराजगी जताते हुए कहा कि जब भी चुनाव आता है, उम्मीदवार टोले तक पक्की सड़क पहुंचाने का आश्वासन देते हैं। चुनाव जीतने के बाद वही आश्वासन धरातल पर नजर नहीं आता। वर्षों से केवल आश्वासन मिलने के कारण ग्रामीणों में सरकार, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के प्रति काफी नाराजगी है।
कुल्हि दुरुप में सामूहिक निर्णय, सड़क नहीं तो वोट नहीं
सड़क की समस्या को लेकर गाँव के तीनों टोला के ग्रामीणों ने कुल्हि दुरुप/बैठक कर सामूहिक रूप से निर्णय लिया है कि यदि भालुसुगिया टोला को जल्द पक्की सड़क से नहीं जोड़ा गया तो अगले चुनाव में ग्रामीण वोट नहीं देंगे। ग्रामीणों ने सरकार एवं प्रशासन से मांग की है कि जनप्रतिनिधियों और संबंधित विभाग के माध्यम से भालुसुगिया टोला तक जल्द से जल्द करीब एक किलोमीटर पक्की सड़क का निर्माण कराया जाए, ताकि ग्रामीणों को स्वास्थ्य, शिक्षा, आवागमन और सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में हो रही परेशानियों से राहत मिल सके।

सड़क के मुद्दे पर कुल्ही दुरूप यानी बैठक करते ग्रामीण।
इस अवसर पर पार्वती किस्कू, सुहागिनी मुर्मू, सुमित्रा हेम्ब्रोम, सुशांति सोरेन, लुखिमुनी टुडू, मिसिल टुडू, श्रीराम मुर्मू, होरी मुर्मू, हरिलाल हांसदा, सचिन कुमार किस्कू, रामनाथ मुर्मू, मोलिन टुडू, रसिक सोरेन, सोमलाल हांसदा, अनिल मुर्मू, छबी सोरेन, बहामुनी हेम्ब्रोम, क्यारी मुर्मू, मकु सोरेन, सरिता सोरेन सहित बड़ी संख्या में महिला एवं पुरुष ग्रामीण उपस्थित थे।