इन दिनों पर्यावरण के क्षेत्र में कॉमन्स शब्द की चर्चा प्रमुखता से हो रही है। हालांकि अंग्रेजी का शब्द कॉमन्स हिंदी भाषियों के बीच कोई नया शब्द नहीं है। सामान्यतः इसका अर्थ एक ऐसी स्थिति, वस्तु या स्थान से लगाया जाता है जिस पर सबका समान रूप से अधिकार हो। तो उसी के अनुरूप पर्यावरण के क्षेत्र में कॉमन्स का तात्पर्य है ऐसी संपदा जिस पर समुदाय का या सबका हक हो। हिंदी में इस संदर्भ में कॉमन्स का शाब्दिक अर्थ सामुदायिक संपदा से लगाया जा सकता है। यहां पर प्रयुक्त सामुदायिक संपदा में प्राकृतिक या नेचुरल शब्द का भाव अंतरनिहित है और इस सामुदायिक संपदा का अर्थ मानव निर्मित किसी सार्वजनिक भवन, गैर प्राकृतिक कृत्रिम ढांचे से तो नहीं लगाया जा सकता है।

तो इस सामुदायिक संपदा के प्रति आदिवासी समाज सैकड़ों-हजारों सालों से अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील, सचेत रहा है और इनके सबसे करीब भी। झारखंड के दुमका जिले के हिजला गांव आदिवासियों की इसी संवेदनशीलता का एक प्रमाण है। हिजला का इतिहास कॉमन्स की रक्षा के लिए संताल आदिवासियों की प्रतिबद्धता से जुड़ा है, जब उन्होंने अंग्रेजों द्वारा एक विशाल सखुआ के पेड़ के काटे जाने के विरुद्ध आंदोलन शुरू कर दिया था।

मौजूदा दुमका शहर से मात्र तीन किमी की दूरी पर स्थित हिजला पहाड़ी के चारों ओर बसे हिजला गांव की तलहटी में स्थित एक पेड़ को अंग्रेजों ने इस संदेह पर कटवा दिया था कि उसके नीचे बैैसी या बैठक या मीटिंग करने वाले संताल आदिवासी उनके खिलाफ कहीं विरोध की रणनीति तो नहीं बना रहे हैं। अंग्रेजों को लगा कि यह पेड़ कट जाएगा तो उसके नीचे बैसी भी नहीं होगी। यह वह वक्त था जब सिदो मुर्मू-कान्हू मुर्मू के नेतृत्व में 1855 का सशक्त संताल हूल हो चुका था। संताल के इस सशक्त विद्रोह ने अंग्रेजों के मन में एक स्थायी भय का भाव भर दिया था। हिजला गांव के कुछ प्रमुख लोगों का मानना है कि संभवतः इसी शंका की वजह से पास की कोठी में रहने वाले अंग्रेजों ने पेड़ को कटवा दिया जिसके बाद उस कोठी की आदिवासियों ने घेराबंदी की और अपना विरोध जताया और उस पेड़ कर उनके जीवन में महत्व के साथ यह भी बताया कि वे उसके नीचे बैठक कर गांव के मुद्दों पर चर्चा करते थे और नीति-नियम तय करते।

कहा जाता है कि इसके बाद ही अंग्रेजों ने 1890 के आसपास इस नुकसान की भरपाई के लिए वहां पर संताल आदिवासियों के लिए सांस्कृतिक मेले के आयोजन की पेशकश की और वह मेला शुरू हो गया। तब से इस मेले का आयोजन चला आ रहा है। हालांकि कोरोना के दो सालों में यह आयोजन नहीं हो सका था।

हिजला गांव में कटे पेड़ के स्थल पर मरांग बुरु का पूज्य स्थल बन गया है। संताल अपने देवता को मरांग बुरु कहते हैं। यह भी कहा जाता है कि उक्त स्थल पर पेड़ कटने से देवता नाराज हुए थे और बारिश नहीं हुई थी, जिससे काफी परेशानी हुई और खेती बाधित हुई थी। ये सब कथ्य पेड़ों के सामुदायिक जीवन में महत्व और पर्यावरण से उनके रिश्ते को रेखांकित करते हैं और यह यह भी साबित करता है कि आदिवासी समुदाय प्रकृति के सबसे करीब है और उसका सबसे बड़ा रक्षक भी है।
इस साल हिजला मेला 21 फरवरी से 28 फरवरी तक आयोजित होगा। इससे पहले हर वर्ष की भाति इस वर्ष भी मेला के पूर्व दिसोम मारंग बुरु संताली अरीचली आर लेगचार अखड़ा के बैनर तले हिजला, धतीकबोना, हडवाडीह आदि गांव के संताल आदिवासियो ने मरांग बुरु स्थल पर पूजा की और यह कामना की कि यह महोत्सव शांतिपूर्वक संपन्न हो। नायकी यानी संताल पुजारी राजेन्द्र बास्की के अनुसार, मेले में आने वाले लोगो को कोई दुःख तकलीफ ना हो उसके लिए पूजा की गई। वहीं मंझी बाबा सुनीलाल हांसदा ने बताया कि संताल आदिवासियों में यह परंपरा है कि कोई भी शुभ काम शुरू करने के पहले आपने इष्ट देवता मरांग बुरु का की हम पूजा अर्चना करते हैं। उन्होंने शुक्रवार यानी 21 फरवरी को मेले का उद्घाटन किया। इस मेले का उद्घाटन ग्राम प्रधान ही करते हैं।