सड़क पर इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ दिख रही हैं। तीन पहिया ईवी ने शहरों की लास्ट माइल डिलीवरी बदल दी है। प्रीमियम इलेक्ट्रिक कारें अब स्टेटस सिंबल भी हैं। लेकिन कागज़ पर रखे आंकड़े एक अलग कहानी कहते हैं।
इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी इकोनॉमिक्स एंड फिनांसियल एनालिसिस (Institute for Energy Economics and Financial Analysis – IEEFA) की 25 फरवरी 2026 को जारी रिपोर्ट के अनुसार 2020 से 2025 के बीच भारत के इलेक्ट्रिक ट्रांसपोर्ट सेक्टर में 2,23,119 करोड़ रुपये, यानी लगभग 25.6 अरब डॉलर का निवेश हुआ। यह राशि उल्लेखनीय है, लेकिन 2030 तक निर्धारित लक्ष्यों के लिए अनुमानित 12.5 लाख करोड़ रुपये की आवश्यकता का यह केवल 18 प्रतिशत है।
अर्थात लगभग 82 प्रतिशत पूंजी, करीब 10.27 लाख करोड़ रुपये, अब भी जुटाई जानी है।
रिपोर्ट कैपिटल फ्लोस इंड इंडियाज इलेक्ट्रिक ट्रांसपोर्ट सेक्टर (Capital flows in India’s electric transport sector) को सुभम श्रीवास्तव, सौरभ त्रिवेदी और चारिथ कोंडा ने तैयार किया है। तीनों लेखकों ने 2020 से 2025 के बीच पूंजी प्रवाह का समेकित विश्लेषण कर निवेश अंतराल और वित्तीय संरचना की चुनौतियों को रेखांकित किया है।
भारत ने 2030 तक निजी कारों में 30 प्रतिशत, वाणिज्यिक वाहनों में 70 प्रतिशत, बसों में 40 प्रतिशत और दो व तीन पहिया वाहनों में 80 प्रतिशत ईवी हिस्सेदारी का लक्ष्य रखा है। इन लक्ष्यों के लिए विनिर्माण क्षमता, चार्जिंग अवसंरचना और वित्तीय ढांचे में बड़े पैमाने पर निवेश आवश्यक है।
रिपोर्ट के अनुसार 2020 से 2025 के बीच निवेश का सबसे बड़ा हिस्सा मैन्युफैक्चरिंग क्षमता में गया। इसके बाद सरकारी सब्सिडी और प्रोत्साहन, और फिर चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर। विनिर्माण निवेश में आंतरिक संसाधनों की हिस्सेदारी 1,59,701 करोड़ रुपये रही, इसके बाद ऋण 36,738 करोड़ रुपये और इक्विटी 6,455 करोड़ रुपये।
सौरभ त्रिवेदी के अनुसार, “2020 से 2025 के बीच इलेक्ट्रिक तीन पहिया वाहनों ने लगभग 78 प्रतिशत निवेश आकर्षित किया। यह सेगमेंट अपेक्षाकृत परिपक्व और व्यावसायिक पैमाने पर संचालित है।” हालांकि वे जोड़ते हैं कि 2024 और 2025 में निवेश घोषणाओं का रुझान चार पहिया ईवी की ओर मुड़ा है, बढ़ती मांग के कारण।
सरकारी योजनाओं, जिनमें FAME सहित केंद्र और राज्य स्तरीय नीतियाँ शामिल हैं, के तहत वित्त वर्ष 2020 से 2024 के बीच 18,251 करोड़ रुपये वितरित किए गए। इसने शुरुआती मांग को प्रोत्साहित किया।

लेकिन चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की रफ्तार पर्याप्त नहीं। 2020 में 5,151 सार्वजनिक चार्जर थे, जो 2025 तक बढ़कर 39,485 हो गए। फिर भी 2030 लक्ष्यों के लिए अनुमानित 20,600 करोड़ रुपये की आवश्यकता के मुकाबले 2020 से 2025 तक वास्तविक निवेश केवल लगभग 9.6 प्रतिशत रहा।
चारिथ कोंडा कहते हैं, “सार्वजनिक ईवी चार्जिंग अभी तक एक परखा हुआ व्यावसायिक मॉडल नहीं है। कई स्टेशनों पर उपयोग दर कम है और शुरुआती लागत अधिक, यही कारण है कि निवेशकों की रुचि सीमित रहती है।”
रिपोर्ट का केंद्रीय तर्क वित्त की लागत पर है। वाणिज्यिक ईवी उधारकर्ताओं को 15 से 33 प्रतिशत तक की ब्याज दरों का सामना करना पड़ता है। यह स्तर ईवी की कुल स्वामित्व लागत के लाभ को कम कर देता है।
सुभम श्रीवास्तव के शब्दों में, “बाधा पूंजी की अनुपलब्धता नहीं, बल्कि यह है कि ईवी जोखिम की कीमत कैसे तय की जा रही है। जब बैटरी प्रदर्शन, अवशिष्ट मूल्य और नकदी प्रवाह को लेकर अनिश्चितता होती है, तो वही जोखिम उच्च ब्याज दरों में दिखता है।”

बिहार की राजधानी पटना में एक इवी चार्जिंग स्टेशन का दृश्य। फोटो – राहुल सिंह।
रिपोर्ट एक एकीकृत ईवी वित्त मंच का प्रस्ताव करती है, जिसमें आंशिक क्रेडिट गारंटी, रेसिडुअल वैल्यू सुरक्षा, बैटरी एज़ ए सर्विस और को लेंडिंग ढांचा शामिल हो. सूक्ष्म व लघु उद्यम खंड के लिए SIDBI और बड़े फ्लीट व संस्थागत खरीदारों के लिए IIFCL जैसी विकास वित्त संस्थाएं इसे एंकर कर सकती हैं।
त्रिवेदी के अनुसार, “निर्माताओं को क्षमता बढ़ाने के लिए पूर्वानुमानित मांग संकेत चाहिए, लेकिन मांग सस्ती ऋण उपलब्धता पर निर्भर है। यदि जोखिम को उचित तरीके से साझा किया जाए तो वित्त लागत घट सकती है और व्यावसायिक पैमाने पर तैनाती तेज हो सकती है।”
रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि जैसे जैसे बिक्री मात्रा और प्रदर्शन डेटा बढ़ेगा, जोखिम प्रीमियम घट सकता है। इससे पूंजी का पुनर्चक्रण संभव होगा और एक स्व-प्रेरित निवेश चक्र विकसित हो सकता है।
भारत की ईवी कहानी अब केवल नीति घोषणाओं की नहीं। यह वित्तीय संरचना की परीक्षा है। 2.23 लाख करोड़ रुपये ने आधार तैयार किया है। लेकिन 2030 की मंज़िल तक पहुंचने के लिए पूंजी का प्रवाह सस्ता, संरचित और भरोसेमंद होना होगा।