थिंक टैंक एंबर की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक एशिया के पास दुनिया के केवल चार प्रतिशत तेल और गैस संसाधन हैं, लेकिन वैश्विक विद्युत प्रौद्योगिकी विनिर्माण का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा एशिया में होता है, हालांकि इसका बड़ा भाग चीन में केंद्रित है।
एशिया की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है। नई फैक्ट्रियां बन रही हैं। सड़कें लंबी हो रही हैं। गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है। एयर कंडीशनर, डेटा सेंटर और उद्योगों की बिजली मांग लगातार ऊपर जा रही है। लेकिन इस विकास की एक बड़ी कीमत भी है।
एशिया अपनी ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बाहर से खरीदता है। तेल, गैस और एलएनजी से भरे जहाज़ हजारों किलोमीटर दूर से आते हैं। और जब दुनिया में कोई संकट पैदा होता है, तो उसका असर सीधे एशिया की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ता है।
ऊर्जा थिंक टैंक एंबर की नई रिपोर्ट कहती है कि अब एशिया के सामने एक नया विकल्प उभर रहा है। ऐसा विकल्प जो सिर्फ जलवायु समाधान नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक मजबूती का रास्ता भी बन सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक एशिया के पास दुनिया के केवल 4 प्रतिशत तेल और गैस संसाधन हैं, लेकिन वैश्विक विद्युत प्रौद्योगिकी विनिर्माण का लगभग 75 प्रतिशत हिस्सा एशिया में होता है, हालांकि इसका बड़ा भाग चीन में केंद्रित है। यानी एशिया के पास जीवाश्म ईंधन कम हैं, लेकिन बिजली आधारित तकनीकों को बनाने की क्षमता बहुत बड़ी है।
रिपोर्ट कहती है कि दुनिया धीरे-धीरे ऊर्जा निकालने वाली अर्थव्यवस्था से ऊर्जा बनाने वाली अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रही है। ऐसे में एशिया के लिए सबसे बेहतर रास्ता तेल और गैस पर निर्भरता घटाकर घरेलू बिजली आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ना है।
रिपोर्ट दो बड़े “सुपर लीवर” की बात करती है। एक बिजली उत्पादन में, दूसरा परिवहन में। पहला सवाल बिजली का है।
कई एशियाई देश अभी भी नई गैस आधारित बिजली परियोजनाओं की योजना बना रहे हैं। लेकिन एंबर का विश्लेषण कहता है कि बैटरी के साथ सौर ऊर्जा अब एशिया के अधिकांश प्रस्तावित गैस संयंत्रों से सस्ती पड़ने लगी है।
रिपोर्ट के मुताबिक एशिया में जिन स्थानों पर नई गैस क्षमता लगाने की योजना है, उनमें से लगभग तीन-चौथाई स्थानों पर चौबीसों घंटे उपलब्ध रहने वाली सौर ऊर्जा और बैटरी प्रणाली की लागत पहले ही गैस से कम हो चुकी है।
अध्ययन बताता हैं कि एशिया के अधिकांश हिस्सों में सौर ऊर्जा और बैटरी के संयोजन से मिलने वाली चौबीस घंटे बिजली की लागत अब 100 डॉलर प्रति मेगावाट घंटा से कम है।
रिपोर्ट का अनुमान है कि 2030 तक सौर ऊर्जा और बैटरियां पूरे एशिया में एलएनजी आधारित बिजली को लागत के मामले में पीछे छोड़ देंगी।
एंबर के अंतरिम प्रबंध निदेशक और रिपोर्ट के सह-लेखक आदित्य लोला कहते हैं कि एशिया में बड़े पैमाने पर बिजली उपलब्ध कराने के लिए सौर ऊर्जा और बैटरियां अब एलएनजी से बेहतर विकल्प बन चुकी हैं और आने वाले वर्षों में उनकी लागत और घटेगी।
एशिया में क्यों जरूरी है ई-मोबिलिटी?
रिपोर्ट का दूसरा निष्कर्ष शायद और भी बड़ा है। वह सड़कों से जुड़ा है।
आज एशिया के सड़क परिवहन क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले तेल का लगभग 80 प्रतिशत आयात किया जाता है।
रिपोर्ट कहती है कि अगर एशिया तेजी से इलेक्ट्रिक वाहनों को अपनाता है, तो वह हर साल 300 अरब डॉलर से अधिक के तेल आयात बचा सकता है।
एंबर के प्रमुख लेखक डॉन वाल्टर कहते हैं कि इलेक्ट्रिक वाहन अब सिर्फ पर्यावरण का विषय नहीं हैं, बल्कि एक रणनीतिक आवश्यकता बन चुके हैं। उनके मुताबिक सड़क परिवहन एशिया के जीवाश्म ईंधन आयात का सबसे बड़ा स्रोत है और क्षेत्र अगले बीस वर्षों में अपने वाहन बेड़े का बड़े पैमाने पर विद्युतीकरण कर तेल आयात को लगभग आधा कर सकता है।
रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जुड़े हालिया घटनाक्रमों ने वैश्विक ऊर्जा बाज़ार को फिर अस्थिर कर दिया है।
अध्ययन के अनुसार 2024 में एशिया ने अपना लगभग 45 प्रतिशत तेल और करीब 30 प्रतिशत एलएनजी पश्चिम एशिया से खरीदा था। इतना ही नहीं, होर्मुज़ जलडमरूमध्य से गुजरने वाले लगभग 80 प्रतिशत तेल और गैस का अंतिम गंतव्य एशियाई बाज़ार ही होते हैं।
यानी दुनिया के किसी दूसरे हिस्से में पैदा हुआ संकट अक्सर एशिया के ऊर्जा बिल में दिखाई देता है।
एंबर के निदेशक किंग्समिल बॉन्ड कहते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में विद्युत प्रौद्योगिकियों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह बदल गई है। उनके मुताबिक बैटरियों से समर्थित सौर ऊर्जा की लागत अब एशिया के अधिकांश हिस्सों में जीवाश्म ईंधनों से नीचे आ चुकी है।
रिपोर्ट यह भी कहती है कि बिजली आधारित तकनीकों की एक बड़ी ताकत उनकी गति है।
जहाँ एक एलएनजी आयात श्रृंखला तैयार होने में लगभग छह साल और अरबों डॉलर लग सकते हैं, वहीं सौर ऊर्जा और बैटरियां कुछ दिनों में स्थापित की जा सकती हैं।
पिछले एक दशक में इलेक्ट्रिक दोपहिया वाहनों, एलईडी रोशनी, ऊर्जा दक्ष उपकरणों और अन्य बिजली आधारित तकनीकों की कीमतों में 35 से 90 प्रतिशत तक की गिरावट आई है।
रिपोर्ट का एक और महत्वपूर्ण आंकड़ा एशिया के आयात बिल से जुड़ा है।
आज एशिया हर साल लगभग 1.1 ट्रिलियन डॉलर के जीवाश्म ईंधन आयात करता है। एंबर का कहना है कि यदि क्षेत्र बिजली आधारित अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ता है, तो यह धन धीरे-धीरे घरेलू विनिर्माण, बुनियादी ढांचे और स्थानीय आपूर्ति श्रृंखलाओं में निवेश हो सकता है।
साथ ही इससे वायु प्रदूषण भी कम हो सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक एशिया में लगभग हर दस में से नौ लोग ऐसे प्रदूषण के बीच रहते हैं जो विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनुशंसित सीमाओं से ऊपर है।
कई दशकों तक एशिया की विकास कहानी तेल टैंकरों और गैस जहाज़ों के साथ लिखी गई। लेकिन अब एक नई कहानी आकार ले रही है।
एक ऐसी कहानी जिसमें ऊर्जा जमीन के नीचे से नहीं निकाली जाती। उसे सूरज, बैटरियों और बिजली से बनाया जाता है।
और शायद पहली बार एशिया के सामने ऐसा रास्ता है जहाँ ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक मजबूती और जलवायु कार्रवाई एक ही दिशा में जाती दिखाई देती हैं।