हिजला व उसके आसपास के गांवों के ग्रामीणों ने बैठक कर कहा है कि अगर उनकी मांगें मेला समिति, जिला प्रशासन व सरकार द्वारा नहीं मानी गई तो आंदोलन को तेज किया जाएगा।
दुमका: झारखंड सरकार ने 136 वर्ष पुराना हिजला मेला के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2015 में इसे राजकीय मेला घोषित किया था। इसका उद्देश्य था कि राजकीय दर्जा मिलने के बाद इस मेले के आयोजन के लिय सरकारी बजट व सुविधाओं का विस्तार हो सके और आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, कला और सामाजिक एकता व समरसता को संरक्षण और बढ़ावा मिले। इसके साथ ही नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ सके।
साथ ही स्थानीय हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद और पारंपरिक वस्तुओं को प्रोत्साहित किया जा सके। पर, वर्तमान परिस्थितियों में इन उद्देश्यों के विपरीत हालात उत्पन्न हो रहे हैं। इसको लेकर दुमका प्रखंड के विभिन्य गांवों हिजला, हडवा, धतिकबोना, करमडीह, लेटो, गोविंदपुर, गरडी आदि में सामाजिक व्यवस्था व परंपरा के तहत कुल्ही दुरुप यानी बैठक की गई।
गांव में कुल्ही दुरुप ग्रामीणों ने वर्ष 2026 के मेला आयोजन व्यवस्था पर चर्चा की और कहा कि पूर्व भांति आदिवासी समाज की संस्कृति, परंपरा, कला, पारंपरिक नृत्य, संगीत एवं कलाकारों को मेला समिति व प्रशासन उचित स्थान नही दे रहा है। मेले के दौरान होने वाले कार्यक्रम बढ़ाने के जगह घटा दिए गए हैं और जनमानस के अनुकूल काम नहीं किया जा रहा है।

विरोध प्रदर्शन व पुतला दहन में पुरुषों के साथ महिलाएं भी शामिल थीं।
कुल्ही दुरूप में कहा गया कि जहां महंगाई आसमान छू रही है, वहीं कलाकारों की राशि घटायी जा रही है। ग्रामीणों का आगे कहना है कि आदिवासी के नाम पर हिजला मेला का आयोजन तो किया जा रहा है, लेकिन आदिवासियों को ही दरकिनार कर दिया जा रहा है।
13 फरवरी को मेला शुरू होने से पहले हिजला गांव के साथ विभिन्न आदिवासी सामाजिक संगठनों ने मेला समिति को लिखित आवेदन देकर मांग की थी कि सभी बैनर, पोस्टर आदि हिंदी के साथ-साथ संताली भाषा व ओलचिकी लिपि में भी तैयार करायी जाए, लेकिन मेला समिति ने इसके लिए कोई पहल नहीं की। उल्टा इस वर्ष तोरण द्वार में ओलचिकी संताली डिस्प्ले को भी हटा दिया गया है। पिछले वर्ष व वर्ष 2024 मंे भी संताली भाषा में बैनर तैयार किए गए थे।
ग्रामीणों का कहना है कि यह साजिश के तहत हम आदिवासियों के पहचान को मिटाने का कोशिश है। ग्रामीणों का कहना है कि कुछ आदिवासी कलाकारों से मेला समिति द्वारा आवेदन लेने के बाद भी बिना पूर्व सूचना के कार्यक्रम के स्लॉट से को उन्हें हटा दिया गया है, जिससे आदिवासी कलाकारों को कला प्रदर्शन करने का मौका नहीं मिल रहा हैं। इससे आदिवासी कलाकार बहुत दुखी और आक्रोशित हैं।
कलाकारो ने इसके लिए मेला समिति के अध्यक्ष और सचिव से लिखित और मौखिक गुहार भी लगायी, ऑफिस का चक्कर भी काटा, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला। ग्रामीणों और कलाकारों का यह भी कहना है कि वर्ष 2025 की राशि बहुत विलंब से कलाकारो को दी जा रही है। वह भी जितना मिलना चाहिय था, उतना नहीं दिया गया है। अबुवा दिसोम अबुवा राज होने के बाद भी हिजला मेला के इन मुद्दों में आदिवासी विधायक, सांसद, जनप्रतिनिधि सभी मौन हैं।
ग्रामीणों ने कहा एक प्रेस बयान में इस जनभावनाओं के खिलाफ बताया है और कहा है कि इस तरह से राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव धीरे-धीरे अपना वास्तविक स्वरूप खो रहा है और मेला खत्म होने की ओर अग्रसर हो रहा है।
हिजला मेला सरुवा पंचायत के अंतर्गत आता है। इस पंचायत के हाडवा, धतकी और करमडीह के ग्रामीणों का कहना है कि इस बार हम सभी को मेला में कला प्रदर्शन का मौका नहीं दिया गया, जबकि हर वर्ष हम कला प्रदर्शन करते थे।
इससे ग्रामीणों काफी दुखी और आक्रोशित हैं। मेला समिति के रवैया से निराश विभिन्न गांवों के अक्रोशित ग्रामीणों ने मेला समिति के साथ-साथ मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, दुमका के विधायक बसंत सोरेन, दुमका के सांसद नलिन सोरेन, जामा की विधायक डॉ लुईस मरांडी, शिकारीपाड़ा के विधायक अलोक कुमार सोरेन, जिला परिषद अध्यक्ष जोयेस बेसरा का पुतला दहन किया और मांग की कि जल्द मेला में ओलचिकी लिपि में भी बैनर लगवायी जाए। कलाकारों की राशि में कोई कटौती नहीं की जाए और सभी कलाकारों को 100 प्रतिशत भुगतान किया जाए।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं –
संताली भाषा की लिपि ओलचिकी में भी बैनर और तोरण द्वार पर डिस्प्ले लगाया जाय।
सभी कलाकारों को वर्ष 2025 का 100 प्रतिशत मानदेय शीघ्र भुगतान किया जाए।
जिन कलाकारों को आवेदन देने के बावजूद कला प्रस्तुति से वंचित किया गया है, उन्हें भागीदारी का अवसर दिया जाए।
आदिवासी कलाकारों की राशि में कटौती बंद की जाए।
पूर्व के वर्षों के सभी सांस्कृतिक कार्यक्रमों को पुनः बहाल किया जाए तथा संभव हो तो नए कार्यक्रम जोड़े जाएं।
मेला समिति जनभावना के अनुरूप कार्य करे।
ग्रामीणों ने कहा है कि अगर आदिवासी भाषा, लिपि, संस्कृति व कला को संरक्षित करने से संबंधित उनकी मांगें नहीं मानी गई तो आंदोलन तेज किया जाएगा। विरोध प्रदर्शन में बाबूलाल टुडू, मुंशी हेम्ब्रोम, सुनीता मरांडी, मकु टुडू, मती हेम्ब्रोम, भारती टुडू, चिंता हेम्ब्रोम, मिस हांसदा, शर्मीला मरांडी, मालती मुर्मू, शांति मुर्मू, सुनील टुडू, दुर्गा मरांडी, जोहोन टुडू, राजा मरांडी, बाहामुनि टुडू, रोजवेल मुर्मू, श्रीशांत सोरेन, रूपलाल मुर्मू, सुशील टुडू, दिलीप सोरेन, एमेल मरांडी, इमानुवेल हांसदा, देवी सोरेन, नोरेन देहरी, मंत्री मुर्मू, दुखनी मुर्मू, रुबिलाल सोरेन, बीटी सोरेन, दुलार सोरेन, सलोनी मुर्मू के साथ काफी संख्या में महिला और पुरुष उपस्थित थे।