संताल आदिवासी परिवारों में बाहा पर्व की धूम, जानिए क्या है यह परंपरा

दुमका/गोड्डा : इन दिनों संताल आदिवासी बाहा पर्व मना रहे हैं। बसंत के दिनों में होने वाला यह पर्व लोग एक-दूसरे के साथ सादा पानी से मनाते हैं। इस पर्व के अलग-अलग दिन अलग-अलग रस्म निभायी जाती है।

प्रथम दिन – जाहेर दाप माह


इस दिन पूज्य स्थल जाहेर थान में छावनी बनाई जाती है और स्थल की तैयारी की जाती है।

द्वितीय दिन – बोंगा माह


इस दिन ग्रामीण गांव के नायकी (पुजारी) को उनके आंगन से नाच-गान के साथ जाहेर थान तक ले जाते हैं। वहां पहुंचने पर नायकी बोंगा दारी (पूज्य पेड़) सारजोम पेड़ (सखवा पेड़) के नीचे स्थित पूज्य स्थलों का गोबर और पानी से शुद्धिकरण करते हैं, जिसे गेह-गुरिह कहा जाता है। इसके बाद सिंदूर, काजल आदि अर्पित कर मातकोम (महुआ) और सारजोम (सखवा) के फूल चढ़ाए जाते हैं।

बाहा पर्व में जाहेर ऐरा, मारांग बुरु, मोड़ेकू-तुरुयकू, धोरोम गोसाई आदि इष्ट देवी-देवताओं के नाम पर बलि दी जाती है। नायकी सभी महिला-पुरुष, बुजुर्ग एवं बच्चों को सारजोम (सखवा) का फूल प्रदान करते हैं। फूल ग्रहण करने के पश्चात ग्रामीण नायकी को डोबोह (प्रणाम) करते हैं। पुरुष भक्त इसे कान में तथा महिला भक्त बालों के खोपा में लगाती हैं। इसके बाद तुन्दाह और टमाक की थाप पर बाहा नृत्य एवं गीत प्रस्तुत किए जाते हैं। नृत्य के उपरांत सभी प्रसाद ग्रहण करते हैं। तत्पश्चात ग्रामीण नायकी को पुनः नाच-गान के साथ गांव वापस लाते हैं। गांव पहुंचकर नायकी प्रत्येक घर में सारजोम (सखवा) का फूल देते हैं। घर के सदस्य नायकी के सम्मान में उनके चरण धोते हैं। फूल प्राप्त होते ही लोग एक-दूसरे पर सादा पानी डालते हैं।

तृतीय एवं अंतिम दिन – शरदी माह

इस दिन सुबह से ही ग्रामीण एक-दूसरे पर सादा पानी डालकर बाहा पर्व का आनंद लेते हैं। संताल आदिवासी समाज की मान्यता है कि बाहा केवल सादा पानी से ही खेला जाना चाहिए; रंगीन पानी से खेलना परंपरा के विरुद्ध माना जाता है। ग्रामीणों ने बताया कि पूर्वजों से चली आ रही परंपरा के अनुसार संताल समाज हमेशा सादा पानी से ही बाहा खेलता आया है। समाज में रंगों का अपना विशिष्ट महत्व है, इसी कारण बाहा में रंगीन पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। पूर्व समय में यदि किसी कुंवारी लड़की पर रंगीन पानी डाल दिया जाता था तो उसे छुत/अशुद्ध माना जाता था। इस अशुद्धि को दूर करने हेतु दंडस्वरूप रंग डालने वाले पुरुष को पांच बकरियां देने की सजा दी जाती थी।
बाहा पर्व के अंत में सभी ग्रामीण एक-दूसरे के घर जाकर सामूहिक भोजन करते हैं।

दुमका जिला अंतर्गत मसलिया प्रखंड के झिलुवा गांव एवं गोड्डा जिले के बोआरीजोर प्रखंड के बोआरीजोर गांव में ग्रामीणों द्वारा संताल आदिवासी समाज का प्रमुख प्रकृति पर्व बाहा उल्लास से मनाया।

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