आदिवासी हितों की रक्षा के लिए पेसा के अनुरूप हो झारखंड पंचायती राज कानून में संशोधन: महासभा

झारखंड जनाधिकार महासभा का तर्क है कि पंचायती राज कानून में राजस्व गांव को इकाई माना गया है, जबकि पेसा में परंपरागत ग्रामसभा इकाई है। ड्राफ्ट नियमावली के कुछ प्रावधानों पर महासभा ने सवाल उठाया है।

रांची: अभी झारखंड में पेसा, 1996 की नियमवाली को लेकर बहस छिड़ी हुई है। इस बहस के दौरान अनेक लोगों में पेसा कानून के बारे में कुछ भ्रान्ति भी फ़ैल रही है। झारखंड जनाधिकार महासभा ने इस स्थिति को लेकर 29 जनवरी, 2025 को एक विस्तृत बयान जारी किया है और कहा है कि ऐसी स्थिति में भी राज्य सरकार अपनी जिम्मेवारी और आदिवासी अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता से बचती दिख रही है। महासभा ने लोगों से अपील की है कि वे दिग्भ्रमित न हों एवं मिलकर पेसा को पूर्ण रूप से लागू करवाने के लिए संघर्ष करें।

महासभा ने कहा है कि सच यह है कि पेसा बनने के 28 साल बाद भी यह झारखंड में पूर्ण रूप से लागू नहीं है। महासभा स्पष्ट रूप से मानती है कि झारखंड के अनुसूचित क्षेत्र पेसा के अधिकांश महत्वपूर्ण प्रावधानों से वंचित हैं। झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001 (जेपीआरए) अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र को पेसा के अधिकांश प्रावधानों और शक्तियों से वंचित रखा गया है।

साथ ही, अनेक लोगों में ऐसी भ्रान्ति है कि पेसा लागू होने से चुनाव आधारित पंचायत व्यवस्था ख़तम हो जाएगी। असल में पेसा संविधान के भाग 9 में दिए पंचायत व्यवस्था के उपबंधों को पांचवी अनुसूची क्षेत्र में कई अपवादों और उपान्तरणों के साथ विस्तार करता है. पंचायत के त्रिस्तर होंगे और उनके लिए चुनाव भी होगा. इस कानून का मूल यही है कि अनुसूचित क्षेत्र में त्रि-स्तरीय पंचायत व्यवस्था के प्रावधानों का विस्तार होगा लेकिन आदिवासी सामुदायिकता, स्वायत्तता और पारम्परिक स्वशासन इस पंचायत व्यवस्था का मुख्य केंद्र बिंदु होगा। गांव राजस्व गांव से भिन्न होगा। समाज ही गांव को परिभाषित करेगा। ऐसी पारंपरिक ग्राम सभा को संवैधानिक और सर्वाेपरि दर्जा होगा।

झारखंड सरकार ने पिछले 2.5 वर्षों में पेसा नियमावली बनाने के लिए टीआरआइ में कई चर्चाओं का आयोजन कर कुछ लोगों का सुझाव लिया था। इसके बाद 2023 में पंचायती राज विभाग ने एक ड्राफ्ट नियमावली अपने वेबसाइट पर डाल कर सुझाव आमंत्रित किया था, लेकिन अनेक सुझावों को जोड़ा नहीं गया था। हाल के दिनों में एक संशोधित ड्राफ्ट सोशल मीडिया में साझा किया जा रहा है जिसे विभाग का फाइनल ड्राफ्ट बताया जा रहा है. हालांकि विभाग ने संशोधित ड्राफ्ट अभी तक सार्वजानिक नहीं किया है।

महासभा का मानना है कि सोशल मीडिया में साझा हुए ड्राफ्ट में कई गंभीर खामियां हैं. नियमावली के अनेक प्रावधान पेसा के प्रावधानों के विपरीत हैं। नियमावली आदिवासी स्वायत्तता और प्राकृतिक संसाधनों पर सामुदायिक अधिकार को सुनिश्चित और सुरक्षित नहीं करती. उदाहरण के लिए, पेसा के अनुसार ग्राम सभा को आदिवासी भूमि का गलत तरीके के हस्तांतरण को रोकने और ऐसी भूमि वापिस करवाने की शक्ति होगी. लेकिन ड्राफ्ट नियमावली में निर्णायक भूमिका उपायुक्त की है। इसी प्रकार सामुदायिक संसाधनों पर ग्राम सभा का मालिकाना अधिकार का स्पष्ट व्याख्यान नही है।

महासभा का मानना है कि सबसे पहले पेसा में दिए गए सभी अपवादों और उपन्तारणों के अनुरूप झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001 को संशोधित करने की ज़रूरत है। उदाहरण के लिए, झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001 में राजस्व ग्राम को बुनियादी इकाई माना गया है, जबकि पेसा के अनुसार पारंपरिक ग्राम सभा बुनियादी इकाई है. साथ ही, झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001 में पारंपरिक ग्राम सभा की प्रमुखता, सामुदायिक संसाधनों पर अधिकार, पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और आदिवासी स्वायत्तता से संबंधित अनेक प्रावधान पूर्ण रूप से शामिल नहीं हैं। इसे संशोधित करने के बाद ही पेसा के तहत नियमावली को कानून का पूरा बल मिलेगा।

झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में “अबुआ राज” की स्थापना की ओर पेसा एक महत्त्वपूर्ण कदम है। पेसा लागू करवाने की पूरी प्रक्रिया लोगों के साथ मिलकर संचालित होनी चाहिए।

झारखंड जनाधिकार महासभा ने पेसा को लागू करवाने के लिए कुछ प्रमुख मांगें रखी हैं। ये मांगों इस प्रकार हैं –


पेसा के सभी अपवादों और उपन्तारणों के अनुरूप झारखंड पंचायती राज अधिनियम, 2001 को संशोधित किया जाये।
इसके बाद पेसा नियमावली के वर्तमान ड्राफ्ट की खामियों को पेसा कानून की मूल भावना अनुरूप ठीक किया जाये।
यह पूरी प्रक्रिया आदिवासियों, पारंपरिक आदिवासी स्वशासन प्रणाली के प्रतिनिधियों और आदिवासी अधिकारों और पांचवीं अनुसूची के मसले पर संघर्षरत जन संगठनों के साथ मिलकर पूर्ण पारदर्शिता के साथ चलायी जाये। पूरी प्रक्रिया को 6 महीने के अंदर पूर्ण कर पेसा को मजबूती के साथ ज़मीनी स्तर पर लागू किया जाये।
राज्य सरकार आदिवासियों, पारंपरिक आदिवासी स्वशासन प्रणाली के प्रतिनिधियों और आदिवासी अधिकारों एवं पांचवीं अनुसूची के मसले पर संघर्षरत जन संगठनों के प्रतिनिधियों व विभागीय पदाधिकारियों की एक समिति का गठन करे जो राज्य व केंद्र के सभी कानूनों का अध्ययन कर पेसा अनुरूप संशोधनों का सुझाव देगी। साथ ही, पेसा की धारा 4(व) अनुसार छठी अनुसूची के स्वशासी परिषद अनुरूप ढांचे का प्रारूप भी सुझावित करेगी।

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