यूरोप में सिर्फ जलवायु परिवर्तन की वजह से हीटवेव नहीं आया, इसकी एक वजह हीटडोम भी है। हीटवेव से लगभग 32.7 करोड़ लोग और 15.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं। इनमें 26.4 करोड़ लोग और 13.4 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक गतिविधियां सबसे गंभीर श्रेणी की गर्मी के दायरे में थीं।
एक समय था जब भीषण गर्मी की खबरें ज़्यादातर भारत, पाकिस्तान या पश्चिम एशिया से आती थीं। यूरोप की पहचान अपेक्षाकृत ठंडे मौसम वाले महाद्वीप के रूप में होती थी। लेकिन, अब तस्वीर बदल रही है।
इस साल जून के आखिरी दिनों में पश्चिमी यूरोप के कई हिस्सों में पड़ी रिकॉर्ड तोड़ गर्मी को लेकर आयी नई वैज्ञानिक रिपोर्ट कहती है कि यह सिर्फ मौसम की एक सामान्य घटना नहीं थी। मानवजनित जलवायु परिवर्तन ने इसे पहले की तुलना में कहीं अधिक गर्म और खतरनाक बना दिया।
क्लइमामीटर (ClimaMeter) के अध्ययन के मुताबिक जून 2026 की इस हीटवेव के दौरान बने मौसमीय हालात आज से करीब 30 साल पहले की तुलना में 2.5 डिग्री सेल्सियस तक अधिक गर्म थे। अगर 50 साल पहले से तुलना करें तो यह अंतर लगभग 3.5 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है।
रिपोर्ट के अनुसार इस हीटवेव से लगभग 32.7 करोड़ लोग और 15.6 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की आर्थिक गतिविधियां प्रभावित हुईं। इनमें 26.4 करोड़ लोग और 13.4 ट्रिलियन डॉलर की आर्थिक गतिविधियां सबसे गंभीर श्रेणी की गर्मी के दायरे में थीं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इस हीटवेव की वजह सिर्फ जलवायु परिवर्तन नहीं थी।
इसके पीछे एक वजह “हीट डोम” भी था। यानी ऐसा मौसमीय पैटर्न जिसमें एक उच्च दबाव वाला क्षेत्र लंबे समय तक एक ही जगह बना रहता है। इससे गर्म हवा बाहर नहीं निकल पाती और तापमान लगातार बढ़ता रहता है।
लेकिन रिपोर्ट कहती है कि यही मौसमीय स्थिति कुछ दशक पहले इतनी खतरनाक नहीं होती। आज यह इसलिए रिकॉर्ड तोड़ रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन ने धरती के औसत तापमान को पहले ही बढ़ा दिया है।
फ्रांस के CNRS-IPSL से जुड़े वैज्ञानिक मार्को ज़ांची (Marco Zanchi) कहते हैं कि हीट डोम कोई नई घटना नहीं है। नया यह है कि अब जिस वातावरण में यह बनता है, वह पहले से कहीं अधिक गर्म हो चुका है। यही वजह है कि पहले जो मौसम सिर्फ गर्मी लाता था, वही अब रिकॉर्ड तोड़ तापमान पैदा कर रहा है।
रिपोर्ट भारत के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश छोड़ती है।
भारत कई वर्षों से भीषण हीटवेव का सामना कर रहा है। अब वही तस्वीर यूरोप में भी दिखाई देने लगी है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यूरोप 1990 के दशक के बाद दुनिया का सबसे तेजी से गर्म होने वाला महाद्वीप बन चुका है। लगातार बढ़ती हीटवेव बताती हैं कि जलवायु परिवर्तन अब किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है।
इटली के INGV (National Institute of Geophysics and Volcanology) से जुड़े वैज्ञानिक टोमासो अल्बेर्टी (Tommaso Alberti) कहते हैं कि जून 2026 की हीटवेव कोई असाधारण मौसमीय घटना नहीं थी। असाधारण यह था कि पहले से गर्म हो चुकी जमीन और समुद्र ने इसे बेहद विनाशकारी बना दिया। इसके कारण हीट स्ट्रेस बढ़ा, अस्पतालों पर दबाव बढ़ा, बिजली की मांग बढ़ी, बिजली आपूर्ति प्रभावित हुई और गर्मी से होने वाली मौतों में इजाफा हुआ। उनके मुताबिक अब ऐसी घटनाओं को अपवाद नहीं माना जा सकता। यही नया सामान्य बनता जा रहा है।
यूनिवर्सिटी ऑफ शेफील्ड के Haosu Tang का कहना है कि आज वैज्ञानिक पहले से कहीं बेहतर तरीके से हीटवेव का पूर्वानुमान लगा सकते हैं। चुनौती अब मौसम का अनुमान लगाने की नहीं, बल्कि समाज को उसके लिए तैयार करने की है।
ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के नेवेन एस. फुचकर (Neven S. Fučkar) कहते हैं कि यह हीटवेव दिखाती है कि प्राकृतिक मौसमीय परिस्थितियों को मानवजनित जलवायु परिवर्तन किस तरह और अधिक खतरनाक बना रहा है। उनके मुताबिक यह निष्कर्ष आईपीसीसी के आकलनों के अनुरूप हैं, जिनमें कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन यूरोप में हीटवेव की आवृत्ति और तीव्रता दोनों बढ़ा रहा है।
वैज्ञानिकों का कहना है कि समाधान सिर्फ उत्सर्जन घटाने तक सीमित नहीं है। शहरों को गर्मी के मुताबिक ढालना होगा। स्वास्थ्य सेवाओं को तैयार करना होगा। बिजली व्यवस्था को अधिक मजबूत बनाना होगा और रिन्यूएबल एनर्जी आधारित एनर्जी ट्रांजिशन को तेज करना होगा।
लंबे समय तक यूरोप को गर्मी से अपेक्षाकृत सुरक्षित माना जाता रहा। लेकिन अब वहां भी रिकॉर्ड टूट रहे हैं। यह रिपोर्ट याद दिलाती है कि जलवायु परिवर्तन सिर्फ तापमान नहीं बढ़ा रहा। वह उन जगहों का मौसम भी बदल रहा है, जहां कभी भीषण गर्मी को अपवाद माना जाता था। और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है। अब हीटवेव किसी एक देश या महाद्वीप की समस्या नहीं रही।