तोरसा में प्रस्तावित लैंड पोर्ट के खिलाफ आंदोलन कर रहे 11 चाय मजदूर गिरफ्तार

पश्चिम बंग चा मजूर समिति ने पुलिस की कार्रवाई की कड़ी निंदा की है और कहा है कि मजदूरों की जमीन पर अधिकारों की मान्यता के बजाय उनका दमन किया जा रहा है।

अलीपुद्वार : पश्चिम बंगाल चाय मज़दूर समिति ने दो नवंबर 2026 को तोरसा में चाय बागान के 11 मज़दूरों और निवासियों की गिरफ्तारी की कड़ी निंदा करते हुए उस पर सवाल उठाया है। पीबीसीएमएस ने कहा है कि गिरफ्तारी के हालात और उसके बाद दर्ज किए गए आपराधिक मामले, अधिकारियों के कामकाज के तरीके पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।

तीन नवंबर की सुबह तक, उनके परिवारों ने 18 घंटे तक भारी चिंता और बेचौनी में बिताए, जबकि वे अपने अपनों का पता लगाने की कोशिश कर रहे थे। बाद में हमें जानकारी मिली कि गिरफ्तार लोगों को ज़िले के एक छोर से दूसरे छोर तक, 4-5 अलग-अलग पुलिस थानों में घुमाया गया। उनके मोबाइल फोन ज़ब्त कर लिए गए, जिससे वे अपने परिवारों या वकीलों से संपर्क करने में असमर्थ हो गए।

शांतिपूर्ण विरोध, अचानक हुआ टकराव


तोरसा चाय बागान के गोटाबारी में लैंड पोर्ट्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया(एलपीएआइ) की साइट पर पिछले लगभग पाँच महीनों से निर्माण कार्य चल रहा था। इस दौरान, लोगों ने प्रोजेक्ट साइट के पास 100 से ज़्यादा दिनों तक शांतिपूर्ण और अनिश्चितकालीन धरना दिया। उन्होंने कभी भी निर्माण कार्य में कोई रुकावट नहीं डाली और न ही प्रोजेक्ट के काम में कोई दखल दिया।

तीन नवंबर को दर्ज की गई एफआइआर (जयगाँव थाना केस नंबर 326/26) में एलपीएआइ के जूनियर इंजीनियर राकेश कुमार मीणा की दो नवंबर की एक लिखित शिकायत पर आधारित है। इससे पहले के 100 दिनों में, रुकावट डालने या हिंसा करने को लेकर पुलिस में कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी।

यह टकराव तब हुआ जब दो नवंबर को विवादित ज़मीन पर काम आगे बढ़ाने के लिए बुलडोज़र लाए गए, जबकि परिवारों की ओर से लगातार मुआवज़े की मांग की जा रही थी। इस मांग को नज़रअंदाज़ कर दिया गया। लोगों ने विरोध किया और अधिकारियों से बहस की। इस दौरान कोई हिंसा नहीं हुई, न ही किसी के साथ मारपीट हुई और न ही सरकारी संपत्ति को कोई नुकसान पहुँचाया गया। विरोध और असहमति को हिंसा का नाम देकर आपराधिक नहीं ठहराया जा सकता। गिरफ्तार किए गए 11 लोगों में चार आदिवासी महिलाएं – मरियम उरांव, सुनीता उरांव, अर्पिता उरांव और रत्ना उरांव और सात पुरुष बिश्राम उरांव, राज उरांव, आनंद छेत्री, बिनोद कुजूर, सूरज लोहार, सागर विश्वकर्मा और सरना बिलास उरांव शामिल हैं। इन पुरुषों में से पांच आदिवासी हैं और दो गोरखा हैं। इन सभी 11 लोगों को 6 नवंबर 2026 तक न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है।

तीन आयोजकों पर झूठे आरोप


लैंड पोर्ट ऑथिरिटी ऑफ इंडिया के इंजीनियर की शिकायत में अनुराधा तलवार, बिनय केरकेट्टा और महेश खलखो का नाम लिया गया है, जिन पर आरोप है कि उन्होंने भीड़ को उकसाया और भड़काया था। जबकि हकीकत यह है कि इनमें से कोई भी विरोध स्थल पर मौजूद नहीं था। शिकायत में ऐसा कोई भी विशिष्ट कार्य, बयान या निर्देश नहीं बताया गया है, जिसे उकसावे की श्रेणी में रखा जा सके। ये अस्पष्ट और बेबुनियाद आरोप आंदोलन के नेतृत्व को डराने और संगठन को आपराधिक ठहराने की एक कोशिश हैं।

सरकार सुनने को तैयार नहीं


100 से अधिक दिनों से, परिवार शांतिपूर्ण तरीके से अपने भूमि अधिकारों को मान्यता देने और उचित मुआवजे की मांग कर रहे हैं। लेकिन उनकी पुकार अनसुनी कर दी गई है। उन्होंने परियोजना स्थल के ठीक सामने सरकारी जमीन का एक खाली टुकड़ा भी विकल्प के तौर पर सुझाया है। जब एक विकल्प मौजूद है, तो विवादित जमीन पर ही जोर क्यों दिया जा रहा है?

तोरसा की मौजूदा स्थिति अन्याय का प्रतीक


तोरसा एक बहुत बड़े अन्याय को सामने लाता है। चाय बागान के मजदूर 150-200 वर्षों से इन जमीनों पर रह रहे हैं और काम कर रहे हैं, लेकिन उनके पास अपने अधिकारों को साबित करने के लिए कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है। आजादी के 80 साल बाद भी, अलग-अलग सरकारों ने उन्हें भूमि अधिकार देने में विफलता दिखाई है। कानून की नजर में, चाय बागान में रहने वाली लगभग 11-12 लाख की आबादी आज भी भूमिहीन और बेघर है।

प्रोफेसर वर्जिनियस खाका, सिराज दत्त और अनुप्रदा सिंह की एक स्वतंत्र फैक्ट फाइंडिंग टीम ने एक से तीन अगस्त 2026 तक तोरसा का दौरा किया। टीम के निष्कर्षों से पुष्टि होती है कि प्रभावित परिवारों की कई पीढ़ियों ने बिना किसी मालिकाना दस्तावेज के इस जमीन पर खेती की है। सरकारों द्वारा लंबे समय से अधिकारों से वंचित रखे जाने के कारण अब उनकी आजीविका खतरे में पड़ गई है, और उन्हें न तो उचित मुआवजा मिला है, न ही पुनर्वास की सुविधा या कोई कानूनी सुरक्षा। सरकार ने बातचीत के बजाय बुलडोज़र और पुलिसिया कार्रवाई का रास्ता चुना है। पीबीसीएमएस ने कहा है कि बल्कि उसे चाय बागान के लाखों मज़दूरों के सामने मौजूद ज़मीन न होने की मूल समस्या का समाधान करना चाहिए।

संगठन ने पश्चिम बंगाल सरकार व प्रशासन के समक्ष अपनी मांगें रखी हैं। इन मांगों में गिरफ्तार किए गए सभी 11 लोगों को तुरंत रिहा करने, 11 निवासियों और तीन आयोजकों पर लगाए गए झूठे आरोप वापस लेने, जब तक ज़मीन के अधिकार, मुआवज़े और पुनर्वास के दावों का निपटारा नहीं हो जाता, तब तक बेदखली की कार्रवाई तुरंत रोके जाने की मांगें शामिल है।

इसके साथ ही चाय बागान मज़दूरों की ज़मीन के अधिकारों को मान्यता दिए जाने और उन्हें उस ज़मीन का मालिकाना हक देने की मांग शामिल है, जिस पर वे पीढ़ियों से रह रहे हैं और जिसका इस्तेमाल कर रहे हैं।

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