फसल कटाई के मौसम में सक्रिय निगरानी से हाथी-मानव टकराव कम किया जा सकता है: स्टडी

बेंगलुरु : एक नए अध्ययन में यह तथ्य उभर कर आया है कि इंसान और हाथी में बीच टकराव की एक बड़ी संख्या कभी भी सरकारी रिकार्ड में दर्ज नहीं होती, जबकि सक्रिय निगरानी से रिपोर्ट की जाने वाली घटनाओं की संख्या में काफी सुधार होता है। यह अध्ययन बायोलॉजिकल कंजरवेशन में छपा है, जिसका शीर्षक है बेयसियन ऑक्यूपेंसी मॉडलिंग फ्रेमवर्क।

अध्ययन में पाया गया कि कर्नाटक में स्थित बांदीपुर और नागरहोल नेशनल पॉर्क के आसपास जिन इलाकों में खेती की जमीन अधिक थी और फसल कटाई के मौसम में खेतीबाड़ी की गतिविधियां अधिक होती थीं, इंसान और हाथी के बीच टकराव की खबरें मिलने की संभावना अधिक थीं। यह स्टडी अनुभव वनममलाई, कोलंबिया विश्वविद्यालय और इसकी सह लेखक डॉ कृति के कारंत, सीइओ, सेंटर फॉर वाइल्डलाइफ स्टडडीज के अगुवाई में किया गया है।

अध्ययन में कहा गया है कि हेल्पलाईन रिकॉर्ड और सरकारी मुआवजे के दावों में केवल वही घटनाएं दर्ज होती हैं, जिनकी रिपोर्ट की जाती है। कुछ घटनाएं कभी भी सरकारी रिकार्ड में नहीं आ पाती हैं और रिपोर्टिंग स्थानीय स्तर पर लोगों तक पहुंच, किसानों की भागीदारी और मॉनिटरिंग की कोशिशों के आधार पर अलग-अलग हो सकता है।

इस स्टडी में इस्तेमाल किए गए मॉडलिंग के तरीके यह समझने में मदद करते हैं कि हाथी से जुड़ी फसल या संपत्ति के नुकसान, चोट या मौत की घटना कहाँ हो सकती है और असल में ऐसी घटनाएँ कहाँ दर्ज की जाती हैं। यह तरीका ऐसे टकराव के डेटा के साथ काम करने का एक उपाय है जो कम या असमान रूप से इकट्ठा किया गया हो।

Photo Source – CWS ©Avijan Saha

खेती वाली ज़मीन का दायरा यह बताने वाला सबसे पक्का और मज़बूत कारक था कि टकराव कहां होगा। लेखकों का मानना ​​है कि ऐसा इसलिए है क्योंकि खेती वाली ज़मीन हाथियों को पोषक तत्वों से भरपूर चारा देती है, खासकर तब जब वह वाइल्डलाइफ़ रिज़र्व से सटी हो। रिपोर्ट की गई घटनाएं फसल के कैलेंडर के हिसाब से हुईं; मॉनसून के बाद के मौसम में ये घटनाएं सबसे ज़्यादा (35%) रहीं, जबकि मॉनसून में 31% और मॉनसून से पहले के मौसम में 26% रहीं। इसके अलावा, फसल कटाई के मौसम में जिन इलाकों में रात के समय ज़्यादा रोशनी थी, वहां घटनाएं होने की संभावना ज़्यादा थी। रात में इस्तेमाल होने वाली कृत्रिम रोशनी (जैसे स्ट्रीट लैंप) का भी टकराव से सीधा संबंध पाया गया, जबकि उम्मीद यह थी कि कृत्रिम रोशनी हाथियों को दूर रखेगी। लेखक इसे इस तरह नहीं देखते कि रोशनी हाथियों को आकर्षित करती है, बल्कि इसे फसल कटाई के समय इंसानी और खेती से जुड़ी ज़्यादा गतिविधियों के संकेत के तौर पर देखते हैं।

वन्यजीव अभ्यारण्य के पास घटनाओं के रिकार्ड होने की संभावना अधिक

इलाके की दूसरी विशेषताओं से भी यह समझने में मदद मिली कि घटनाएँ कहाँ हुईं। घटनाएँ अक्सर वाइल्डलाइफ़ रिज़र्व और उन जंगलों के पास होती थीं जहाँ हाथी आते-जाते हैं। पेड़-पौधों की बढ़त और ज़मीन की बनावट का इन घटनाओं से सीधा संबंध था; शायद इसलिए क्योंकि ये तय करते हैं कि हाथी खेतों से कैसे गुज़रेंगे और उन्हें खाना कहाँ मिलेगा। वाइल्डलाइफ़ रिज़र्व के पास हाथियों से जुड़ी घटनाओं के रिकॉर्ड होने की संभावना ज़्यादा थी, क्योंकि ज़्यादा टकराव वाले इलाकों में किसानों के पास घटनाओं की रिपोर्ट करने और सरकार से मुआवज़ा पाने की ज़्यादा वजहें होती हैं।

Photo Source – CWS ©Avijan Saha

कोलंबिया यूनिवर्सिटी के अनुभव वनममलाई ने कहा, “हमारी रिसर्च से पता चलता है कि पश्चिमी घाट में इंसान और हाथी के बीच टकराव काफ़ी बदलता रहता है, लेकिन इसके कुछ ऐसे पैटर्न हैं जिनका अंदाज़ा लगाया जा सकता है और जो स्थानीय खेती और मौसम के हिसाब से होने वाली खेती की गतिविधियों से जुड़े हैं। हमारी स्टडी बताती है कि मॉनसून के बाद के समय में, जब मुख्य फ़सल की कटाई होती है, टकराव सबसे ज़्यादा होता है। इससे पता चलता है कि मौसम और जगह के हिसाब से टकराव को कम करने के उपाय करने की तुरंत ज़रूरत है। हमारा मकसद इन मॉडल्स का इस्तेमाल करके ऐसे स्मार्ट उपाय करना है जिनसे गाँवों में लोगों की आजीविका भी सुरक्षित रहे और भारत में लुप्तप्राय हाथियों के साथ मिल-जुलकर रहने में भी मदद मिले।”

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