समुद्र के बढते स्तर पर क्या हैं द लैंसेट के कमीशन का प्रमुख सुझाव?

सदी के अंत तक 41 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह सकते हैं जो हाई टाइड के स्तर से नीचे होंगे। यानी हर ज्वार के साथ खतरा उनके दरवाजे तक आएगा।

सुबह का वक्त है। किसी तटीय गांव में लोग रोज़ की तरह अपने काम पर निकल रहे हैं। लेकिन अब पानी पहले से थोड़ा और अंदर तक आ चुका है। खेत का किनारा बदल गया है। कुएं का पानी थोड़ा खारा लगने लगा है। और यह बदलाव इतना धीमा है कि दिखता कम है, महसूस ज्यादा होता है। यही वह कहानी है जिसे दुनिया अब समझने की कोशिश कर रही है।

द लैंसेट में 8 अप्रैल 2026 को जारी एक नई पहल, Lancet Commission on Sea-Level Rise, Health and Justice, इस बदलती हकीकत को एक नए नजरिए से देखती है। यह सिर्फ समुद्र के बढ़ने की कहानी नहीं है। यह सीधे इंसानी सेहत, जीवन और बराबरी की कहानी है।

यह कमीशन 26 वैश्विक विशेषज्ञों को साथ लाता है, जिनका मकसद है यह समझना कि बढ़ता समुद्री स्तर लोगों की सेहत को कैसे प्रभावित कर रहा है, और इसका जवाब कैसा होना चाहिए।

अब तक हम समुद्र के बढ़ने को अक्सर पर्यावरण की समस्या मानते रहे। लेकिन यह रिपोर्ट एक सीधी बात कहती है। यह एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है, जो अभी हो रही है।

समुद्र का पानी सिर्फ जमीन नहीं ले रहा। यह धीरे-धीरे पीने के पानी को खराब कर रहा है, फसलों को प्रभावित कर रहा है, और बीमारियों के पैटर्न बदल रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, सदी के अंत तक 41 करोड़ लोग ऐसे इलाकों में रह सकते हैं जो हाई टाइड के स्तर से नीचे होंगे। यानी हर ज्वार के साथ खतरा उनके दरवाजे तक आएगा।


बंगाल की खाड़ी का एक दृश्य। हाईटाइड की वजह से पर्यटकों के लिए रखी गई कुर्सियों का एक हिस्सा पानी में डूब गया।

कमीशन की सह-अध्यक्ष क्रिस्टियाना फिगरेस (Christiana Figueres) इसे बहुत साफ शब्दों में कहती हैं, “समुद्र का बढ़ना अब दूर की बात नहीं है। यह आज लोगों की जिंदगी, सेहत और रोज़गार को प्रभावित कर रहा है, खासकर उन लोगों को जिन्होंने इस संकट में सबसे कम योगदान दिया है।”

यानी यह सिर्फ जलवायु की कहानी नहीं है। यह न्याय की कहानी भी है।

तटीय इलाकों में रहने वाले लोग, छोटे द्वीप, गरीब समुदाय, ये सबसे पहले और सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं। जबकि कार्बन एमिशन का बड़ा हिस्सा कहीं और से आता है।

कैथरीन बो (Kathryn Bowen) एक और अहम बात जोड़ती हैं, “हर सेंटीमीटर समुद्र का बढ़ना सिर्फ पानी का बढ़ना नहीं है। यह असमानता का माप है, जो सबसे ज्यादा उन लोगों को चोट पहुंचाता है जो सबसे कम जिम्मेदार हैं।”

इसका असर सिर्फ शरीर पर नहीं, दिमाग पर भी है। विस्थापन, रोज़गार का नुकसान, अनिश्चितता, यह सब मिलकर मानसिक स्वास्थ्य पर भी दबाव बनाते हैं।

डब्ल्यूएचओ एशिया-पेसेफिक सेंटर फॉर एनवायरमेंट एंड हेल्थ के डायरेक्टर डॉ सैंड्रो डेमायो इसे और स्पष्ट करते हैं, “समुद्र का बढ़ना अब एक पब्लिक हेल्थ इमरजेंसी है। और कुछ न करना भी एक फैसला है, जिसका मतलब है लोगों की जिंदगी को खतरे में डालना।”

यानी यह सिर्फ डेटा नहीं है, यह चेतावनी है।

यह कमीशन इसीलिए सिर्फ समस्या नहीं गिनाता। यह समाधान की दिशा भी सुझाता है। इसका फोकस है कि कैसे देशों को ऐसे कदम उठाने चाहिए जो विज्ञान पर आधारित हों, लेकिन साथ ही न्यायपूर्ण भी हों। कैसे हम ऐसे सिस्टम बना सकते हैं जो सिर्फ मजबूत नहीं, बल्कि बराबरी वाले भी हों।

इस पूरी कहानी में एक और बात बार-बार सामने आती है। समुद्र का पानी धीरे-धीरे बढ़ता है, लेकिन उसका असर अचानक दिखता है। कहीं एक दिन पानी घर के अंदर आ जाता है। कहीं एक मौसम में फसल खत्म हो जाती है। कहीं एक तूफान पूरी बस्ती को हिला देता है।

और शायद यही सबसे बड़ा खतरा है। कि हम इसे धीरे-धीरे होता हुआ मानकर टालते रहते हैं। लेकिन सच यह है। पानी बढ़ रहा है। और उसके साथ जोखिम भी।

अब सवाल यह नहीं है कि समुद्र कितना बढ़ेगा। सवाल यह है कि हम कब तक इसे सिर्फ किनारे की कहानी मानते रहेंगे, जबकि यह अब हमारे शरीर, हमारे खाने, और हमारी जिंदगी के बीच आ चुका है।

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