बोकारो जिले में स्थित लुगू बुरू आदिवासियों का एक पवित्र तीर्थ स्थल है। यहां हर साल अंतरराष्ट्रीय सरना धर्म सम्मेलन का आयोजना होता है। यहां 1500 मेगावाट की एक प्रस्तावित जल विद्युत परियोजना प्रस्तावित थी, जिसके खिलाफ स्थानीय आदिवासियों की गोलबंदी ने राज्य सरकार को स्टैंड लेने पर मजबूर किया।
राहुल सिंह
आदिवासी प्रकृति जीवी होते हैं और उनके पर्व-त्योहार व उत्सव भी ऐसे होते हैं जो उन्हें प्रकृति से जोड़ते हैं और उसके महत्व को बताते हैं। वे पहाड़, जंगल, पेड़ और प्रकृति से जुड़े अन्य प्रतीकों में आस्था रखते हैं और उन्हें पूजते हैं। उन प्राकृतिक संरचनाओं में उनकी आस्था उन्हें उसके संरक्षण के लिए भी प्रेरित करती है। ऐसा ही झारखंड के बोकारो जिले में एक पहाड़ है – लुगू बुरू।
लुगू बुरू आदिवासियों का एक बेहद ही पवित्र तीर्थ स्थल है, जहां देश के कई राज्यों ही नहीं बल्कि पड़ोस के देशों के भी आदिवासी वर्ग के लोग यहां के सालाना कार्तिक पूर्णिमा उत्सव में पहुंचते हैं। बोकारो शहर से यह जगह करीब 73 किमी की दूरी और गोमिया ब्लॉक से 16 किमी की दूरी पर है। यह जगह जंगल के बीच स्थित है और इसका प्रवेश मार्ग सड़क से जुड़ा हुआ है। यह गोमिया ब्लॉक के अंतर्गत ही आता है।

कार्तिक पूर्णिमा पर आदिवासी समुदाय के लोग व सरना धर्मावलंबी यहां जुटते हैं और भूतल पर स्थित लुगू बुरु घंटा बाड़ी से पहाड़ की यात्रा आरंभ करते हैं और पहाड़ पर लुगु बुरु के गुफा नुमा पवित्र स्थल पहुंच कर दर्शन करते हैं और चढावा चढाते हैं।
लुगू बुरू मेला संताल आदिवासियों के गौरवशाली अतीत, सांस्कृतिक और धार्मिक आस्था से जुड़ा हुआ है। लुगू बाबा के नाम पर इस पहाड़ का नाम लुगू पहाड़ है। यह पहाड़ बेहद मनोरम है और घने जंगलों वाला क्षेत्र है। बोकारो जिला प्रशासन के द्वारा जारी सूचना के अनुसार, पहाड़ की तलहटी में घंटा बाड़ी धोरोम गाढ दोरबार चट्टान अवस्थित है, जहां सदियों पूर्व संतालों के पूर्वजों ने लुगू बाबा की अध्यक्षता में 12 वर्षों तक लगातार विचार-विमर्श कर संताल समाज की सामाजिक प्रथा एवं रीति रिवाज जन्म से मरन तक की परंपरा का निर्धारण किया था। साथ ही संताल समाज के लिए संविधान का निर्माण किया गया था।

इसी मान्यता के आधार पर सोहराय कुणामी यानी कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय महासम्मेलन का आयोजन होता है। इस आयोजन में सामाजिक उत्थान, भाषा, साहित्य, संस्कृति, धार्मिक एवं शिक्षा के विकास पर चर्चा होती है। इस महासम्मेलन में आने वाले लोग पहाड़ पर लुगू बाबा के दर्शन कर मन्नतें मांगते हैं।

लुगू बुरू गौरवशाली संताल अतीत का प्रतीक
पहाड़ की तलहटी जहां लुगू बुरु घंटा बाड़ी स्थित है, वहां से पहाड़ के शिखर जहां ऐतिहासिक गुफा जिसे घिरी दोलान कहते हैं, उसके अंदर प्रवेश कर लुगू बाबा का दर्शन करते हैं। यहां अंतरराष्ट्रीय सरना धर्म महासम्मेलन का आयोजन वर्ष 2001 से आरंभ हुआ। इस गुफा में हर महीने अमावस्था व पूर्णिमा को भी श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। भूतल से शिखर तक की दूरी सात किलोमीटर है और नीचे से उपर चढने में तीन से चार घंटे का वक्त लगता है।

प्रस्तावित जल विद्युत परियोजना का विरोध और राज्य सरकार का स्टैंड
लुगू बुरू पहाड़ के आसपास के क्षेत्र में डीवीसी की 1500 मेगावाट क्षमता की जल विद्युत परियोजना प्रस्तावित थी। सालों तक इस परियोजना को लेकर जमीन अधिग्रहण का प्रयास होता रहा, लेकिन स्थानीय आदिवासियों ने हमेशा इसका मजबूती से विरोध किया। उनका तर्क रहा है कि जल विद्युत परियोजना लगने से यहां के दर्जनों आदिवासी गांव उजड़ जाएंगे, पहाड़ का अस्तित्व संकट में आ जाएगा और बड़े पैमाने पर विस्थापन होगा। विरोध के लिए उन्होंने हमेशा अपने ही क्षेत्र के तेनुघाट डेम परियोजना का जिक्र किया जिससे विस्थापित हुए दर्जनों गांवों के आदिवासियों का उचित पुनर्वास नहीं हो सका। कई परिवारों का अस्तित्व व पहचान संकट में आ गया। आदिवासियों के इस विरोध के परिणाम स्वरूप वर्ष 2023 में 23वें संताल सरना धर्म सम्मेलन में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने कहा कि जबतक उनकी सरकार है और वे मुख्यमंत्री हैं लुगु बुरू पर जल विद्युत परियोजना को मंजूरी नहीं दी जाएगी। फिर जून 2024 में तत्कालीन मुख्यमंत्री चंपई सोरेन की सरकार ने केंद्र सरकार को पत्र लिख कर प्रस्तावित जल विद्युत परियोजना को रद्द करने की मांग की। यानी आदिवासियों के विरोध व आंदोलन की वजह से इस पहाड़ का अस्तित्व व यहां की हरियाली बची है।
लुगू पहाड़ पर मिलते हैं दुर्लभ औषधीय पौधे
लुगू बुरू पहाड़ पर दुर्लभ औषधीय पौधे मिलते हैं, जिसे यहां आने वाले लोग ले जाते हैं। लोग पत्ते-पेड़ की टहनियों, जड़ों और पत्तों को ले जाते हैं। इस पहाड़ के शिखर पर दो सुंदर तालाब हैं – एक बड़ा और एक थोड़ा छोटा। एक में लोग स्नान कराते हैं और दूसरे से जल लेते हैं।

लुगू बुरू पहाड़ और उसकी तराई ही नहीं बल्कि आसपास का पूरा क्षेत्र समृद्ध वन क्षेत्र वाला है, जहां की प्राकृतिक सुंदरता व हरियाली मन मोह लेती है। इस जंगल और हरियाली को बचाए रखना जरूरी है।
(सभी फोटो: राहुल सिंह/क्लाइमेट ईस्ट।)