दुमका : 135 वर्ष पुराना ऐतिहासिक राजकीय जनजातीय हिजला मेला महोत्सव दुमका प्रखंड के हिजला गांव में हर साल बसंत के दिनों में आयोजित होता है। इस साल यह मेला 21 फ़रवरी से 28 फरवरी तक आयोजित किया गया है। इस मेले का उदघाटन यहां के प्रधान सुनीलाल हांसदा करते हैं। इस साल इस मेले के शुरू होने से पहले से ही संताल समाज व स्थानीय ग्रामीण यह मांग कर रहे थे कि तोरणा द्वार, बैनर-पोस्टर व अन्य सूचनाएं हिंदी के अलावा संताली भाषा और ओलिचिकी लिपि में भी तैयार करवाई जाए, ताकि उनकी भाषाई पहचान को महत्व मिले। पर, ऐसा नहीं किया गया। इससे नाराज ग्रामीणों ने रविवार, 23 फरवरी को ग्राम प्रधान सुनीलाल हासंदा की अध्यक्षता में एक कुल्ही दुरूप यानी बैठक की।
इस बैठक में हिजला गांव के ग्रामीणों के साथ-साथ आदिवासी सामजिक संगठनो ने नाराजगी व्यक्त की। ग्रामीणों और सभी संगठनो ने कहा कि आदिवासी व उनकी संस्कृति के नाम पर मेला हो रहा है, लेकिन कहीं भी मेला समिति के द्वारा संताली में बैनर और तोरण द्वार नहीं लगाया गया है, जबकि इसके पूर्व के वर्ष में लगाया गया था। यह क्षेत्र आदिवासी बहुल है। ग्रामीणों और विभिन्न संगठनों का यह कहना है कि हिजला गांव के ग्रामीण और विभिन्न सामाजिक संगठनो ने तोरण द्वार और बैनर आदि में संताली भाषा की ओलचिकी लिपि से भी लिखने का लिखित आवेदन मेला समिति को पूर्व में ही दिया था। उसके बाद भी यह मांग पूरी नहीं कर आदिवासी समाज का अपमान किया गया है।

2024 के हिजला मेले में तोरण द्वार में संताली भाषा व ओलिचिकी लिपि का प्रयोग किया गया था। इस बार इस संबंध में निर्णय लिए जाने के बाद भी ऐसा नहीं किया गया।
मेला समिति की 27 जनवरी 2025 के आयोजन से संबंधित बैठक की कार्यवाही में भी यह निर्देश दिया गया था कि सभी तोरण द्वार ओलचिकी स्क्रिप्ट/लिपि से लिखा जाए। इसके आलोक में सभी तोरण द्वार में हिंदी और संताली ओलचिकी लिपि से लाइट डिस्प्ले कर लिखा गया था, लेकिन मेला शुरू होने के एक दिन पूर्व ही रातों-रात उसे हटा दिया गया।
ग्रामीणों और संगठनो का कहना है कि ऐसा लग रहा है कि मेला समिति किसी अन्य के दबाव में काम कर रही है। उसके साथ-साथ हिजला मेले के जितने भी होडिंग/बैनर लगाये गये हैं, सभी में संताल आदिवासी के पूज्य स्थल मरांग बुरु थान का कई वर्ष पुराना पोआल छावनी वाला फोटो लगाया गया है। मेला शुरू होने पर मरांग बुरु की पूजा होती है। उदघाटन के बाद सभी अधिकारी भी पूजा करते हैं। ज्ञात हो दो वर्ष पहले दुमका के विधायक व पूर्व मंत्री बसंत सोरेन के प्रयास से कच्चे स्थान की जगह संगमरमर का स्थान बनाया गया, लेकिन जनसंपर्क और मेला समिति की लापरवाही से आदिवासियों के मरांग बुरु देवता का अपमान हुआ है और कहीं ना कहीं विधायक और सरकार के विकास के कार्य को कम आकने का काम किया गया है।

हिजला मेले का एक दृश्य।
हिजला के ग्रामीणों और सभी आदिवासी संगठनों ने मेला समिति से मांग की है कि सभी बैनरो/पोस्टरांे में लगी मरांग बुरु स्थान की तस्वीर बदली जाए और नई व मौजूदा तसवीर लगाई जाए। तोरण द्वारा, बैनर व अन्य सूचनाएं ओलचिकी लिपि से भी लिखी जाए। अगर जल्द मेला समिति ऐसा नही करती है तो सभी ग्रामीण और आदिवासी संगठन जमकर इसका विरोध करेंगे।
आज की बैठक में हिजला के ग्रामीण दिलीप सोरेन, गणेश हांसदा, अनिल टुडू, लाल हांसदा, मारग्रेट हांसदा, सोना सोरेन, मनोती हेम्ब्रम, पतामुनि सोरेन, स्वीटी सोरेन, लूली हांसदा, एमेल मरांडी,,रुबिलाल हांसदा, संजय हांसदा, आजु हांसदा, लुखिराम हांसदा, विभीषण हांसदा, सोम हांसदा, प्रकाश सोरेन, संतोष हेम्ब्रम, सुनील सोरेन, सोनोत हांसदा के साथ-साथ कई आदिवासी संगठनो के प्रतिनिधि उपस्थित थे।