मुड़मा जतरा: उरांव और मुंडा आदिवासियों के सांस्कृतिक मिलन स्थल का क्या है इतिहास?

रांची से करीब 30 किमी की दूरी पर आयोजित होने वाला मुड़मा जतरा उरांव आदिवासियों का एक प्रमुख आयोजन है। इस आयोजन को उरांव व मुंडा आदिवासियों का मिलन स्थल भी कहा जाता है, जिसमें दोनों वर्गाें के बीच धार्मिक-सांस्कृतिक आदान-प्रदान होता है। इस आयोजन की ऐतिहासिक वजहें हैं और माना जाता है कि उरांव आदिवासी इस क्षेत्र से अन्य जगह गए हैं। इसलिए वे एक ऐतिहासिक संकल्प के तहत कार्तिक महीने के पहले दिन यहां जुटते हैं और अपने पूर्वजों को याद करते हैं।

रांची: आदिवासी संस्कृति, जीवन पद्धति और मान्यता को समझने में उनके धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजन, जतरा, मेला व हाट बहुत मददगार होते हैं। आदिवासी बहुल झारखंड में कई इलाकों में मेले और जतरा का आयोजन होता है, जिनके पीछे ऐतिहासिक वजहें होती हैं। ऐसी ही आयोजनों में एक विशिष्ट जतरा है – रांची के मांडर ब्लॉक के मुड़मा मैदान में आयोजित होने वाला मुड़मा जतरा।

मुड़मा जतरा खरीफ की फसलों की पहली कटाई के दौरान होता है और इसलिए नवाखानी की परंपरा भी पूरी की जाती है, यानी नए अनाज के पकवान व खाद्य पदार्थाें को खुद खाना व मेहमानों को खिलाना। इस समय धान, गोंदली, मड़ुआ तैयार होने लगता है तो उसका लड्डू, छिलका, रोटी व अन्य पकवान बनाकर खाने-खिलाने की पंरपरा है।

मुड़मा जतरा में अपने परिवार व 400 लोगों के दल के साथ पहुंचे लातेहार जिले के अशोक उरांव।

मुड़मा जतरा में विशेष तौर पर उरांव आदिवासी की संस्कृति, मान्यताओं और परंपरा की झलक मिलती है। हालांकि इसमें मुंडा आदिवासियों की संस्कृति और परंपरा की भी उपस्थिति होती है। इसलिए इस आयोजन का उरांव व मुंडा संस्कृति का मिलन स्थल भी कहा जाता है। एक तरह से उरांव मुंडा की मेजबानी करते हैं और परस्पर भाईचारा बढाते हैं।

मुड़मा जतरा में उरांव आदिवासियों की परंपरा का एक दृश्य, जिसमें वे अपने हाथ में पुरखों और पड़हा को स्मरण करने वाली तख्तियां लेकर निकलते हैं।

सरना धर्म गुरु और राजी पाड़हा जतरा समिति के बंधन तिग्गा ने क्लाइमेट ईस्ट को बताया, “मुड़मा जतरा का आयोजन कार्तिक महीने के पहले दिन होता है। जितने भी उरांव जनजाति के लोग चाहे वह सरगुजा में हों या सुंदरगढ़ में या कहीं और; वे इसी क्षेत्र से गए थे। इसलिए ऐतिहासिक रूप से यह संकल्प लिया गया था कि आश्विन पूर्णिमा के बाद जब कार्तिक माह की पहली घड़ी (कार्तिक माह का पहला दिन) गुजरेगी तो हम यहां जुटेंगे और अपने पूर्वजों को याद करेंगे और शक्ति खूंटा की परिक्रमा करेंगे।

जय पुरखा, जय पाड़हा लिखी तख्ती।

बंधन तिग्गा कहते हैं, “देश भर से व पड़ोसी देशों (नेपाल, भूटान, बांग्लादेश) से आने वाले उरांव यहां अपने धार्मिक प्रतीक चिह्न लेकर आते हैं और शक्ति खूंटा के रूप में देवी-देवताओं की परिक्रमा करते हैं और पूर्वजों को याद किया जाता है”।

तिग्गा बताते हैं कि यह आयोजन मूलतः उरांव आदिवासी करते हैं और इसमें मुंडा आदिवासियों का हम स्वागत करते हैं। इसलिए यह स्थल उरांव व मुंडा आदिवासी व उनकी संस्कृति का मिलन स्थल भी कहा जाता है।

मुड़मा जतरा में मेले का एक दृश्य।

बंधन तिग्गा कहते हैं कि मुड़मा से पश्चिम की ओर उरांव का क्षेत्र है और पूर्व की ओर मुंडा का क्षेत्र और यह ऐतिहासिक सहमति बनी थी कि मुंडा के क्षेत्र में जो उरांव रहेंगे, वहां उन्हें भी मुंडा की भाषा को अपनाना होगा। वे कहते हैं, “यह परंपरा दो संस्कृतियों के मिलन व एकता व सद्भाव का प्रतीक है और हम इस आयोजन में सभी आदिवासी वर्गाें व समुदायों का स्वागत करते हैं”।

वे कहते हैं, “यहां पूजा पद्धतियों का आदान-प्रदान होता है और दोनों संस्कृतियों का सम्मिश्रण होता है”। बंधन तिग्गा के अनुसार, यहां 40 पाड़हा के राजा जमा होते हैं और 40 दीये जलाए जाते हैं।

लोक जीवन व न्याय व्यवस्था


मुड़मा जतरा सिर्फ एक धार्मिक व सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह लोगों के जीवन को भी सीधे तौर पर प्रभावित करता है। सरना धर्म गुरु बंधन तिग्गा कहते हैं, “जतरा के दौरान लड़का-लड़की पसंद किया जाता है और शादी-विवाह की बात यहां से बढाई जाती है। यहां आने वाले लोग अपने परिवार के लिए बहू को पसंद करते हैं”।

इसके साथ ही यह यह आयोजन उरांव आदिवासी स्वशासन व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट की तरह काम करता है। बंधन तिग्गा कहते हैं, “पारिवारिक, भाई-भाई या गांव के जिस विवाद को गांव में नहीं सुलझाया जाता है, उसे यहां सुलझाया जाता है”। वे कहते हैं, “गांव का अखड़ा निचली अदालत की तरह है, पाड़हा हाइकोर्ट की तरह है और यह जतरा हमारे स्वशासन व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट की तरह है”।

लोगों का क्या हैं अनुभव

लातेहार जिले के बरियातू ब्लॉक से आए अशोक उरांव कहते हैं, “यहां आकर अच्छा लगता है, अपनी संस्कृति को समझने का मौका मिलता है और हम गर्व से इसके बारे में बात कर सकते हैं। वे कहते हैं कि शक्ति खूंटा की परिक्रमा कर मन को खुशी मिलती है। वे कहते हैं, हम अपने देवी-देवताओं की पूजा भी करते हैं”।

अशोक उरांव राजी पाड़हा सरना पा़ड़हा प्रार्थना सभा के अध्यक्ष हैं और सरना धर्म और संस्कृति के संरक्षण की बात करते हैं। वे कहते हैं कि हमलोग अपने ब्लॉक से 400 लोगों की टीम में निकलते हैं और यहां आते हैं। वे अपनी पत्नी और बेटे के साथ यहां आए।

इसी तरह ओडिशा के सुंदरगढ़ जिले के बिसरा ब्लॉक के संतोषपुर गांव से अपने परिवार के साथ यहां पहुंचे ढुचू तिर्की ने कहा, “यहां आने पर परंपरा से जुड़ने का अहसास होता है, हम यहां सरना पूजा करते हैं”। सुंदरगढ़ जिले के ही बिसरा ब्लॉक से आए सोमा खलखो, सीता उरांव आदि भी मुड़मा जतरा में आकर खुश थे। उन्होंने कहा, यहां आकर अच्छा लगता है और अपना संस्कृति को समझने का मिलता है और हमें गर्व का अहसास होता है।

आलेख व तसवीर: राहुल सिंह।

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