दुमका: आदिवासी समुदायं के पर्व, परंपराएं और मान्यताएं उन्हें सीधे प्रकृति से जोड़ती हैं। ऐसा ही संतालों का एक पर्व व परंपरा है – बाहा। बाहा पर्व ठंड के आखिरी दिनों व गरमी के शुरुआती दिनों के बीच का उत्सव है, जिसमें लोग आखिरी दिन एक-दूसरे पर सादा पानी डाल कर पर्व मनाते हैं। बाहा पर्व तीन दिनों का होता हैै। पहले दिन पूज्य स्थल जाहेर थान में छावनी(पुवाल का छत)बनाते हैं, जिसे जाहेर दाप माह कहते हैं। दूसरे दिन को बोंगा माह कहते हैं और आखिरी दिन को शरदी माह भी कहते हैं। बुधवार, 12 मार्च को इस साल इस पर्व का आखिरी दिन है। तीसरे और अंतिम दिन को शरदी माह कहते हैं। इस दिन पूरे गांव में ग्रामीण एक-दूसरे पर सादा पानी डालते है, नाच-गान व एक-दूसरे के घर में खानपान करते हैं। संताल आदिवासियों में यह मान्यता है कि बाहा को सिर्फ सादा पानी से खेलना चाहिए और इसमें रंगों का उपयोग कतई नहीं करना चाहिए।
बाहा पर्व के दूसरे दिन ग्रामीण गांव के नायकी(पुजारी) को उनके आंगन से नाच-गान के साथ जाहेर थान ले जाते हैं। वहां पहुंचने पर नायकी बोंगा दारी(पूज्य पेड़़) सारजोम पेड़(सखुआ पेड़) के नीचे पूज्य स्थलों का गेह-गुरिह करते है। यानी गोबर और पानी से सफाई या शुद्धिकरण करते हैं। उसके बाद उसमे सिंदूर, काजल आदि लगाया जाता है। उसके बाद मातकोम(महवा) और सारजोम(सखुआ) का फूल चढ़ाते हैं। बाहा पर्व में जाहेर ऐरा, मारांग बुरु, मोड़ेकू-तुरुयकू धोरोम गोसाई आदि इष्ट देवी-देवताओ के नाम बलि दी जाती है। नायकी सभी महिला-पुरुष, बुजुर्ग और बच्चों को सारजोम पेड़(सखुआ पेड़) का फूल देते हैं। फूल ग्रहण करने पर सभी ग्रामीण नायकी को डोबोह(प्रणाम) करते हैं।
फूल को पुरुष भक्त कान में और महिला भक्त बाल के खोपा में लगाते हैं। उसके बाद सभी ग्रामीण तुन्दाह और टमाक के थाप पर बाहा नृत्य और गान करते हैं। बाहा नृत्य के बाद सभी प्रसाद ग्रहण करते हैं। उसके बाद ग्रामीण नायकी (पुजारी) को फिर से नाच-गान के साथ गांव ले जाते है, जहां नायकी गांव के सभी घरों में सारजोम (सखुआ) का फूल देते है और सभी ग्रामीण घर वाले नायकी के सम्मान में उनका पैर धोते हैं। नायकी के द्वारा फूल मिलते ही एक-दूसरे पर सादा पानी का बौछार करते हैं और इसका आनंद लेते हैं।

बाहा का शाब्दिक अर्थ फूल होता है। संताल आदिवासी बाहा पर्व सृष्टि के सम्मान में मनाते हैं। इसका प्रकृति और मानव के साथ सीधा संबंध। इसी समय सभी पेड़ो में फूल भी आते हैं।
बाहा पर्व के अवसर पर दुमका जिले के जामा प्रखंड के कुकुरतोपा गांव में दिसोम मारंग बुरु युग जाहेर आखड़ा द्वारा यह पर्व उल्लासपूर्वक मनाया गया। बाहा पर्व के आखिरी दिन सभी ग्रामीणों ने एक-दूसरे पर सादा पानी डाल कर उत्सव मनाया।

बाहा पर्व के तीसरे दिन एक-दूसरे पर सादा पानी डाल कर उत्सव मनाने का दृश्य।
रंगीन पानी से खेलना संताल परंपरा के विरुद्ध है। इस संबंध में दिसोम मारंग बुरु युग जाहेर आखड़ा के अध्यक्ष सुनील टुडू ने कहा कि पूर्वजों के समय से ही यह देखा गया है कि संताल आदिवासी हमेशा सादा पानी से ही बाहा खेलते आये हैं। संताल समाज में रंग का अपना महत्व है। पहले यह देखा गया है कि परंपरा के विरुद्ध अगर किसी कुंवारी लड़की पर रंगीन पानी डाल दिया जाता था तो उसे अशुद्ध मान लिया जाता था और उसे मिटाने के लिय दंड स्वरूप रंग डालने वाले पुरुष को पांच बकरी देने कि सजा दी जाती थी।
शरदी माह के दिन सभी ग्रामीण एक दुसरे पर पानी डालने के बाद एक-दूसरे के घर भोजन करते हैं। इस अवसर पर नायकी सिकंदर मुर्मू, लुखिन मुर्मू ,बाबूधन टुडू, रुबिलाल मुर्मू, विनोद मुर्मू, रफ़ायल टुडू, वीरेंद्र सोरेन, श्रीलाल मुर्मू, विवेक मुर्मू, विनोद मुर्मू, मणिलाल मुर्मू, राजेन्द्र मुर्मू, लुखिराम मुर्मू, लालमुनि हेम्ब्रम, मर्शिला मरांडी, सोनोत मुर्मू, गोपीचंद राणा, एलिजाबेद हेम्ब्रम, जोबा हांसदा आदि उपस्थित थे।