विलियम हांसदा: कॉमर्स के एक छात्र के संताली प्रकाशक व लेखक बनने का यात्रा अनुभव
विलियम हांसदा अपने युवावस्था के दिनों में एक सीए बनने की सोच के साथ कोलकाता गए थे। वे वहां सीए इंटरमीडिएट की पढाई कर रहे थे, इसी दौरान वे अस्वस्थ हुए और वे वहां से धनबाद आ गए। धनबाद में वे हिंदी पत्रिका दिगंत पथ का संपादन करने लगे और उसके सहायक संपादक बनाए गए। पटना विश्वविद्यालय के वाणिज्य महाविद्यालय से एम कॉम करने वाले एक युवक के जीवन में स्वास्थ्य एक ऐसा मोड़ बन कर आया कि यह आदमी साहित्यिक व सांस्कृतिक धरोहरों को सहेजने और उसके दस्तावेजीकरण में जुट गया।
विलियम हांसदा आज संताली के एक सफल प्रकाशक हैं, जिनके लिए इस भाषा में पुस्तकें प्रकाशित करना किसी तरह चलने वाला काम नहीं, बल्कि लाभकारी भी है। इस बिंदु का यहां उल्लेख करना इसलिए जरूरी है, क्योंकि प्रकाशन के काम का आर्थिक पक्ष अगर कमजोर होता है तो वह प्रकाशक, लेखक पर दबाव तो बनाए रखता ही है, उस भाषा विशेष के साहित्य व समुदाय विशेष की सांस्कृतिक पहचान के प्रचार-प्रसार में भी बाधा उत्पन्न होती है।
कुछ महीने पूर्व, संताली लेखक व अनुवादक नाजीर हेंब्रम को पुस्तक डार्क हॉर्स का उनके द्वारा किए गए संताली अनुवाद को साहित्य आकादमी पुरस्कार मिला। इस पुस्तक को विलियम हांसदा के प्रकाशन हंस हंसिल ने ही छापा है। इसके बाद उनसे मुलाकात प्रस्तावित थी और जुलाई के आखिरी दिनों में जामताड़ा में उनसे मुलाकात और विभिन्न मुद्दों पर लंबी बात हुई। प्रस्तुत है बातचीत का प्रमुख अंश –
सवाल: प्रकाशक के रूप में आपका रूपांतरण कैसे हुआ और इस यात्रा के अनुभव कैसे रहे?
जवाब: मैं साल 2020 से एक स्वतंत्र प्रकाशक के रूप में किताबें प्रकाशित कर रहा हूं और इसके लिए मैंने हँस हॉसिल नाम से प्रकाशन संस्थान शुरू किया है। इसके लिए मैंने अपने गृह नगर जामताड़ा को ही चुना। यह एक छोटी-सी जगह है, लेकिन चुनौतियों के बावजूद यहां से प्रकाशन का अनुभव अच्छा रहा है। उससे पहले मैं धनबाद में रह रहा था और वहां हमारा एक समूह प्रकाशन, विद्यालय संचालन व नेचुरोपैथी सेंटर के संचालन के काम से जुड़ा है। मैं उसमें सक्रिय रूप से जुड़ा था।
इन दिनों मैं गोड्डा के एक अवकाश प्राप्त शिक्षक ईश्वर हेंब्रम प्रवीण के लोकगीतों के संग्रह मोसोत बाहा (मुरझाया फूल) के प्रकाशन के काम में लगा हूँ। यह आदिकाल से प्रचलित लोक गीतों का संग्रह है।
सवाल: संताल परगना में संताली भाषा के प्रकाशन का क्या इतिहास है?
जवाब: डोमन साहू समीर ने आजादी के ठीक पहले जून 1947 में संताली पत्रिका होड़ संवाद का संपादन शुरू किया। दरअसल, समीर जी दुमका के अंग्रेज डिप्टी कमीश्नर डब्ल्यू सी आर्चर के ऑफिस में क्लर्क थे। उस अधिकारी ने संताल समाज से संपर्क-संवाद व बेहतर संबंध के लिए होड़ संवाद के प्रकाशन को प्रोत्साहित किया। उन्हें लगा कि इससे इस समाज से संवाद होगा और संबंध अच्छे होंगे। यह पत्रिका अब झारखंड सरकार के स्वामित्व में प्रकाशित होती है। पहले साप्ताहिक थी, अब मासिक है। चुंडा सोरेन सिपाही अभी इसके संपादक हैं।
एक दिलचस्प तथ्य यह है कि डोमन साहू समीर ही संताली में पहले मैट्रिक पास विद्यार्थी थे, जो एक गैर संताल, गैर आदिवासी थे। उन्होंने संताली भाषा के लिए देवनागरी के चलन को बढाया, उससे पहले तो रोमन ही प्रयोग होता था। हिंदी एवं संताली: एक तुलनात्मक अध्ययन समीर जी की एक शानदार शोध पुस्तक है। उनसे थोड़ा पहले चलें तो पाउल जूझार सोरेन 1937 में संताली स्कूलों के पहले इंस्पेक्टर बने थे। बाद में वे लोकसभा के सदस्य भी बने।

हिंदी-संताली और संताली-हिंदी शब्दकोश।
सवाल: आपकी साहित्यिक यात्रा कैसे शुरू हुई? खुद के बारे में बताएं?
जवाब: वर्ष 2003 की बात है। हमने धनबाद से सिंगा-सकवा नाम से एक मासिक संताली पत्रिका शुरू की। सिंगा-सकवा एक वाद्य यंत्र होता है, जिसे युद्ध से पहले या शिकार से पहले बजाया जाता है। दो साल तक हमने इसे निकाला, पर इसका वितरण ठीक से नहीं कर सके। यह देवनागरी लिपि में थी। उस समय यह बात समझ में आयी कि पूरी तरह से साहित्यिक पत्रिका का संचालन एक कठिन कार्य है। जैसा कि मैंने बताया कि धनबाद में मैं अपने समूह के साथ उसकी गतिविधियों से जुड़ा था। फिर 2019 में घर लौटा और लगा कि अब यहीं से कुछ करना चाहिए तो दिसोम गोडेत पत्रिका निकालना शुरू किया। फिर 2020 से प्रकाशक के रूप काम शुरू किया। हमारे पास पहले से संताली व हिंदी की पत्रिकाओं के संपादन का अनुभव था, वह यहां से काम शुरू करने में काम आया।
हम अपने प्रकाशन से संताली लेखकों की पुस्तकें छापतें हैं। अबतक 15-16 किताबें छपी हैं। ऐसे प्रकाशन में लेखक का अंशदान होता है और सामान्यतः 500 से 1000 कॉपियां छपती हैं। इसके अलावा हम पाठ्यक्रमों के प्रकाशन के काम से जुड़े हैं जो हमें आर्थिक संबल प्रदान करता है।

सवाल: आप झारखंड और बंगाल की सीमा के करीब रहते हैं। दोनों राज्यों में बड़ी संताल आबादी है और संताली जानने वाले लोग हैं। आप झारखंड और बंगाल में संताली साहित्य के रूझान को कैसे देखते हैं?
जवाब: तीनों लिपियों देवनागरी, बांग्ला और ओलचिकी में संताली की किताबें छपती हैं और उनकी मांग है। हालांकि देवनागरी की मांग हमारे क्षेत्र में ज्यादा है, लेकिन बंगाल में बांग्ला लिपि में संताली साहित्य यहां से अधिक पढा जाता है, उसकी मांग अधिक है। बांग्ला समाज एक चेतन समाज है। मैं बंगाल और झारखंड की सीमा पर रहता हूं और मैं तीनों भाषाएं जानता हूं तो कह सकता हूं कि बंगाल में तुलनात्मक रूप से मांग अधिक है। एक दूसरी बात कि आपको बंगाल के हर जिले में संताल मिलेंगे।

विलियम हांसदा द्वारा संपादित संताली पत्रिका दिसोम गोडेत।
सवाल: लिपि के पक्ष को आप कैसे देखते हैं, ओलचिकी बनाम देवनागरी को लेकर आपका अनुभव व समझ क्या है? ओलचिकी की संभावनाओं पर आप क्या कहेंगे?
जवाब: एक भाषा के लिए एक लिपि हो यह अच्छी बात है। पर, अभी ओलचिकी का संघर्ष काल है, यह अपेक्षाकृत नई लिपि है, अभी इसे स्थापित होना है। देवनागरी पहले से एक स्थापित लिपि है। आप यह भी कह सकते हैं कि यह बाजार की लिपि है। ओलचिकी को भी बाजार की लिपि बनाना होगा। पंडित रघुनाथ मुर्मू ने 1925 में ओलचिकी लिपि का आविष्कार किया और उस समय इसे उन्होंने अपने क्षेत्र की ध्वनियों व उच्चारण के संदर्भ में तैयार किया होगा। यह अभी विकास के चरण में है। इसमें अभी संताली भाषा की सभी ध्वनियों को प्रतिनिधित्व नहीं मिलता है, इससे कई ध्वनियों के लुप्त होने का संकट हो सकता है। इसलिए जरूरी है कि इस लिपि पर और काम किया जाए, जिन ध्वनियों को प्रतिनिधित्व देने के लिए अभी चिह्न नहीं हैं, उनके लिए चिह्न बने या जो लिपि ध्वनियों को ज्यादा स्पष्टता देती हो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए।
हमें संताली भाषा को गैर संतालों में स्वीकार्य व सुगम्य बनाना होगा। अभी संताली में समाचार पत्र नहीं है, कोई स्थापित मुख्यधारा पत्रिका नहीं है, बड़ी-बड़ी कंपनियां इस भाषा में विज्ञापन नहीं देती हैं। यह भाषा शिक्षा ग्रहण करने का माध्यम कब तक बनेगी, यह सरकार पर निर्भर करता है। विभिन्न स्ट्रीम की पुस्तकें इस भाषा में कबतक उपलब्ध होगी, यह भी सरकार पर निर्भर करता है।

सवाल: संताल समाज में संताली की पहुंच़ किस हद तक है?
जवाब: देखिए, 90 प्रतिशत लोग संताली भाषा अच्छे से जानते हैं। बड़े शहरों में जो एकल संताली परिवार के रूप में रहते हैं, उनके साथ समस्या हो सकती है। हालांकि सोशल मीडिया ने लोगों को बड़े स्तर पर जोड़ा है। किसी भी परिवार ने जिन वजहों से संताली छोड़ दिया था, वे पुनः अपनी भाषा की ओर आ रहे हैं।
सवाल: मौजूदा वैश्विक समस्याओं के संदर्भ में आप आदिवासी पद्धतियों व ज्ञान की प्रासंगिकता व सार्थकता पर क्या सोचते हैं?
जवाब: आदिवासियों ने प्रकृति से जुड़ कर अपनी जीवनशैली तैयार की है। यह प्रकृति के सबसे अधिक साथ रहने वाला समुदाय है। प्रकृति द्वारा तैयार होती चुनौतियां या उनसे तारतम्य स्थापित करना या उनका विकल्प या उनकी चुनौतियों को समझने का ज्ञान आदिवासियों के पास है। आदिवासी सरल होते हैं, वह सरलता प्रकृति से आती है। वे पत्थर, पेड़, प्रकृति को पूजते हैं। उन्हें जीवन की प्रेरणा लेने की ताकत प्रकृति से मिलती है। निश्चित रूप से आदिवासियों पद्धतियों व ज्ञान में मौजूदा पर्यावरणीय चुनौतियों का भी समाधान निहित है।