भारत का पर्यावरण इतिहास लिखने वाले क्रिस्टोफर वी हिल नहीं रहे

भारत के पर्यावरण इतिहास पर शोध करने वाले और पुस्तक लिखने वाले प्रोफेसर क्रिस्टोफर वी हिल नहीं रहे। चार मार्च को 71 साल की उम्र में कार्डियक अरेस्ट से उनका निधन हो गया। उन्होंने अमेरिका के यूटा प्रांत की सॉल्ट लेक सिटी में आखिरी सांस ली।

भारत के पर्यावरण इतिहास पर उनकी पुस्तक “रिवर ऑफ सॉरो: एनवायरमेंट एंड सोशल कंट्रोल इन रिपेरियन नॉर्थ इंडिया” River of Sorrow: Environment and Social Control in Riparian North India, 1770-1994 को मिशिगन विश्वविद्यालय से प्रकाशित किया गया था।

प्रो हिल को पर्यावरण इतिहास में सर्वश्रेष्ठ लेख के लिए एल्डो लियोपोल्ड पुरस्कार भी मिला था। उन्होंने 1987 में वर्जिनिया विश्वविद्यालय से पीएचडी किया था और लॉक हेवन विश्वविद्यालय में पढाया। इसके बाद वे यूनिवर्सिटी ऑफ कोलोराडो (यूसीसीएस) में शामिल हुए।

यूसीसीएस पर उपलब्ध ब्यौरे के अनुसार, उनके रिसर्च का पसंदीदा विषय आधुनिक भारत का पर्यावरण इतिहास था। वे दक्षिण एशिया के आधुनिक इतिहास क्षेत्र पर केंद्रित रिसर्च करते थे। उनके कई आलेख प्रकाशित हुए हैं।

भारत से उनका अटूट नाता था और भारत में अपना वक्त भी गुजारा। उन्हें अनेकों प्रतिष्ठित सम्मान मिला और वे कई सारे संस्थानों से संबंद्ध रहे या उसके फेलो रहे। उनके काम व योगदान को आप इस लिंक पर पढ-जान सकते हैं।

कोशी नदी पर शोध करने वाले राहुल यादुका ने उनके निधन पर उन्हें याद करते हुए एक फेसबुक पोस्ट में लिखा, “हिल से मेरा संपर्क तीन साल पहले तब हुआ जब मैंने उनकी किताब ‘रिवर्स ऑफ सॉरो’ पढी। संयोग से वो फेसबुक पर मिले और उनका नंबर मिला। उनसे फोन पर बात हुई घंटों। मैं उनके उत्साह और नोस्टालजिया देखकर अभिभूत हुआ। वो कोशी के बारे में ऐसे पूछ रहे थे जैसे कहियो आव न हमरो मकान चिरई गीत में शहर में बसा आदमी अपने गाँव का हाल पूछता है। मुझे याद आता है उन्होंने जमींदारी और कृषक मजदूरों के बारे में जानना चाहा कि क्या बदला है। एक बार मैंने उनसे कहा कि मैं अपने पोस्ट आपके लिए इंग्लिश में ट्रांसलेट किया करूंगा तो उन्होंने इसका जवाब हिन्दी में लिखकर भेजा। उन्होंने मैला आँचल किस्म की किताबें पढ़ रखी थी”।

हिल बीमार चल रहे थे लेकिन जिंदादिल थे ऐसा उनके पोस्ट देखकर लगता था।

राहुल लिखते हैं, “हिल को मैंने बताया कि लोग उनकी किताब खोजते हैं पर मिलती नहीं। उन्होंने कहा था कि मैं मनोहर पब्लिकेशन से बात कर रहा था लेकिन अमेरिकी पब्लिशर कॉपीराइट ट्रांसफर करने का भारी कीमत मांग रहा है। हिल चले गए। उन्होंने अपनी जवानी कोशी को दे दी। आज हम उनको श्रद्धांजलि देते हैं”।

नेपाल स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल एंड इनवायरमेंट ट्रांजिशन के निदेशक व दक्षिण एशियाई नदियों के विशेषज्ञ अजय दीक्षित ने क्लाइमेट ईस्ट से बातचीत में कहा कि उन्हें प्रो हिल की किताब ‘रिवर ऑफ सॉरो’ पढ कर एक नई दृष्टि मिली और कोशी और उससे जुड़े विषयो को लेकर मेरी समझ का दायरा बड़ा कर दिया। उन्होंने कहा कि प्रो हिल की पुस्तक को पढने के बाद वे इस कोशिश में थे कि उनसे संपर्क करें और बात करें, लेकिन इससे पहले उनका निधन हो गया।


अजय दीक्षित कहते हैं, “प्रोफेसर हिल ने ईस्ट इंडिया कंपनी के आगमन और उसके संदर्भ में पर्यावरण को देखा। प्रोफेसर हिल ने सामाजिक, राजनीतिक और सिस्टमैटिक रिसर्च के जरिये उस दौर के पूरे संदर्भ को स्पष्ट किया है। उन्होंने कोशी दियारा को और पर्यावरण को नियंत्रित करने की कोशिश को अच्छे से समझाया है। उन्होंने पूर्णिया से बिहार-बंगाल के क्षेत्र को देखा-समझा जहां कोशी, गंगा, महानंदा, तिस्ता, अजय, दामोदर आदि नदियां हैं, उनके लिए यह नया क्षेत्र था”। वे अफसोस जताते हुए कहते हैं कि उनसे बात करने की इच्छा अधूरी रह गयी।

सूरत स्थित सेंटर फॉर सोशल स्टडीज के एसोसिएट प्रोफेसर सदन झा ने प्रो हिल के निधन पर क्लाइमेट ईस्ट से बात करते हुए कहा, “पिछले 15-20 सालों से मैं कोशी को समझने की कोशिश कर रहा हूँ, इसमें प्रो हिल की पुस्तक और इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल विकली में प्रकाशित उनके आलेख मेरे लिए मददगार रहे हैं”।


उन्होंने कहा कि प्रो हिल का आर्काइवल वर्क रहा है और उन्हें फील्ड वर्क भी किया है, अपने लेखन के जरिए उन्होंने ओल्ड पूर्णिया जिले के 1770 से 1994 के दौर को चिह्नित किया है। ऐसा नहीं है कि उन्होंने पर्यावरण पर केंद्रित लेखन किया, लेकिन उस समय की व्यवस्था, संरचना, समाज को जिस संदर्भ में देखा वह पर्यावरणीय स्थिति की समझ देता है। उन्होंने जमींदारी प्रथा, अकाल, रैयतों की बात की है। उनके लेखन से यह पता चलता है कि कैसे पर्यावरण बदल रह है। वे कहते हैं कि प्रो हिल ने मुझे अपनी पुस्तक खुद भेजी थी और इमेल पर उनसे संपर्क होता था और वे गर्मजोशी से जवाब देते थे।

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