कहते हैं अकेला चना भांड नहीं फोड़ सकता। लेकिन, केरल के पालक्काड जिले के कल्लूर बालन का पूरा जीवन इस कहावत के उलट था। उन्हें किसी पहचान की जरूरत नहीं है। खामोशी से पर्यावरण को सहेजने के लिए काम करने वाले बालन ने पांच सिंतारा होटलों में होने वाले कार्यक्रम या जलवायु परिवर्तन पर होने वाले सम्मेलनों में शिरकत नहीं की। लेकिन, उनका काम ऐसा है कि आज उनके निधन के बाद सभी उन्हें शिद्दत से याद कर रहे हैं।
इसी सप्ताह पलक्कड जिला अस्पताल में हृदय संबंधी जटिलताओं की वजह से उनका निधन हो गया। उनका निधन पेड़-पौधे लगाने, वन्यजीवों की देखभाल करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए समर्पित असाधारण जीवन का खत्म होना है।
एक वक्त था जब केरल में पालक्काड, त्रिशूर और मलप्पुरम की पहाड़ियां बंजर थीं। अब इन पहाडियों पर जीव-जंतुओं का कलरव सुनाई देता है। पेड़ों की छाया मिलती है। प्रकृति यहां फिर से जी उठी है। अब यहां ताड़, बांस, इमली और नीम जैसे पेड़ दिखाई देते हैं। उनके हाथों से फैलाई गई हरियाली, एक-एक पौधा, 100 एकड़ से ज्यादा जगह में फैल गई है।
अपनी जिंदगी में उन्होंने करीब 25 लाख पेड़ लगाए। इससे बंजर जमीन जंगल में बदल गई। इस काम में दशकों लग गए। उनके औज़ार सामान्य थे – बांस की एक छड़ी, हरी लुंगी और पर्यावरण को सहेजने की जिद्द।
बालन का जन्म ऐसे काम के लिए नहीं हुआ था। उनका जन्म ऐसे घर में हुआ था जहां पिता ताड़ी निकालते थे। आठवीं तक पढ़ाई करने के बाद उन्होंने अपने पुश्तैनी काम को आगे बढ़ाया। उनका आने वाला समय भी शायद ऐसा ही कुछ होता।
लेकिन, शराब के खिलाफ श्री नारायण गुरु की शिक्षाओं ने उनकी जिंदगी की राह बदल दी। उनके शब्दों ने कल्लूर बालन को शराब छोड़ने और दूसरे उद्देश्य के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया। इसके बाद उन्होंने पेड़-पौधों में अपना उद्देश्य पाया।
पर्यावरण संरक्षण के प्रति बालन की प्रतिबद्धता उनके पहनावे से झलकती थी। वे हमेशा हरे रंग की शर्ट, हरी लुंगी और हरा हेडबैंड पहनते थे। यह सब प्रकृति के साथ उनके गहरे जुड़ाव का प्रतीक था।

कल्लूर बालन का का फाइल फोटो। फोटो क्रेडिट – एक्सप्रेस।
बालन का घर कल्लुरमुचेरी में स्थित है। यह पालक्काड-ओट्टापलम रोड पर मनकुरुसी से चार किलोमीटर दूर है। उनके गांव के आसपास का इलाका भी कभी बंजर था। अब उनकी अथक कोशिशों की वजह से हरियाली में तब्दील हो चुका है।
उनकी उल्लेखनीय पहलों में से एक थी, चट्टानी इलाके में पक्षियों और कीड़ों के लिए पानी की व्यवस्था करना। उन्होंने चट्टानों के बीच छोटे-छोटे तालाब खोदे, जिससे वन्यजीवों को नया बसेरा मिला। इससे यह पक्का हुआ कि सबसे मुश्किल हालातों में भी पौधों के लिए पानी की कमी ना हो।
बांस की छड़ी और पौधे लेकर वह अपने दोपहिया वाहन पर यात्रा करते हुए सड़कों के किनारे, सार्वजनिक स्थानों पर और पड़ोसी जिलों में भी पेड़ लगाते रहे। आज, उनके पेड़ राष्ट्रीय राजमार्गों और ग्रामीण इलाकों में ऊंचे स्थानों पर खड़े हैं, जो छाया, फल और वन्यजीवों को आसरा देते हैं।
उन्होंने ना सिर्फ पौधे लगाए बल्कि उनका पालन-पोषण भी किया। अपने बच्चे की तरह हर पेड़ की देखभाल की। और जब उन्होंने देखा कि वन्यजीवों को परेशानी हो रही है, तो बालन ने उन्हें भी खिलाना शुरू कर दिया। हर सुबह, वह बाज़ार के व्यापारियों से बेकार पड़े फल इकट्ठा करते और उन्हें जंगल में ले जाते, जहां बंदरों, पक्षियों और जंगली सूअरों को भोजन दिया जाता। ये बेजुबान भी पेड़ों के पार उनकी आवाज़ पर भरोसा करते थे।
हालांकि, उनके काम पर पहले किसी का ध्यान नहीं गया। लेकिन, 2011 में उन्हें केरल का वन मित्र पुरस्कार दिया गया। हालांकि, इस सम्मान ने उनके जीवन जीने के तरीके को नहीं बदला। तब भी वह सूर्याेदय के समय उठते, हमेशा की तरह हरे कपड़े पहनते और जंगल का चक्कर लगाते। पेड़ और जानवर उनसे उम्मीद करने लगे थे।
वह अपने पीछे अपनी पत्नी और तीन बेटों को छोड़ गए हैं। लेकिन उनकी असली विरासत उन जंगलों में है जो आज भी अपनी जगह पर खड़े होकर बालन को विनम्र श्रद्धांजलि दे रहे हैं। सड़कों के किनारे छायादार पेड़, चुटियानपरमलाई घाटी का हरा-भरा विस्तार। उनके द्वारा बढ़ाया गया वन्यजीव।
(क्लाइमेट ईस्ट ने यह आलेख मोंगाबे इंडिया पर प्रकाशित मोंगाबे के फाउंडर Rhett Butler के द्वारा कल्लूर बालन पर लिखे गए आलेख और Shyam P V के द्वारा लिखे गए न्यू इंडियन एक्सप्रेस के आलेख के आधार पर तैयार किया है। आप दोनों को यहां लिंक क्लिक कर पढ सकते हैं।)