दूसरा चांदमुनी बनाने की हो रही है साजिश, चाय बागानों के साथ कब होगा न्याय?

चाय बागान मजदूरों के खून-पसीने से सींची गई जमीन पर उद्योगपतियों व व्यापारियों की नजर टिकी है और सरकार विकास के नाम पर मजदूरों को विस्थापित होने व पलायन को मजबूर कर रही है।

किरसेन खड़िया

सिलीगुड़ी का चमकता-दमकता “सिटी सेंटर” आज उत्तर बंगाल की पहचान बन चुका है, लेकिन इसकी नींव में दफ़्न हैं चांदमुनी बागान के मजदूरों के आँसू, खून और श्राप। यह इलाका आज भी स्थानीय लोगों के लिए “चांदमुनी” ही है, जहाँ कभी हरे-भरे चाय के बागान थे और मजदूरों की मेहनत से जीवन की धड़कन थी। सरकार ने विकास के नाम पर जब इस परियोजना का ऐलान किया, तो 5,000 रोजगार, आर्थिक समृद्धि और क्षेत्र के परिवर्तन का सपना दिखाया। मगर आज यहाँ के मूल निवासी अपनी जमीन, घर और रोजगार गंवाकर दूसरे राज्य में मजबूरी की जिंदगी जीने को अभिशप्त हैं।

विकास के नाम पर विस्थापन का इतिहास

1992 में लक्ष्मी टी कंपनी ने चांदमुनी के 700 एकड़ बागान को 2.5 करोड़ रुपए में खरीदा। शुरुआती वादे थे : बागान को मुनाफे में लाना, रोजगार बचाना, और श्रमिकों का पुर्नावास। 1998 में तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्योति बसु की मौजूदगी में हुए MoU में 400 एकड़ पर टाउनशिप बनाने, श्रमिकों को 2 लाख रुपए मुआवजा देने, और नौकरियों की गारंटी का ऐलान हुआ। लेकिन, यह सब धोखा साबित हुआ। आज 600 एकड़ में फैला “उत्तरायण टाउनशिप” के पीछे छूट गए है बेदखल हुए मजदूर, जिन्हें न तो पूरा मुआवजा मिला, न रोजगार, न घर।

मालबाजार शहर (जलपाईगुड़ी जिला) से सटे राजा चाय बागान की कहानी भी अब चांदमुनी जैसी ही राह पर है। मालबाजार, जो आज जमीन की कीमतों में सिलीगुड़ी को टक्कर दे रहा है, वहाँ बागान की खाली पड़ी जमीन पर उद्योगपतियों की नजरें टिकी हैं। बागान मजदूरों ने प्रबंधन से गुहार लगाई कि इस जमीन पर चाय की बागान का विस्तार किया जाए, ताकि उनकी आजीविका सुरक्षित रहे। लेकिन कंपनी ने साफ मना कर दिया। सूत्रों के मुताबिक, यहाँ अब लॉज, शॉपिंग कॉम्प्लेक्स और रेस्टोरेंट बनाए जाएँगे। यह सवाल उठना लाजमी है: “जिस कंपनी का मुख्य व्यवसाय चाय है, वह चाय बागान लगाने से क्यों कतरा रही है?”

चाय बागानों के इतिहास को देखें, तो यह जमीन मजदूरों के पूर्वजों के खून, पसीने, श्रम, संघर्ष और त्याग से सींची गई है। आज यही जमीन “विकास” के नाम पर पूँजीपतियों और नेताओं के हाथों सौदेबाजी का जरिया बन गई है। चांदमुनी के विस्थापितों की तरह राजा बागान के मजदूरों को भी शहर से दूर धकेलने की तैयारी है। मालबाजार पार्क के पास खाली जमीन के एक हिस्से पर दीवार खड़ी कर दी गई है, मानो यह मजदूरों को उनके अधिकारों से अलग करने का प्रतीक हो।

सवाल सिर्फ जमीन का नहीं, बल्कि न्याय और अधिकारों का है। सरकार और प्रशासन को चाहिए कि:

  1. चाय बागानों की जमीन पर मजदूरों का प्राथमिक अधिकार सुनिश्चित करे।
  2. 5 Decimels पट्टा समाधान नहीं है संपूर्ण जमीन का मालिकाना अधिकार समाधान है ।
  3. चाय उद्योग को बचाने के लिए नीतिगत समर्थन दें, न कि उसे बिल्डरों के हवाले करें।
  4. चाय बागान के मजदूरों के लिए जल्द से जल्द न्यूनतम वेतन लागू करना होगा।

इतिहास को दोहराने की कीमत

चांदमुनी और राजा बागान की कहानी पूरे दार्जिलिंग-डुआर्स क्षेत्र के लिए चेतावनी है। विकास की अंधी दौड़ में हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चाय बागानों की पहचान सिर्फ उनकी हरियाली से नहीं, बल्कि मजदूरों की सांसों से बनी है। अगर उन्हें उनकी जमीन से बेदखल किया गया, तो यह न सिर्फ उनके साथ अन्याय होगा, बल्कि पूरे क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक विरासत का सफाया होगा। “विकास” की परिभाषा तब तक अधूरी है, जब तक उसमें मजदूरों की भागीदारी और सम्मान शामिल नहीं है।

(किरसेन खड़िया चाय बागान श्रमिक परिवार से आते हैं और पश्चिम बंग चा मजूर समिति के सदस्य हैं और चाय मजदूरों को संगठित कर उनके लिए संघर्ष कर रहे हैं। आप उनको उनके फेसबुक एकाउंट पर इस लिंक के जरिये फॉलो कर सकते हैं।)

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