दुमका: झारखंड राज्य में केजी से पीजी तक सभी शिक्षण संस्थानों में संताल आदिवासी की ओलचिकी लिपि व संताली भाषा में करवाने के सवाल को लेकर दुमका जिले के मसलिया व जामा प्रखंड के कई गांवों में कुल्ही दुरुह यानी बैठक की गई। दुमका जिले के झिलुवा, मसलिया, उपरबहाल आदि गांवों में परंपरागत मंझी परगना व्यवस्था के तहत बैठक की गई और राज्य के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और दुमका जिला प्रशासन से इस आशय की मांग रखी गई।
बैठक के पूर्व ग्रामीणों ने पूज्य स्थल मंझी थान में पूजा अर्चना की और माथा टेका। गांव को चलाने वाले मंझी बाबा, नायकी, जोग मंझी और ग्रामीणों का मांग है कि पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल की तर्ज पर झारखंड में भी केजी से पीजी तक सभी शिक्षण संस्थानों में सभी विषयों की पढाई संताली के ओलचिकी लिपि में करायी जाए।
ग्रामीणों का कहना है कि झारखंड राज्य का गठन मुख्य रूप से आदिवासी समुदायों के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास को ध्यान में रखते हुए किया गया था। झारखंड राज्य बनने के 25 वर्षों के बाद भी संताल आदिवासी समुदाय का संपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हुआ. है। संताल आदिवासी समुदाय झारखंड राज्य में आदिवासी जनसंख्या में सबसे अधिक संख्या है, उसके बाद भी संताल समुदाय का संपूर्ण सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, शैक्षणिक और आर्थिक विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं हो पाया है। उसका मुख्य कारण संताल आदिवासी का शैक्षणिक स्तर निम्न होना है। इनके शैक्षणिक स्तर और जीवन स्तर को सुधारा जा सकता है, जब उन्हें उनकी भाषा संताली और लिपि ओलचिकी में शिक्षा मिले और इसके लिए सरकारी शिक्षण संस्थानों में व्यवस्था की जाए।

ओलचिकी लिपि व संताली भाषा में शिक्षण संस्थानों में पढाई की मांग करते संताल आदिवासी।
ओलचिकी लिपि से पढाई की मांग पर ग्रामीणों का कहना है कि यह लिपि संताल समाज के लिय स्वदेशी और अपनी लिपि है, क्योकि इस लिपि के जनक स्वयं संताल आदिवासी के पंडित रघुनाथ मुर्मू हैं। जनक संताल समुदाय से होने के कारण ओलचिकी लिपि से संताली भाषा को 100 प्रतिशत शुद्ध लिखा जाता है। संताली भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में वर्ष 2003 में ही शामिल किया गया है। पूरे भारत में संताली भाषा की ओलचिकी लिपि कोे मान्यता मिलने से संताली साहित्य का विकास और अधिक होगा। एक लिपि एक भाषा होने से एक राज्य के साहित्यकार दूसरे राज्य के संताली साहित्य को आराम से पढ़-लिख सकेंगे। भारत के सबसे बड़े साहित्यिक पुरस्कार “साहित्य अकादेमी पुरुस्कार” संताली भाषा की सिर्फ ओलचिकी लिपि से लिखे गये साहित्य पर ही मिलने का प्रावधान है। साहित्य अकादेमी पुरुस्कार झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा के साथ अन्य राज्य के संताल साहित्यकारो को ओलचिकी लिपि में ही साहित्य लिखने पर मिला है।
बंगाल में ओलिचिकी में पढाई होती है। इसके साथ ओडिशा, आसाम राज्यों में भी संताली भाषा की ओलचिकी लिपि को मान्यता हासिल है। दुनिया में संताल आदिवासियों को अलग पहचान मिले, इसके लिए उनकी लिपि को पहले मान्यता मिले, इससे वे एक सूत्र में बंधेंगे।

कुल्ही दुरुह यानी बैठक करते संताल आदिवासी। संताल आदिवासियों ने अपनी भाषाई मांग को लेकर आदिवासी परंपरा के तहत बैठक का आयोजन किया।
अंतराष्ट्रीय गूगल ट्रांसलेट में भी संताली की ओलचिकी लिपि को स्थान मिला है. पूरी दुनिया में किसी भी भाषा को संताली की ओलचिकी लिपि में ट्रांसलेट कर सकते हैं। देश का सबसे प्रतिष्ठित सिविल सेवा परीक्षा में संताली भाषा के लिए ओलचिकि लिपि से भी परीक्षा देने का प्रावधान है। भारत के केन्द्रीय भारतीय भाषा संस्थान(सी.आई.आई.एल.), मैसूर में संताली भाषा के लिए ओलचिकी लिपि का प्रयोग किया जाता है। साइंस्टिफिक एंड टेक्निकल काउंसिल, नई दिल्ली में भी ओलचिकी लिपि का भी उपयोग किया जाता है।
साथ ही सरकार के एक 13 फरवरी 2019 के आदेश के आलोक में यह मांग की गई कि संताल बहुल इलाके में सभी सरकारी संस्थान, कार्यालयों, भवनों का नाम संताली भाषा की ओलचिकी लिपि में लिखा जाए। ग्रामीणों का कहना है कि मांगें पूरी नहीं होने पर आंदोलन तेज किया जाएगा, क्योंकि यह संतालों के अस्तित्व व सम्मान का सवाल है।
बैठक में सुरेंद्र किस्कु, लखन किस्कु, देना किस्कु, सुनील किस्कु, लुखिराम किस्कु, गोपिन किस्कु, शुरू मुर्मू, देवराज हेम्ब्रम, लखिन्दर हेम्ब्रम, मनोज मुर्मू, सूर्यदेव हेम्ब्रम, संजय हांसदा, मार्गेन मरांडी, राजकिशोर मरांडी आदि उपस्थित थे।