दिल्ली के वुमेन प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कान्फ्रेंस में जलपुरुष राजेंद्र सिंह द्वारा लिखित पुस्तक अरावली पर नया संकट का भी विमोचन किया गया।
नई दिल्ली: जलपुरुष व तरुण भारत संघ के संस्थापक राजेंद्र सिंह ने 22 जनवरी 2026 को दिल्ली के वुमेन प्रेस क्लब में एक प्रेस कान्फ्रेंस में ऐलान किया कि अरावली पर्वत श्रृंखला के संरक्षण व जन जागरूकता के लिए 40 दिन लंबी 700 किमी की यात्रा निकाली जाएगी। यह यात्रा उन राज्यों व क्षेत्रों से होकर गुजरेगी जहां अरावली पर्वत श्रृंखला है।
इस ऐलान से पूर्व जलपुरुष राजेंद्र सिंह जी द्वारा लिखित पुस्तक ‘अरावली पर नया संकट’ का विमोचन भी किया गया। राजेंद्र सिंह के अनुसार, यह पुस्तक अरावली के संघर्ष की सच्ची कहानी प्रस्तुत करती है। वर्ष 1980 से लेकर अब तक अरावली के लिए जो प्रयास हुए हैं, उनका इसमें विस्तार से उल्लेख है।
जलपुरुष राजेंद्र सिंह जी द्वारा वर्ष 1991 में उच्चतम न्यायालय से खनन बंद कराने का आदेश प्राप्त किया गया था, जिसके फलस्वरूप वर्ष 1994 तक पूरी अरावली में एक बार सभी खनन बंद कराए गए। इस पूरे वृतांत के साथ-साथ वर्तमान में उत्पन्न हुए नए संकट का भी वर्णन इस पुस्तक में मिलता है।
राजेंद्र सिंह ने कहा कि यह पुस्तक अरावली के संकट को समझने वाले लोगों के लिए अत्यंत उपयोगी है। यह उन सभी लोगों के लिए भी जरूरी है जो यह मानते हैं कि अरावली की कोई आवश्यकता नहीं है और उसे काटकर खरबों कमाकर एक नई दुनिया बनाई जा सकती है। ऐसे लोगों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए, क्योंकि इससे यह समझ में आएगा कि अरावली कोई पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि एक जीवित संस्कृति का योग है। अरावली ब्रज, मेवात, मत्स्य, ढूंढाड़, मगरा मेवाड़, बगड़, मारवाड़, हाड़ौती, मेवाड़ और डांग जैसी अनेक सभ्यताओं का केंद्र रही है। यदि अरावली में खनन हुआ तो ये सभी सभ्यताएं नष्ट हो जाएंगी और हमारी पहचान, हमारा गौरव तथा गरिमा नष्ट हो जाएगी। इसलिए इस पुस्तक को पढ़ना और अरावली बचाने के आंदोलन में शामिल होना आवश्यक है।

राजेंद्र सिंह व अन्य पुस्तक अरावली पर नया संकट का विमोचन करने के दौरान।
प्रेस कांफ्रेस में मौजूद लोगों ने अरावली की यात्रा के संबंध में बताया कि यह यात्रा 700 किलोमीटर की दूरी तय करेगी और 4 राज्यों से गुजरते हुए 40 दिनों में पूरी होगी। इस यात्रा के दौरान भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला की गोद में बसे समुदायों से मिलकर संवाद किया जाएगा, ताकि अरावली के ग्रामीण जीवन के संघर्षों, अरावली के महत्व से पूरी दुनिया को परिचित कराया जा सके।
पीपल फॉर अरावली की नीलम अहलूवालिया ने अरावली से जुड़े कानूनी पहलुओं पर कई सवाल खड़े किए, वहीं सीकर के पर्यावरणविद कैलाश मीना ने अरावली की महत्ता पर प्रकाश डाला।
लोकेश, भिवानी ने बताया कि हरियाणा का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अरावली पर्वत से वंचित हो चुका है। इसके परिणामस्वरूप 3500 गांवों का पानी पीने योग्य नहीं रहा है। आर्सेनिक की अधिकता के कारण लोगों की किडनियां खराब हो रही हैं। खनन के धमाकों से मकानों में दरारें आ रही हैं, कृषि पैदावार आधी रह गई है और लोग पलायन करने को मजबूर हैं।
आदिवासी एकता परिषद, गुजरात से आईं कुसुम रावत ने इस अभियान की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि गुजरात से दिल्ली तक इन पर्वतमालाओं के समाप्त होने की स्थिति में हम जीवित नहीं रह सकेंगे।
अलवर के वीरेंद्र मोर ने बताया कि टाइगर रिजर्व क्षेत्र वाले ब्लॉकों में भी खनन होने से कई गांव तबाह हो जाएंगे, इसलिए अरावली का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है।