डिजिटल कॉमन्स की जलवायु कार्रवाइयों में अहम भूमिका

दिल्ली में नौ एवं 10 मार्च को डिजिटल कॉमन्स पर दो दिन की कार्यशाला आयोजित की गई है। इस कान्फ्रेंस में हुए संवाद में यह तथ्य उभर कर सामने आया कि डिजिटल डेटा और टेक्नोलॉजी जलवायु कार्रवाई, पुनर्भरण और समुदाय की अगुवाई वाले विकास से संबंधित फैसले लेने में अहम भूमिका निभाते हैं।

नई दिल्ली: डिजिटल डेटा व तकनीक आज की तकनीक आधारित दुनिया में जलवायु कार्रवाइयों में भी अहम भूमिका निभाती हैं। डिजिटल डेटा व टेक्नोलॉजी गवर्नैंस के माध्यम से जलवायु कार्रवाई, किसी क्षेत्र या स्थल विशेष की पुनर्बहाली व समुदाय की अगुवाई वाले विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

नई दिल्ली में नौ और 10 मार्च 2026 को इस विषय पर आयोजित दो दिन के कान्फ्रेंस में हुए संवाद में ये विचार उभर कर सामने आए। वक्ताओं ने इस दौरान कहा कि डिजिटल कॉमन्स के महत्व को रेखांकित किया और कहा कि यह साझा निर्माण, क्रियान्वयन, दीर्घकालिक साझेदारी के लिए व्यावहारिक रास्तों को समर्थन देने के लिए अभ्यासकर्ताओं, संस्थाओं व समुदाय को एक साथ ला रहा है।

कान्फ्रेंस के पहले दिन का फोकस इस विषय पर था कि आज डिजिटल कॉमन्स क्यों जरूरी है। भारत के लिए एक परिपक्व डिजिटल कॉमन्स इकोसिस्टम कैसा दिखता है और डेटा के आंतरिक संचालन की संरचना कैसी होनी चाहिए।

आयोजन के दौरान तकनीक व डिजिटल डेटा से समुदाय की कोशिशों में आने वाली मजबूती पर चर्चा की गई।

डिजिटल कॉमन्स के महत्व पर हुई परिचर्चा में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, दिल्ली के प्रो आदितेश्वर सेठ, फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्यूरिटी के एक्जक्यूटिव डायरेक्टर सुब्रत सिंह, आप्ती इंस्टीट्यूट की सीनियर रिसर्च ऐसोसिएट वैष्णवी पाटिल, अर्ध्यम के सीइओ मनु श्रीवास्तव और ओपन ओपन जियोस्पेशियल कंसोर्टियम से हर्षा मदिराजू ने हिस्सा लिया। इनके साथ ही एनवायर्नमेंटल डिफेंस फंड के लीड एडवाइजर विनय डधवाल, ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स, ओपन जियोस्पेशियल कंसोर्टियम की देबप्रिया दत्ता और पंचायती राज और ग्रामीण विकास मंत्रालय से उदय कुमार भी मौजूद थे।

अपने संबोधन में एफइएस के एक्जक्यूटिव डायरेक्टर सुब्रत सिंह ने इस बात पर जोर दिया कि तकनीक समुदाय की कोशिशों को कैसे मजबूत कर रही है। उन्होंने कहा, जिस तरह से समुदाय जीआइएस मैप का इस्तेमाल कर रहा है और टेक्नोलॉजी के बेहतर होने के साथ उससे जुड़ रहा है, इससे उनमें बहुत अधिक ऑनरशिप का भाव आता है और उन्हें अपनी कोशिशों को बेहतर ढंग से बताने में मदद मिलती है। जैसे-जैसे समुदाय इस प्रक्रिया में हिस्सा लेता है कि उनका क्षेत्र कैसे विकसित होना चाहिए, इससे उन्हें अपने क्षेत्र को बेहतर ढंग से समझने और उसके आधार पर फैसले लेने में मदद मिलती है।

वहीं, वैष्णवी पाटिल ने डेटा के सबसे अच्छे इस्तेमाल पर ज़ोर दिया। उन्होंने कहा, मुनाफे की साझेदारी का सिस्टम होने चाहिए ताकि न सिर्फ ज़मीन पर मौजूद लोग डेटा को एक्सेस कर सकें और इस्तेमाल कर सकें, बल्कि उन्हें इस बात पर भी कुछ हद तक सही कंट्रोल मिले कि इसका इस्तेमाल कैसे किया जा रहा है और इससे क्या वैल्यू मिल रही है।

डिजिटल कॉमन्स कान्फ्रेंस में समुदाय के लिए डेटा की उपलब्धता व उसके उपयोग पर जोर दिया गया। Photo – FES Communications team. 

डेटा और इंटरऑपरेबिलिटी की साझा संरचना पर एक खुली चर्चा भी हुई। इसमें डेटाए स्टैंडर्ड और इंटरऑपरेबिलिटी के आर्किटेक्चर पर फोकस किया गया।

आइटी फॉर चेंज के सीनियर एसोसिएट अभिनीत नैयर ने कहा, जब कम्युनिटी स्टीवर्डशिप या समुदाय के स्वामित्व और कम्युनिटी सेंट्रिक यानी समुदाय केंद्रित डिज़ाइन के मुद्दों पर काम किया जाता है, तो यह स्पष्टता होनी चाहिए कि समुदाय कौन है। उन्होंने आगे कहा, समुदाय की कई परतें या कड़ियां होती हैं, जिसमें एक डेवलप करने वाला समुदाय होता है और उपयोग करने वाला समुदाय होता है। उन्होंने कहा कि अगर दोनों समुदाय के हितों पर पर विचार नहीं किया जाता है, तो सॉफ्टवेयर और डेटासेट के फेल होने की संभावना होती है।

आयोजन के पहले दिन एक एक और आकर्षण समुदाय केंद्रित स्वामित्व या कम्युनिटी सेंटर्ड स्टीवर्डशिप पर चर्चा थी। इस चर्चा में फाउंडेशन फॉर इकोलॉजिकल सिक्योरिटी की डायरेक्टर इन्क्लूजन एंड इनोवेशन स्वपना सारंगी ने कहा, ग्रामीण समुदाय और गवर्नेंस सिस्टम के सामने अक्सर यह सवाल होता है कि लोग मैनेज नहीं कर सकते और उन्हें अपने संसाधनों का प्रबंधन करने के लिए विज्ञान व तकनीक के ज्ञान की जरूरत होती है। उन्हें कमतर कर सोचना उनके ज्ञान और देखभाल के कौशल को कमजोर करता है। उन्होंने कहा कि स्वामित्व या स्टीवर्ड्स के दो सेट होते हैं – एक जो कॉमन्स को मैनेज करते हैं और दूसरा जो डेटाबेस को मैनेज करते हैं।

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