भोपाल में कम ज्ञात प्रजातियों पर तीन दिनों के कान्फ्रेंस में संरक्षण गैप को भरने पर विमर्श

कान्फ्रेंस के दौरान 23 प्रतिभागियों ने विभिन्न विषयों व संरक्षण परियोजनाओं पर अपना वक्तव्य प्रस्तुत किया।

भोपाल: मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल में 16 से 18 जनवरी तक मध्य भारत में कम ज्ञात प्रजातियां कान्फ्रेंस (Conference on Lesser-Known Species of Central Indian Landscape) का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में वन अधिकारी, वन्यजीव विशेषज्ञ, रिसर्चर एवं पर्यावरण पत्रकारों ने हिस्सा लिया। इस आयोजन में मध्य भारत सहित देश के अन्य हिस्सों में पाये जाने वाले कम ज्ञात प्रजातियों, उसके संरक्षण की चुनौतियों एवं बेहतर काम करने की संभावनाओं पर विमर्श किया गया। कार्यक्रम का आयोजन इनवायरमेंटल प्लानिंग एंड को-आर्डिनेशन आरगेनाइजेशन परिसर में किया गया।

पहले दिन कान्फ्रेंस का उदघाटन मध्य प्रदेश वन विभाग के प्रधान मुख्य वन संरक्षण और वन बल प्रमुख वीएन अम्बाड़े, चीफ वाइल्ड लाइफ वार्डन शुभरंजन सेन, मध्य प्रदेश बायोडायवर्सिटी बोर्ड के अजय यादव एवं भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के निदेशक डॉ के रविचंद्रन ने संयुक्त रूप से किया। उद्घाटन सत्र में भारतीय वन प्रबंधन संस्थान के पूर्व प्रोफेसर बीसी चौधरी उपस्थित थे।

कान्फ्रेस में 23 वक्ताओं ने विभिन्न विषयों, संरक्षण परियोजनाओं पर अपना वक्तव्य दिया और पैनल चर्चा में शामिल हुए। इन वक्ताओं पूर्व वन अधिकारी, रिसर्चर, संरक्षणवादी, पारिस्थितिकीविद शामिल थे।

कान्फ्रेंस के पहले दिन डॉ शोमिता मुखर्जी ने कच्छ क्षेत्र में स्मॉल कारनिवोर्स पर अपनी प्रस्तुति दी। इकोलोजिस्ट सुमित डुकिआ ने राजस्थान में ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (गोनावण) के संरक्षण प्रयासों में समुदाय और युवाओं के सहयोग की बात की।

दूसरे दिन वाइल्ड लाइफ कंजरवेशन ट्रस्ट के तरुण नायर ने अलग-अलग सत्रो में केन-बेतवा और चंबल नदियों के इकोलॉजिकल फिलो और केन नदी में घडियाल संरक्षण के प्रयासों पर अपनी बात रखी।

कान्फ्रेंस में छत्तीसगढ़ के वाइल्ड बफैलो, हिल मैना, पश्चिम हिमालय की फायर फ्लाई के साथ-साथ अंडमान की डुगोंग, मध्यप्रदेश की राज्य मछली महशीर के संरक्षण पर चर्चा हुई।

एसएनएचसी के फाउंडर और चीफ एडिटर विकास बघेल ने बताया इस कान्फ्रेंस का मकसद उन प्रजातियों को प्रमुखता देना है, जिन्हें कम महत्वपूर्ण माना जाता है। मतलब ज़ब टाइगर की बात होती है तो स्मॉल कैट्स की बात ज्यादा नहीं होती। हमने पिछले तीन वर्षों में 35 वन्य प्रजातियों को कवर किया है। हम सभी को कवर नहीं कर पाये पर किसी हद तक हम अपने लक्ष्य तक पहुंच पाये।

अभी हम जिन वन्य प्रजातियों पर काम कर रहे वे प्रदेश के बाहर की हैं। ऐसा नहीं है कि हमने मध्यप्रदेश को छोड़ दिया है, अब हमने अपना फोकस एरिया बड़ा किया है।

इस कान्फ्रेंस के आयोजन का मुख्य उद्देश्य बातचीत के माध्यम से कमियों को पहचाने और संरक्षण प्रयासों की कमियों को पाटना है।

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