हाइकोर्ट ने काबर झील की जमीन वापसी मामले में मांगा एटीआर

काबर ताल को लेकर मछुआरों एवं किसानों के बीच हितों के टकराव की स्थिति भी रही है। यहां के किसान आसपास के क्षेत्र में कृषि करना चाहते हैं, जबकि मछुआरे चाहते हैं कि पानी रहे ताकि मछलियां हों।

पटना: पटना हाइकोर्ट ने बिहार के बेगूसराय जिले में स्थित काबर ताल या काबर झील की ग्राउंथ ट्रुथिंग की निगरानी से संबंधित एक याचिका पर गुरुवार (12 फरवरी 2026) को सुनवाई करते हुए सवाल किया है कि अधिसूचित होने के 36 साल बाद भी इस झील की 14.2 हजार एकड़ भूमि को सरकार के नियंत्रण में या वापस क्यों नहीं लिया गया है।

पटना हाकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू और न्यायाधीश आलोक कुमान सिन्हा की डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार को इस मामले में कार्रवाई रिपोर्ट (ATR-एक्शन टेकन रिपोर्ट) सौंपने और पूरी झील को अतिक्रमण से मुक्त करने के लिए एक समय सीमा बताने को कहा है।

कावर ताल का एक दृश्य। यहां स्थानीय मछुआरों पर्यटन व मछली पालन के जरिए आजीविका कमाते हैं। फोटो: राहुल सिंह।

यहां पर ग्राउंड ट्रुथिंग अंग्रेजी का एक तकनीकी शब्द है, जिसका अर्थ धरातल पर सैटेलाइट सर्वे और मैपिंग के जरिए पारिस्थितिकी व जैव विविधता संबंधी डेटा इकट्ठा किया जाता है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार, राज्य के महाधिवक्ता पीके शाही ने बताया है कि बेगूसराय व जमुई के जिलाधिकारियों के साथ बैठक की गई, जिसमें जमुई जिले के रामसर साइट नागी डेम व नकटी झील पक्षी अभ्यारण्य में किसी प्रकार का अतिक्रमण नहीं पाया गया, लेकिन बेगूसराय के काबर ताल में अतिक्रमण की समस्या है।

वेटरन्स फोरम फॉर ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक लाइफ के वकील दीनू कुमार के द्वारा जमा किए गए दस्तावेज में यह दिखाया गया है कि काबर ताल को 20 जून 1989 को 15.78 हजार एकड़ भूमि पर वन्यजीव क्षेत्र के तौर पर अधिसूचित किया गया था। जबकि वेटलैंड मैनेजमेंट रूल्स 2017 के तहत सैटेलाइट एटलस डेटा में सिर्फ 1.56 हजार एकड़ भूमि दिखायी गई है। इस तरह एशिया के मीठे पानी के सबसे बड़े गोखुर झील की 14.21 हजार एकड़ जमीन अभी वापस लेना बाकी है। इस मामले की अगली सुनवाई 15 अप्रैल को होगी।

101Reporters की एक खबर के अनुसार, कांवर ताल को लेकर स्थानीय मछुआरों व किसानों में टकराव की भी स्थिति है। मछुआरे ताल में पानी चाहते हैं ताकि उन्हें मछलियां मिल सके, जबकि किसान चाहते हैं कि आसपास के क्षेत्र से पानी निकल जाए ताकि वे खेती कर सकें। यहां के किसान लंबे समय से इस बात को लेकर आंदोलन करते रहे हैं कि ताल में उनकी जमीन चली गई है और इस कारण उनकी आजीविका प्रभावित हो रही है।

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